नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 45, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् २३
अभिनवमदलेखाश्यामगण्डस्थलानां,
न भवति बिसतन्तुर्वारणं वारणानाम्॥१८॥
अन्वय- अधिगत परमार्थान् पण्डितान् अवमंस्थाः मा, तृणम् इव लघु लक्ष्मीः तान् न एव संरुणद्धि। अभिनवमदलेखाश्यामगण्डस्थलानाम् वारणानाम् बिसतन्तुः वारणम् न भवति।
अनुवाद- परमतत्त्व प्राप्त किए हुए पण्डितों का अपमान मत (करो)। तिनके के समान तुच्छ लक्ष्मी उनको नहीं रोक सकती। ताजे मद की धाराओं से काले गण्डस्थलों वाले हाथियों को कमलनाल का तन्तु रोकने में (समर्थ) नहीं होता।
व्याख्या- जिन विद्वानों ने परमतत्त्व अर्थात् परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया है, ऐसे ब्रह्मज्ञानियों का अपमान करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है, क्योंकि ये लोग सांसारिक ऐश्वर्य से ऊपर उठ गए है, सांसारिक वैभव अब उनके सामने तिनके के समान हैं। परमात्मतत्त्व में लीन उनके समक्ष इस संसार का राजा अथवा बड़े से बड़ा धनवान् कोई अर्थ नहीं रखता है। अतः ऐसे तत्त्व ज्ञानियों का अपमान करना उचित नहीं है।
इसी विषय को समझाते हुए कवि हाथी और कमलनाल के तन्तुओं का उदाहरण देते हुए कहता है कि जिसके गण्डस्थलों से मद बह रहा हो जो अत्यधिक शक्तिशाली हो, ऐसे पूर्णतया युवक हाथी को क्या आप कमलनाल के तन्तुओं के द्वारा बांधकर रोकने में समर्थ हो सकते हैं अर्थात् कभी नहीं।
इसलिए जिस प्रकार बिसतन्तुओं के द्वारा किसी मदमस्त हाथी को रोकना असम्भव एवं मूर्खतापूर्ण कार्य है। उसी प्रकार परमतत्त्व ज्ञानी पण्डितों को धन और ऐश्वर्य का लोभ दिखाकर अपने वश में करना असम्भव एवं मूर्खतापूर्ण कार्य है। अतः ऐसे विद्वानों का कभी अपमान नहीं करना चाहिए।
विशेष- १. परमतत्त्व को प्राप्त करने वाले तत्त्वज्ञानी के लिए यह सम्पूर्ण संसार ही नश्वर है। अतः त्याज्य है।
२. धन का लोभ सामान्य व्यक्ति को प्रभावित करता है, तत्त्वज्ञानी को नहीं।
३. यहाँ तत्त्वज्ञानी की उपमा मदमस्त हाथी से तथा लक्ष्मी की कमलनाल के नाजुक रेशों से दी गई है।
४. उत्कृष्ट श्रेणी के हाथी की यह विशेषता है कि उसकी कनपटियों से सुगन्धित द्रव पदार्थ बहता रहता है, जिसके कारण उसके गण्डस्थल काले रहते हैं। इसी को गजमद कहा जाता है।
५. यहाँ दो वाक्यों में बिम्ब प्रतिबिम्बभाव होने के कारण दृष्टान्त अलंकार प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— दृष्टान्तस्तु सधर्मस्य वस्तुनः प्रतिबिम्बनम्॥