नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ नीतिवाक्यामृतम् फिरता स्वरूप है । घोड़े इतने चञ्चल और तीव्र गति वाले होते हैं कि वे सेना में गति उत्पन्न कर देते हैं । अश्वबलप्रधानस्य हि राज्ञः कदनकन्दुकक्रीड़ाः प्रसीदन्ति श्रियः, भवन्ति दूरस्था अपि करस्थाः शत्रवः, आपत्सु सर्वमनोरथसिद्धयस्तु- रङ्गमा एव, सरणम् अपसरणम्, अवस्कन्दः, परानीकभेदनं च तुरङ्गम- साध्यम् एतत् ॥ ८ ॥ जिस राजा की सेवा में "अश्वबल" प्रधान होता है उसके ऊपर शत्रु संहार रूपी कन्दुक ( गेंद ) से क्रीड़ा करने वाली लक्ष्मी प्रसन्न होती है, उसके दूरवर्त्ती शत्रु भी हस्तगत हो जाते हैं । आपत्तियों में सब प्रकार के मनोरथों की सिद्धि घोड़ों के द्वारा ही होती है । सरण = आगे बढ़ना, अप- सरण = पीछे हटना, अवस्कन्द = शत्रु पर छल से प्रहार और शत्रु-सैन्य का भेदन यह सब घोड़ों की सहायता से ही सिद्ध होते हैं । जात्य घोड़े का लाभ— जात्यारूढो विजिगीषुः शत्रोर्भवति, तत्तस्य गमनं नारातिर्ददाति ॥ ६ ॥ जात्य = अच्छी नस्ल वाले घोड़े पर चढ़ा हुआ राजा शत्रु पर विजयी होता है और शत्रु उस पर आक्रमण नहीं कर पाता । संग्राम विजय के साधन— समाभूमिर्धनुर्वेदविदो रथारूढाः प्रहर्त्तारो यदा तदा किमसाध्यं नाम नृपाणाम् ॥ १० ॥ सङ्ग्राम में समतल भूमि मिले और धनुर्वेद-विशारद रथारूढ योद्धा गण हों तो राजाओं के लिये कुछ असाध्य नहीं होता । रथ की आवश्यकता— रथैरवमर्दितं परबलं सुखेन जीयते ॥ ११ ॥ रथों द्वारा कुचली गई शत्रुसेना सुखपूर्वक जीती जाती है । सेना के छह भेद— मौल-भृतक-भृत्य-श्रेणी-मित्राटविकेषु पूर्वं पूर्वं बलं यतेत ॥ १२ ॥ सेना के छह भेद हैं-मौल = वंश-परम्परा से योद्धाओं की सेना, निम्न कर्मचारियों की सेना, सेवकों की सेना, तेली, नाई, शिल्पी, चर्मकार आदि अनेक जातियों की सम्मिलित सेना, मित्रों की सेना और अरण्यचारियों की सेना इनमें क्रमशः पूर्वं--पूर्वं बलके लिये राजा को यत्न करना चाहिए-इस विचार से जन्मजात लड़ाकू जाति वालों की सेना सर्वश्रेष्ठ है । जिनमें वंश- परम्परा से सैनिक होने आये हों उन लोगों के सन्नाह से निर्मित सेना सर्व- श्रेष्ठ है ।