भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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स्वामिसमुद्देशः ८६ दुर्दर्शो हि राजा कार्याकार्यविपर्यासमासन्नैः कार्यतेऽतिसंधीयते च द्विषद्भिः ॥ २८ ॥ जो राजा प्रजा के कार्यों को स्वयम् नहीं देखता उस दुर्दर्श, राजा के भले और बुरे कामों को उसके आसन्न वर्ती अर्थात् पास रहने वाले लोग उलट-पुलट देते हैं और शत्रु भी ऐसे राजा को धोखा देते और ठगते हैं । राजा के सङ्कट से सेवकों की लाभ की प्रवृत्ति— वैद्येषु श्रीमतां व्याधिवर्धनादिव नियोगिषु भर्तुर्व्यसनवर्धनादपरो नास्ति जीवनोपायः ॥ ३६ ॥ जिस प्रकार धनी पुरुषों की व्याधियों के बढ़ने के अतिरिक्त दूसरा उपाय वैद्य की आजीविका का नहीं है उसी प्रकार सेवकों के लिये स्वामी के संकट में पड़ने के अतिरिक्त दूसरा जीविका का उपाय नहीं है अथवा स्वामी के द्यूत मद्यपान आदि के दुर्व्यसनी होने के अतिरिक्त दूसरा उपाय नहीं है। राजा यदि दुर्व्यसनों में लिप्त हो जाता है तो नौकर चाकर उसी छल से राजा के धन का अपहरण करते रहते हैं ।

  • घूसखोरी के विषय में निर्देश और उपदेश— कार्यार्थिनो लंचो लुञ्चति ॥ ४० ॥ कार्यार्थी पुरुष को घूस-भेंट आदि लेने वाला अधिकारी लूटता है । निशाचराणां भूतबलिं न कुर्यात् ॥ ४१ ॥ राजा को चाहिए कि घूस-रिश्वत लेने वाले निशाचरों के लिये अपने भूत अर्थात् प्रजावर्ग को बलि न बनावे । अर्थात् राजा प्रजा को घूस-खोरों से बचावे । लंचो हि सर्वपातकानामागमनद्वारम् ॥ ४२॥ घूस सब पापों के आने का द्वार रूप है । मातुः स्तनमपि लुंनंति लंचोपजीविनः ॥ ४३ ॥ घूस रिश्वत से जीविकार्जन करनेवाले व्यक्ति अपनी माता का भी स्तन काट लेते हैं । लंचेन कार्याभिरुद्धः स्वामी विक्रीयते ॥ ४४ ॥ जिस स्वामी के यहाँ लंच अर्थात् घूस के कारण काम रुकता हो वह स्वामी घूसखोरों के हाथ बिक सा जाता है । घूस देने वाला उसके यहां न्याय- अन्याय सभी प्रकार के कार्य कराता है । प्रासादविध्वंसनेन लोहकीलकलाभ इव लंचेन राज्ञोऽर्थलाभः ॥४५॥ घूस रिश्वत के द्वारा धन का लाभ राजा के लिये वैसा ही है जैसे महल