नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
१६८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
सुधास्यन्दिभिः = अमृतवर्षी, सुरतमृदिता = सम्भोग में मर्दन की गई, सूनुः = पुत्र, सूर्यातपः = सूर्य की धूप, सृजति = रचना करता है।
स्पृष्टः = स्पर्श किया गया, स्युः = होने चाहिएँ, स्पृहा = इच्छा, हतविधेः = दुष्ट विधाता, हर्तुः = हरण करने वाले के, ह्रीमति = लज्जा से, हुत्भुक् = अग्नि, हेतिनिहतः = शस्त्रों द्वारा घायल।
श्लोकानुक्रमणिका
| श्लोक | श्लोक सं० | पृष्ठ | श्लोक | श्लोक सं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| अकरुणत्वम् | ५१ | ६७ | छिन्नोऽपि रोहति | ९३ | १२१ |
| अज्ञः सुखमाराध्यः | ४ | ४ | जयन्ति ते | २५ | ३३ |
| अधिगतपरमार्थान् | १८ | २२ | जाड्यं धियो हरति | २४ | ३२ |
| अप्रियवचन दरिद्रैः | ७१ | ९४ | जाड्यं हिमर्ति | ५३ | ६९ |
| अम्भोजिनी वारविलास | १९ | २४ | जात कूर्मः सः | ८१ | १०६ |
| अयममृतनिधानं | १०२ | १३३ | जातिर्यातु रसातलं | ४० | ५२ |
| आज्ञाकीर्तिः पालनं | ४८ | ६४ | तानीन्द्रियाणि | ५० | ६६ |
| आरम्भगुर्वी क्षयिणी | ५९ | ७८ | तृष्णां छिन्धि भज | ८२ | १०८ |
| आलस्यं हि मनुष्याणां | १२१ | १५९ | त्वमेव चातकाधारो | ७३ | ९५ |
| इतः स्वपिति केशवः | ८० | १०४ | दानं भोगो नाशः | ४३ | ५७ |
| उद्भासिताखिलखलस्य | ५८ | ७६ | दाक्षिण्यं स्वजने | २३ | ३० |
| एकेनापि हि शूरेण | ३८ | ५० | दिक्कालाद्यनवच्छिन्न | १ | १ |
| एके सत्पुरुषाः | ७७ | १०० | दुर्जनः परिहर्तव्यः | ५२ | ६८ |
| एको देवः केशवो | ७२ | ९५ | देवेन प्रभुणा स्वयं | १०५ | १२९ |
| ऐश्वर्यस्य विभूषणं | ९४ | १२२ | दौर्मन्त्र्यान्नृपतिः | ४२ | ५५ |
| कदर्थितस्यापि हि | ९० | ११८ | न कश्चिच्चण्डकोप | ५६ | ७४ |
| करे श्लाघ्यस्त्यागः | ६३ | ८२ | नमस्यामो देवान् | ११० | १४४ |
| कर्मायत्तं फलं पुंसां | १२० | १५८ | नम्रत्वेनोन्नमन्तः | ७० | ९२ |
| कान्ताकटाक्षविशिखाः | ६७ | ११४ | निन्दन्तु नीतिनिपुणा | ८९ | ११६ |
| कृमिकुलचितं | १० | १२ | नेता यस्य बृहस्पतिः | ९६ | १२५ |
| किं तेन हेमगिरिणा | ८४ | ११० | नैवाकृतिः फलति | ११६ | १५३ |
| कुसुमस्तबकस्येव | ३१ | ४२ | पत्रं नैव यदा | १०८ | १४१ |
| केयूराणि न भूषयन्ति | २० | २५ | पद्माकरं दिनकरो | ७६ | ९९ |
| को लाभो गुणिसंगमः | २६ | ३५ | परिक्षीणः कश्चित् | ४५ | ५९ |
| क्वचित्भूमौ शय्या | ८८ | ११५ | परिवर्तिनि संसारे | ३० | ४१ |
| क्षान्तिश्चेत् | २२ | २९ | पतितोऽपि कराघातैः | १०६ | १३९ |
| क्षुत्क्षामोऽपि | २७ | ३६ | पापात्निवारयति | ७८ | १०२ |
