भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 194 में से

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२२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

है अर्थात् विद्या के द्वारा कभी भी अकल्याण की सम्भावना ही नहीं है। यह विद्या नामक गुप्त धन यदि याचकों को दिया जाए तो निरन्तर बढ़ता ही है। भले ही कल्प का अन्त क्यों न आ जाए, किन्तु इस धन के विनाश की कोई सम्भावना ही नहीं रहती। इस प्रकार के धनों से युक्त धनवानों के अर्थात् विद्वानों के साथ भला किसकी स्पर्धा करने की सामर्थ्य है। अतः हे राजाओं! तुम कभी भी इनके साथ बराबरी नहीं कर सकते हो। इसलिए इनके साथ अभिमान का त्याग कर विनम्रतापूर्वक व्यवहार करो।

विशेष- १. विद्वत्त्वं नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन। इस भावना को अभिव्यक्त करते हुए यहाँ विद्वान् की उत्कृष्टता प्रतिपादित की गई है।
२. विद्या रूपी धन की चार विशेषताओं का यहाँ उल्लेख किया गया है।
३. प्रस्तुत श्लोक में उपमेय विद्या रूपी धन की, उपमान सामान्य लोक प्रसिद्ध धन से उत्कृष्टता प्रतिपादित करने से व्यतिरेक अलंकार है, लक्षण इस प्रकार है—
उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः॥
४. राजाओं का कर्तव्य है कि वे विद्वानों का सम्मान करें।
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
६. ब्रह्मा के एक दिन को कल्प कहते हैं, जो मनुष्यों के ४३२००००००० वर्षों के बराबर होता है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. हर्तुः + याति (विसर्ग संधि)
२. सर्वदा + अपि + अर्थिभ्यः (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः, इकोयणचि)
३. कल्प + अन्तेषु + अपि (दीर्घ, यण्)
४. कः + तैः = (विसर्ग— विसर्जनीयस्य सः)
५. √हृ + तृच् (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन)
६. गावः (इन्द्रियाणि) चरन्ति अस्मिन् इति, गोचरःतम्
७. अर्थ + इनि (पुल्लिंग, चतुर्थ विभक्ति, बहुवचन)
८. प्रति + √पद् + शानच् (नपु., प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
९. √उज्झ + सिप् (लोट् लकार, म.पु., एकवचन)
१०. प्रति के योग में तान् में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।
११. ‘‘सहयुक्तेऽप्रधाने’’ सूत्र से सह के योग में तैः में तृतीया विभक्ति।
१२. √स्पर्ध् + तिप् (आत्मनेपद, लट्लकार (प्रथम पुरुष, एकवचन)

अधिगतपरमार्थान् पण्डितान् माऽवमंस्थाः,
तृणमिव लघु लक्ष्मीनैव तान् संरुणद्धि।