नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ८८ नीतिवाक्यामृतम् अपराध से अपराधी का सम्बन्ध न सिद्ध हो तो जिस न्यायकर्त्ता ने दण्ड दिया हो उसे उत्तम साहस दण्ड दे । बोलने का नियम— परमर्म्मस्पर्शिकरम्, अश्रद्धेयम्, असत्यम्, अतिमात्रं च न भाषेत ॥ ३० ॥ दूसरे को मर्मान्तिक पीड़ाकारी, अविश्वास योग्य, असत्य और बहुत ज्यादा न बोले । वेष का नियम -- वेषमाचारं वाऽनभिजातं न भजेत् ॥ ३१ ॥ ऐसा वेष और व्यवहार न करे जो अभिजात न हो । अभिजात का अर्थ होता है कुलीन, सद्वंश में उत्पन्न और शिष्ट, अतः अनभिजात इससे प्रतिकूल अर्थ का वाची हुआ। इस प्रकार इस सूत्र का स्पष्टार्थ होगा कि मनुष्य को चाहिए कि वह ऐसी वेष भूषा न धारण करे जो शिष्ट समाज में न व्यवहृत होती हो तथा ऐसा व्यवहार भी किसी से न करे जो शिष्ट परम्परा के अनुकूल न हो । राजा के अनुसार प्रजा का आचार-व्यवहार— प्रभौ विकारिणि को नाम न विकुरुते ॥ ३२ ॥ राजा के विकृत होने पर कौन नहीं विकृत होता ? अधर्मपरे राज्ञि को नाम नाधर्मपरः ॥ ३३ ॥ राजा के अधार्मिक होने पर कौन नहीं अधार्मिक होता ? राजा के द्वारा मानापमान का महत्त्व— राज्ञावज्ञातो यः स सर्वैरवज्ञायते ॥ ३४ ॥ जो राजा से तिरस्कृत होता है वह सब के द्वारा तिरस्कृत होता है । पूजितं हि पूजयन्ति लोकाः ॥ ३५ ॥ राजा से पूजित और सम्मानित को सब लोग पूजते हैं अर्थात् सम्मान करते हैं । प्रजा की देखभाल के विषय में राजा का कर्त्तव्य— प्रजाकार्यं स्वयमेव पश्येत् ॥ ३६ ॥ राजा को चाहिए कि वह प्रजा के कामों को स्वयं देखे । यथावसरमप्रतीहारसंगं द्वारं कारयेत् ॥ ३७ ॥ अवसर के अनुकूल राजा अपने द्वार परसे द्वारपाल को भी हटा दे जिससे लोग सरलता से राजा से मिल सकें । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu