नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 43, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् २१
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः: शार्दूलविक्रीडितम्।
५. काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है— लक्षण—
हेतोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिंगमुदाहृतम्।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. शास्त्रैः उपस्कृतः शास्त्रोपस्कृतः, तैः शब्दैः सुन्दर्यः गिरः येषां
२. शिष्येभ्यः प्रदेयाः आगमाः येषां, ते
३. प्र + √दा + यत् = प्रदेयाः
४. वसुधायाः अधिपः, वसुधाधिपः (षष्ठी तत्पुरुष)
५. अर्ध + तसिल् = अर्धतः
६. √पत् + णिच् + क्त = पातित + टाप् = पातिता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन)
७. स्युः = लट् लकार के अर्थ में यहाँ विधिलिङ् लकार का प्रयोग है।
८. उप + √कृ + क्त (सुट् का आगम)
९. √कुत्स् + ण्यत् = कुत्स्याः
हर्तुर्याति न गोचरं किमपि शं पुष्णाति यत्सर्वदा
ऽप्यर्थिभ्यः प्रतिपाद्यमानमनिशं प्राप्नोति वृद्धिं पराम्।
कल्पान्तेष्वपि न प्रयाति निधनं विद्याख्यमन्तर्धनं
येषां तान्प्रति मानमुज्झत नृपाः कस्तैः सह स्पर्धते॥१७॥
अन्वय- हे! नृपाः, तान् प्रति मानम् उज्झत, येषाम् (समीपे) विद्याख्यम् अन्तःधनम् (अस्ति) यत् हर्तुः गोचरम् न याति, सर्वदा किम् अपि शम् पुष्णाति, अर्थिभ्यः प्रतिपाद्यमानम् अनिशम् हि पराम् वृद्धिम् प्राप्नोति, कल्पान्तेषु अपि निधनम् न प्रयाति, तैः सह कः स्पर्धते।
अनुवाद- हे राजाओं!, उन (लोगों) के प्रति अभिमान छोड़ दो, जिनके (पास) विद्या नामक गुप्त धन (है) जो चोर की इन्द्रियों का विषय नहीं होता, सदा ही किसी न किसी कल्याण को ही पुष्ट करता है, याचकों को दिया जाता हुआ (भी) निरन्तर अत्यधिक बढ़ता ही है, कल्पों के अन्त में भी विनष्ट नहीं होता है, (भला) उनके साथ कौन स्पर्धा कर सकता है?
व्याख्या- राजाओं को सम्बोधित करते हुए कवि विद्वानों के प्रति विनम्र व्यवहार करने का सुझाव देते हुए कहता है कि हे राजाओं! तुम इस प्रकार के विद्वानों के प्रति अपने अहंकार का परित्याग कर दो, जिनके पास विद्या नामक अत्यन्त अद्भुत एवं गुप्त धन है, जो चोरों की इन्द्रियों का विषय भी नहीं होता अर्थात् चोर इस धन को चुराने में समर्थ नहीं होते। इस धन के द्वारा किसी न किसी प्रकार के कल्याणों की ही प्राप्ति होती