नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२० श्रीभर्तृहरिविरचितम्
कुत्स्याः स्युः कुपरीक्षका हि मणयो यैरर्घतः पातिताः॥१६॥
अन्वय- शास्त्रोपस्कृतशब्दसुन्दरगिरः, शिष्यप्रदेयागमाः, विख्याताः कवयः यस्य प्रभोः विषये निर्धनाः वसन्ति। तत् वसुधाधिपस्य जाड्यम् (एव)। कवयः तु अर्थम् विना अपि ईश्वराः (सन्ति)। यैः मणयः अर्घतः पातिताः ते कुपरीक्षकाः हि कुत्स्याः स्युः।
अनुवाद- शास्त्रपरिष्कृत शब्दों से सुन्दर वाणी से युक्त, शिष्यों को देने योग्य विद्या से युक्त, प्रसिद्ध कवि जिस राजा के राज्य में निर्धन होकर रहते हैं। वह (तो वस्तुतः) राजा की मूर्खता (ही है) कवि तो धन के बिना भी ऐश्वर्यसम्पन्न (हैं)। जिन (परीक्षकों द्वारा) मणियाँ मूल्य से गिरा दी गईं, वे बुरे परीक्षक ही (वस्तुतः) निन्दनीय हैं (न कि मणियाँ)।
व्याख्या- जिन कवियों के पास व्याकरण सम्मत, मनोरम वाणी है तथा जिनकी अथाह ज्ञानराशि शिष्यों को देने योग्य है अर्थात् जिनमें ज्ञान के साथ-साथ अभिव्यक्ति की सामर्थ्य भी है। इन विशेषताओं से युक्त दूर-दूर प्रदेशों में अपनी योग्यता के कारण अत्यन्त प्रसिद्ध भी कवि यदि किसी राजा के राज्य में निर्धनता की अवस्था में निवास करते हैं, तो यह उस राजा की ही मूर्खता मानी जाएगी कवियों का इसमें कोई दोष नहीं है।
क्योंकि कवि तो धन के अभाव में भी राजाओं के समान ऐश्वर्य से युक्त हैं, उनका ज्ञान उनका सबसे बड़ा धन है कहा भी गया है- ‘विद्या धनं सर्वधनं प्रधानम्।' इसी प्रसंग में कवि एक उदाहरण देते हुए कहता है कि यदि राजा अपने राज्य में रहने वाले विद्वानों का सम्मान नहीं करता, उन्हें राजाश्रय प्रदान नहीं करता, तो इसके लिए निश्चय ही वह राजा ही ठीक उसी प्रकार दोषी है जैसे यदि कोई जौहरी मूल्यवान् मणियों को काँच करार दे दे, तो इसमें दोष जौहरी का माना जाएगा न कि मणियों का। मणियों में तो अपना गुण है ही उसकी परख करने वाले, वस्तुतः जौहरी कहलाने योग्य नहीं हैं, क्योंकि यदि उनमें सही परख की सामर्थ्य होती तो वे निश्चय ही मूल्यवान् मणियों को मूल्य-रहित करार नहीं देते।
विशेष- १. राजा का कर्तव्य है कि वह अपने राज्य में स्थित विद्वानों को यथोचित सम्मान प्रदान करे, उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखें।
२. यदि कोई अज्ञानी हीरे को पत्थर समझ कर उसको उपेक्षापूर्वक कूड़े में फेंक देता है तो इसके लिए हीरा दोषी नहीं हो सकता।
३. यहाँ कवि से अभिप्राय अपने विषय के विशिष्ट विद्वान् एवं अभिव्यक्ति की सामर्थ्य सम्पन्न व्यक्ति से है, कविता करने वाले व्यक्ति से नहीं।
४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग है—