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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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७२श्रीभर्तृहरिविरचितम्

यदि व्यक्ति सत्यभाषण करता है तो वह सबसे बड़ा तपस्वी है, क्योंकि सत्य बोलना सबसे बड़ी तपस्या है।

इसके अतिरिक्त यदि व्यक्ति का मन पवित्र है तो उसे किसी तीर्थ पर जाने की आवश्यकता नहीं है, पवित्र मन ही श्रेष्ठ तीर्थ है। यदि व्यक्ति सज्जन स्वभाव वाला है तो उसे आत्मीयजनों की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि उसके स्वभाव के कारण सभी लोग उसके अपने हो जाएँगे। यदि व्यक्ति प्रशंसनीय कीर्ति वाला है तो उसे कोई आभूषण धारण करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि सुयश स्वयं में सबसे बड़ा आभूषण है।

ठीक इसी प्रकार यदि व्यक्ति के पास श्रेष्ठ विद्या है तो उसे किसी भी प्रकार के धनसंग्रह की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि सद् विद्या सबसे बड़ा धन है। कहा भी है. विद्याधनं सर्वधनं प्रधानम्।

अन्त में कवि कहता है कि यदि व्यक्ति अपकीर्ति वाला है तो उसे मृत्यु की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जिस व्यक्ति का संसार में अपयश फैला हुआ है वह तो जीवित रहते हुए भी मरा हुआ है।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में लोभ को सबसे बड़ा दुर्गुण, चुगलखोरी को सबसे बड़ा पाप, सत्य-भाषण को सबसे बड़ी तपस्या, पवित्र मन को सबसे बड़ा तीर्थ, सुयश को सबसे बड़ा आभूषण, श्रेष्ठ विद्या को उत्तम धन तथा अपयश को मृत्यु बताया गया है।

२. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण—

सूर्याश्वैर्मजसास्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।

३. किम् पद का प्रयोग यहाँ निरर्थकता प्रतिपादित करने के लिए हुआ है।

४. अर्थापत्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. न गुणः इति (नञ् समास) तेन अगुणेन
२. पिशुन + तल् + टाप् = पिशुनता
३. सुजन + ष्यञ् (नपुं. प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = सौजन्यम्
४. महत् + इमनिच् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) महिमा
५. शोभनः महिमा सुमहिमा (कर्मधारय)
६. √मण्ड् + ल्युट् (नपुं. तृतीया विभक्ति, बहुवचन) मण्डनैः
७. √पत् + णिच् + ण्वुल् = पातकः तैः पातकैः
८. लोभः + चेत् + अगुणेन (स्तोःश्चुना श्चुः, झलां जश झशि)
९. यदि + अस्ति = (यण् – इकोयणर्चि – इ – य्)
१०. धनैः+अपयशः+ यदि (:-र्-ससजुषो रुः,:-उ-ओ)–(हशि च, आद् गुणः)