नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकोशसमुद्देशः १०६ कोश वृद्धि की आवश्यकता— कोशं वर्धयन्नुत्पन्नमर्थमुपयुञ्जीत ॥ ३ ॥ राजा को चाहिए कि वह कोश की वृद्धि करता हुआ ही प्राप्त धन का उपयोग करे । कुतस्तस्यायत्यां श्रेयांसि यः प्रत्यहं काकिण्यापि कोशं न वर्ध- यति ॥ ४ ॥ जो राजा प्रतिदिन एक कौड़ी भी जोड़कर कोश की वृद्धि नहीं करता रहता भविष्य में उसका कल्याण कैसे हो सकता है ! कोशो हि भूपतीनां जीवितं न प्राणाः ॥ ५ ॥ राजाओं का वास्तविक प्राण अर्थात् जीवन उनका कोश ही होता है । क्षीणकोशो हि राजा पौरजनपदानन्यायेन ग्रसते ततो राष्ट्रशून्यता स्यात् ॥ ६ ॥ क्षीण कोश वाला राजा नागरिकों को अन्यायपूर्वक पीड़ित करता है जिससे राष्ट्र शून्य हो जाता है। लोग बस्ती छोड़-छोड़ कर भाग जाते हैं । कोशो राजेत्युच्यते न भूपतीनां शरीरम् ॥ ७ ॥ कोश राजा कहा जाता है राजाओं का शरीर नहीं राजा कहा जाता । द्रव्य की महत्ता— यस्य हस्ते द्रव्यं स जयति ॥ ८ ॥ जिसके हाथ पैसा होता है वही जीतता है । धनहीनः कलत्रेणापि परित्यज्यते किं पुनर्नान्यैः ॥ ६ ॥ धनहीन व्यक्ति को उसकी स्त्री भी छोड़ देती है तो फिर औरों से वह क्यों न परित्यक्त होगा ? न खलु कुलाचाराभ्यां पुरुषः सेव्यतामेति ॥ १० ॥ कुलीनता और सदाचार से पुरुष सेव्य नहीं होता अर्थात् जब तक पैसा न हो तब तक मनुष्य कुलीनता और सदाचार के कारण पूजित नहीं होता । स खलु महान् कुलीनश्च यस्यास्ति धनमनूनम् ॥ ११ ॥ महान् और कुलीन वही है जिसके पास प्रचुर धन है । किं तया कुलीनतया महत्तया वा या न सन्तर्पयति परान् ॥ १२ ॥ ऐसी कुलीनता और महत्ता से भी क्या लाभ जिससे दूसरों का भला न हो सके अथवा दूसरे सन्तुष्ट और परितृप्त न हों ! तस्य किं सरसो महत्त्वेन यत्र न जलानि ॥ १३ ॥ जिसमें जल ही न हो उस जलाशय की क्या महत्ता है ?