नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
६ परिजन का अर्थ सेवक और सम्बन्धी दोनों किया जा सकता है। ७. काव्यलिंग अलंकार
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. दक्षिण + ष्यञ् (नपु. प्र.वि., ए.व.) दाक्षिण्यम् २. शठ + ष्यञ् (नपु., प्र.वि., ए.व.) शाठ्यम् ३. √प्रीञ् + क्तिन् (प्र.वि., ए.व.) प्रीतिः ४. √नी + अच् (पु., प्र. वि., ए.व.) नयः ५. ऋ+जु + अण् (नपु., प्र. वि., ए.व.) आर्जवम् ६. शूर + ष्यञ् (नपु., प्र. वि., ए.व.) शौर्यम् ७. धूर्त + तल् + टाप् = धूर्तता ८. लोकानाम् स्थितिः = लोकस्थितिः (षष्ठी तत्पुरुष) ९. √स्था + क्तिन् (स्त्री., प्र. वि., ए.व.) स्थितिः १०. विद्वत् + जनेषु + आर्जवम् (व्यञ्जन संधि, यण्, संधि इकोयणचि) ११. च + एवम् (वृद्धि - वृद्धिरेचि) १२. कुशलाः + तेषु + एव (विसर्गः यण् - इकोयणचि)
जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं,
मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं,
सत्सङ्गतिः कथय किं न करोति पुंसाम्॥२४॥
अन्वय- (सत्संगतिः) धियः जाड्यम् हरति, वाचि सत्यम् सिञ्चति, मानोन्नतिम् दिशति, पापम् अपाकरोति, चेतः प्रसादयति, दिक्षु कीर्तिम् तनोति, कथय, सत्संगति पुंसाम् किम् न करोति।
अनुवाद- (सत्संगति मनुष्य की) बुद्धि की मन्दता का हरण करती है, वाणी में सत्य का संचार करती है, सम्मान और उन्नति को बढ़ाती है, पाप को दूर करती है, मन को प्रसन्न करती है, दिशाओं में कीर्ति फैलाती है, कहो तो सत्संगति मनुष्य का क्या नहीं करती ?
व्याख्या- सज्जनों की संगति से व्यक्ति का अनेक प्रकार से उपकार होता है, इसी का कथन करते हुए कवि कहता है कि- सत्संगति से बुद्धि की अज्ञानता, जड़ता दूर होती है, वाणी सज्जनों के साथ रहकर उनका अनुकरण करते हुए सदैव सत्य भाषण ही करती है। जब व्यक्ति सज्जनों के साथ रहता है तो उसका समाज में सम्मान व प्रतिष्ठा बढ़ती है, जिससे वह उन्नति को प्राप्त करता है।