| क्षीरेणात्मगतो | ७९ | १०२ | प्रदानं प्रच्छन्नं | ६७ | ८६ |
| खल्वाटो दिवसे | ९९ | १३० | प्रसह्य मणिमुद्धरेत् | ५ | ५ |
| गुणवद्गुणवद्वा | ११४ | १५८ | प्राणाघातान्निवृत्तिः | ६४ | ८४ |
१७० •श्रीभर्तृहरिविरचितम्
| श्लोक | श्लोक सं० | पृष्ठ | श्लोक | श्लोक सं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| प्रारभ्यते न खलु | ८६ | ११३ | लोभश्चेदगुणेन किं | ५४ | ७१ |
| प्रिय सखे विपद् | १०३ | १३४ | वने रणे शत्रुः | ११८ | १५६ |
| प्रिया न्याय्यावृत्तिः | ६६ | ८६ | वरं पक्षच्छेदः | ३४ | ४६ |
| बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः | ३ | ३ | वरं पर्वतदुर्गेषु | १५ | १९ |
| ब्रह्मा येन कुलाल | १११ | १४६ | वरं शृङ्गोत्संगात् | ९१ | ११८ |
| भग्नाशस्य करण्ड | ९७ | १२७ | वहति भुवनश्रेणीं | ३३ | ४४ |
| भवन्ति नम्रास्तरवः | ७४ | ९६ | वह्निस्तस्य जलायते | ९२ | १२० |
| भीमं वनं भवति | ११९ | १५७ | वाञ्छा सज्जनसंगमे | ६१ | ८० |
| मज्जत्वम्भसि | ११७ | १५५ | विद्या नाम नरस्य रूपं | २१ | २७ |
| मणिः शाणोल्लीढः | ४४ | ५३ | विपदि धैर्यमथा | ६२ | ८१ |
| मनसि वचसि काये | ८३ | १०९ | विरम विरमायासाद् | १०४ | १३६ |
| मालती कुसुमस्येव | ३७ | ४९ | व्यालं बालमृणाल | ७ | ८ |
| मृगमीनसज्जनानां | ६० | ७९ | शक्यो वारयितुं | १२ | १५ |
| मौनान्मूकः प्रवचन | ५७ | ७० | शशिदिवाकरयोः | १०७ | १४० |
| यथा कन्दुकपातेन | ९८ | १२९ | शशीदिवसधूसरो | ५५ | ७३ |
| यदचेतनोऽपि | ३५ | ४८ | शास्त्रोपस्कृतशब्द | १६ | १९ |
| यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं | ९ | ११ | शिरः शार्वं स्वर्गात् | ११ | १४ |
| यद् धात्रा निजभालपट्ट | ४९ | ६५ | शुभ्रं सद्मसविकमा | ११३ | १४९ |
| यः प्रीणयेत्सुचरितैः | ६९ | ९१ | श्रोत्रं श्रुतेनैव | ७५ | ९८ |
| यस्यास्ति वित्तं | ४१ | ५३ | सत्यानृता च | ४७ | ६२ |
| यां चिन्तयामि सततं | २ | २ | सन्तप्तायसि | ६८ | ९० |
| यां साधूंश्च खलान् | ११२ | १४७ | सन्त्यन्येऽपि | ३२ | ४३ |
| येनैवाम्बरखण्डेन | १०१ | १३२ | सम्पत्सु महतां | ६५ | ८६ |
| येषां न विद्या | १४ | १८ | साहित्यसंगीतकला० | १३ | १७ |
| रत्नैर्महार्हैः | ८५ | १११ | सिंहशिशुरपि | ३६ | ४८ |
| राजन्दुधुक्षसि | ४६ | ६१ | सूनुः सच्चरितः | १०९ | १४२ |
| रे-रे चातक सावधान | ९५ | १२४ | सृजति तावदशेष | १०० | १३१ |
| लज्जागुणौघजननीं | ३९ | ५१ | स्थाल्यां वैदुर्य | ११५ | १५२ |
| लभेत सिकतासु | ६ | ७ | स्वल्पस्नायुवसा | २८ | ३८ |
| लाङ्गूलचालनमधः | २९ | ४० | स्वायत्तमेकान्त | ८ | १० |
| हर्तुर्याति | १७ | २१ |
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