नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबलसमुद्देशः ११३ सेना का सातवां विशेष भेद— अथान्यत् सप्तमम् औत्साहिकं बलं यद्विजिगीषोर्विजययात्राकाले परराष्ट्रविलोड़नार्थमेव मिलति ॥ १३ ॥ इनके अतिरिक्त सातवीं सेना औत्साहिक सेना है जो जयाभिलाषी पुरुष के यात्राकाल में शत्रुराष्ट्र के भङ्ग कर देने के ही लिये सङ्गठित होती है । औत्साहिक सेना के गुण— क्षत्रसारत्वं, शस्त्रज्ञत्त्वं, शौर्यसारत्वम्, अनुरक्तत्वञ्चेत्यौत्साहि- कस्य गुणाः ॥ १४ ॥ क्षत्रिय राजपूतों की प्रधानता, शस्त्र निपुणता, पराक्रम प्रधान होना, और स्वामी पर अनुरक्त होना यह औत्साहिक सैन्य के गुण हैं। उक्त छः प्रकार की सेना के साथ व्यवहार का वर्णन— मौलबलाविरोधेनान्यद् बलम् अर्थमानाभ्यामनुगृह्णीयात् ॥ १५ ॥ मोल अर्थात् वांशिक योद्धाओं की सेना के सम्मान का ध्यान रखते हुए अन्य प्रकार की सेनाओं को धन दान और सम्मान से अनुगृहीत करे । मौलाख्यमापद्यनुगच्छति दण्डितमपि न दुष्यति, भवति चापरेषाम- भेद्यम् ॥ १६ ॥ मौल वर्ग की सेना आपत्तिकाल में भी स्वामी का अनुसरण करती है, दण्डित होने पर भी विद्रोह नहीं करती, और शत्रु के द्वारा अभेद्य होती है । न तथार्थः पुरुषान् योधयति यथा स्वामिसम्मानः ॥ १७ ॥ पुरुष धन प्राप्ति के कारण युद्ध में उतनी रुचि के साथ नहीं प्रवृत्त होता जितना कि स्वामी के द्वारा प्राप्त सम्मान से । सेना की विरक्ति के कारण— स्वयमनवेक्षणम् , देयांशहरणं, कालयापना, व्यसनाप्रतीकारो, विशेषविधावसंभावनञ्च तन्त्रस्य विरक्तिकारणानि ॥ १८ ॥ राजा की सेना की विरक्ति के कारण होते हैं—राजा का स्वयं सेना की देख-भाल न करना, उनको दातव्य अंश का अपहरण कर लेना, समय टालना, उनके आपत्ति ग्रस्त होने पर उसका कोई उपाय न करना, और विवाह आदि शुभावसरों पर उनका यथोचित सम्मान न करना । सेना का स्वयं निरीक्षण आवश्यक— स्वयमेवेक्षणीयं सैन्यं परैरवेक्षयन्नर्थतन्त्राभ्यां परिहीयते ॥ १९ ॥ स्वयं द्रष्टव्य सेना का दूसरों से पर्यवेक्षण कराने से राजा अर्थ और सैन्य बल से क्षीण हो जाता है । ८ नी०