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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 194 में से

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नीतिशतकम् ७७

युक्त, गुणों से द्वेष करने वाले, इस नीच (पुरुष) की दृष्टि में पड़ने पर कौन (व्यक्ति) सुख से रह सकता है।

व्याख्या- इस संसार में व्यक्ति की सुख और शान्ति तभी तक विद्यमान है जब तक वह दुष्ट लोगों की नजरों में नहीं आता है। इन दुष्टों की विशेषताओं का कथन करते हुए कवि कहता है कि ये लोग सदा अपने जैसी प्रकृति वाले दुष्टों को ही सदा प्रश्रय देते हैं तथा प्रोत्साहित करते हैं। इनके लिए समाज द्वारा निर्धारित सभी मर्यादाओं का महत्त्व नहीं होता अर्थात् ये पूर्णतया उच्छृंखल होते हैं, उनकी रुचि सदा नीच कार्यों में रहती है। ऐसा प्रतीत होता है कि मानों अपने पूर्व जन्मों में इन्होंने कोई भी पुण्य कर्म नहीं किया है, इसी कारण इस जन्म में भी इनके विचार और कार्य पाप कर्मों में लिप्त हैं।

देवयोग अथवा संयोग से इनके पास धन-धान्य अर्थात् ऐश्वर्य भी पर्याप्त मात्रा में होता है। वस्तुतः इनका ऐश्वर्य कोई पुण्य कर्म का फल नहीं, अपितु मात्र एक संयोग ही होता है। इनका स्वभाव होता है कि ये सदा गुणवान् व्यक्ति के प्रति ईर्ष्या करते हैं, उनसे प्रसन्न नहीं होते। यदि वास्तव में इन्हें सही शब्दों में कहना चाहें तो ये समाज के लिए कोढ़ होते हैं। भला ऐसे लोगों के दृष्टिपथ में आया हुआ व्यक्ति सुखी किस प्रकार रह सकता है अर्थात् कोई नहीं।

विशेष- १. यदि व्यक्ति इस संसार में सुखी रहना चाहता है तो उसे दुष्टों से जहाँ तक हो सके दूर रहने का प्रयास करना चाहिए।

२. दुर्जनों की सभी विशेषताओं का सुन्दर ढंग से अत्यन्त संक्षेप में उल्लेख किया गया हैं।

३. वसन्ततिलका छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।

४. प्रस्तुत श्लोक में, चतुर्थ चरण के अन्तिम पाद के कारण रूप में प्रारम्भिक पाद को प्रयुक्त किया गया है। अतः काव्यलिंग अलंकार, लक्षण इस प्रकार है—
हेतोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिङ्गमुदाहृतम्।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. उद्भासिताः अखिलाः खलाः येन सः, उद्भासिताखिलखलः तस्य (बहुव्रीहि)— उद्भासिताखिलखलस्य
२. विगता शृङ्खला यस्य सः, विशृङ्खलः (बहुव्रीहि) तस्य विशृङ्खलस्य
३. √जन् + क्त = जातः। वि + √स्तृ + क्त = विस्तृतः
४. √वृत् + क्तिन् = वृत्तिः। अव + √आप् + क्त = अवाप्तः
५. अवाप्तः विभवः येन सः, अवाप्तविभवः (बहुव्रीहि)
६. गुण + √द्विष् + क्विप् (षष्ठी विभक्ति, एकवचन) गुणद्विषः

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