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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 194 में से

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तथा श्लोकों का क्रम निर्णय सागर प्रेस से प्रकाशित भर्तृहरित्रिशती के आधार पर रखा है।

पुस्तक के प्रारम्भ में विस्तृत भूमिका दी गई है। जिसमें गीतिकाव्य का स्वरूप, गीतिकाव्य का उद्भव एवं विकास, संस्कृत गीतिकाव्य की विशेषताएँ आदि विषयों का तथा कवि भर्तृहरि के जीवनचरित, स्थितिकाल, कृतियाँ एवं भाषा शैली आदि का विस्तार से उल्लेख किया है, क्योंकि अधिकांश विश्वविद्यालयों में कवि एवं कृति पर प्रश्न पूछने की परम्परा रही है।

भूमिका में ही सभी दस पद्धतियों का सारांश देने का विचार था, किन्तु उससे पुस्तक के कलेवर में अत्यधिक वृद्धि हो जाती, जिससे बचने के लिए हमने परिशिष्ट में केवल एक विद्वत्पद्धति का सारांश दे दिया है। छात्रों को उसके आधार पर ही अन्य पद्धतियों के सारांश लिखने का भी अभ्यास करना चाहिए।

कुछ विश्वविद्यालयों में श्लोकों की संस्कृत व्याख्या भी परीक्षा में पूछी जाती है। हमने प्रत्येक श्लोक की संस्कृत व्याख्या न करके नमूने के रूप में एक श्लोक की व्याख्या परिशिष्ट में दी है। उसके आधार पर अन्य श्लोकों की संस्कृत व्याख्या की जा सकती है।

छात्रों में एक जिज्ञासा सदैव बनी रहती है कि अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए श्लोक की हम किस प्रकार हिन्दी व्याख्या करें। उनकी इस जिज्ञासा के लिए हमने परिशिष्ट में एक हिन्दी व्याख्या भी उदाहरण रूप में दी है।

प्रत्येक श्लोक के कुछ कठिन शब्दों के अर्थों को भी परिशिष्ट के अन्तर्गत पुस्तक के अन्त में अकारादिक्रम में दिया गया है। साथ ही वहीं पर श्लोकानुक्रमणिका का भी उल्लेख किया गया है।

तदनन्तर में इस पुस्तक की प्रेरणास्रोत मेरी शक्ति-स्वरूपा सहधर्मिणी डॉ. प्रतिमा शास्त्री, व्याख्याता (स्कूल-शिक्षा) के प्रति भूरिशः धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ। जिन्होंने मुझे बार-बार स्मरण कराते हुए इस कार्य को शीघ्र पूर्ण करने के लिए निरन्तर प्रेरित किया एवं अनेक दायित्वों को अपने ऊपर लेकर सहयोग प्रदान किया। कु० प्राची शास्त्री ने तो पाण्डुलिपि तैयार करने में भी अनेकशः सहायता की है। एतदर्थ उसे कोटिशः आशीर्वाद। नन्हें आत्मज आयुष्मान् सुवासित शास्त्री को भी असीम शुभकामनाएँ और हार्दिक प्यार इस कामना के साथ कि उसका भी निरन्तर संस्कृत के अध्ययन के प्रति रुझान हो।

अन्त में मैं संक्षेप में केवल इतना ही कहना चाहूँगा कि हमारी आने वाली संस्कृत अध्येता छात्रों की पीढ़ी का व्याकरण विषयक ज्ञान अत्यल्प है। वह इसे अत्यन्त क्लिष्ट