नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
११२ नीतिवाक्यामृतम् फिरता स्वरूप है । घोड़े इतने चञ्चल और तीव्र गति वाले होते हैं कि वे सेना में गति उत्पन्न कर देते हैं । अश्वबलप्रधानस्य हि राज्ञः कदनकन्दुकक्रीड़ाः प्रसीदन्ति श्रियः, भवन्ति दूरस्था अपि करस्थाः शत्रवः, आपत्सु सर्वमनोरथसिद्धयस्तु- रङ्गमा एव, सरणम् अपसरणम्, अवस्कन्दः, परानीकभेदनं च तुरङ्गम- साध्यम् एतत् ॥ ८ ॥ जिस राजा की सेवा में "अश्वबल" प्रधान होता है उसके ऊपर शत्रु संहार रूपी कन्दुक ( गेंद ) से क्रीड़ा करने वाली लक्ष्मी प्रसन्न होती है, उसके दूरवर्त्ती शत्रु भी हस्तगत हो जाते हैं । आपत्तियों में सब प्रकार के मनोरथों की सिद्धि घोड़ों के द्वारा ही होती है । सरण = आगे बढ़ना, अप- सरण = पीछे हटना, अवस्कन्द = शत्रु पर छल से प्रहार और शत्रु-सैन्य का भेदन यह सब घोड़ों की सहायता से ही सिद्ध होते हैं । जात्य घोड़े का लाभ— जात्यारूढो विजिगीषुः शत्रोर्भवति, तत्तस्य गमनं नारातिर्ददाति ॥ ६ ॥ जात्य = अच्छी नस्ल वाले घोड़े पर चढ़ा हुआ राजा शत्रु पर विजयी होता है और शत्रु उस पर आक्रमण नहीं कर पाता । संग्राम विजय के साधन— समाभूमिर्धनुर्वेदविदो रथारूढाः प्रहर्त्तारो यदा तदा किमसाध्यं नाम नृपाणाम् ॥ १० ॥ सङ्ग्राम में समतल भूमि मिले और धनुर्वेद-विशारद रथारूढ योद्धा गण हों तो राजाओं के लिये कुछ असाध्य नहीं होता । रथ की आवश्यकता— रथैरवमर्दितं परबलं सुखेन जीयते ॥ ११ ॥ रथों द्वारा कुचली गई शत्रुसेना सुखपूर्वक जीती जाती है । सेना के छह भेद— मौल-भृतक-भृत्य-श्रेणी-मित्राटविकेषु पूर्वं पूर्वं बलं यतेत ॥ १२ ॥ सेना के छह भेद हैं-मौल = वंश-परम्परा से योद्धाओं की सेना, निम्न कर्मचारियों की सेना, सेवकों की सेना, तेली, नाई, शिल्पी, चर्मकार आदि अनेक जातियों की सम्मिलित सेना, मित्रों की सेना और अरण्यचारियों की सेना इनमें क्रमशः पूर्वं--पूर्वं बलके लिये राजा को यत्न करना चाहिए-इस विचार से जन्मजात लड़ाकू जाति वालों की सेना सर्वश्रेष्ठ है । जिनमें वंश- परम्परा से सैनिक होने आये हों उन लोगों के सन्नाह से निर्मित सेना सर्व- श्रेष्ठ है ।
बलसमुद्देशः ११३ सेना का सातवां विशेष भेद— अथान्यत् सप्तमम् औत्साहिकं बलं यद्विजिगीषोर्विजययात्राकाले परराष्ट्रविलोड़नार्थमेव मिलति ॥ १३ ॥ इनके अतिरिक्त सातवीं सेना औत्साहिक सेना है जो जयाभिलाषी पुरुष के यात्राकाल में शत्रुराष्ट्र के भङ्ग कर देने के ही लिये सङ्गठित होती है । औत्साहिक सेना के गुण— क्षत्रसारत्वं, शस्त्रज्ञत्त्वं, शौर्यसारत्वम्, अनुरक्तत्वञ्चेत्यौत्साहि- कस्य गुणाः ॥ १४ ॥ क्षत्रिय राजपूतों की प्रधानता, शस्त्र निपुणता, पराक्रम प्रधान होना, और स्वामी पर अनुरक्त होना यह औत्साहिक सैन्य के गुण हैं। उक्त छः प्रकार की सेना के साथ व्यवहार का वर्णन— मौलबलाविरोधेनान्यद् बलम् अर्थमानाभ्यामनुगृह्णीयात् ॥ १५ ॥ मोल अर्थात् वांशिक योद्धाओं की सेना के सम्मान का ध्यान रखते हुए अन्य प्रकार की सेनाओं को धन दान और सम्मान से अनुगृहीत करे । मौलाख्यमापद्यनुगच्छति दण्डितमपि न दुष्यति, भवति चापरेषाम- भेद्यम् ॥ १६ ॥ मौल वर्ग की सेना आपत्तिकाल में भी स्वामी का अनुसरण करती है, दण्डित होने पर भी विद्रोह नहीं करती, और शत्रु के द्वारा अभेद्य होती है । न तथार्थः पुरुषान् योधयति यथा स्वामिसम्मानः ॥ १७ ॥ पुरुष धन प्राप्ति के कारण युद्ध में उतनी रुचि के साथ नहीं प्रवृत्त होता जितना कि स्वामी के द्वारा प्राप्त सम्मान से । सेना की विरक्ति के कारण— स्वयमनवेक्षणम् , देयांशहरणं, कालयापना, व्यसनाप्रतीकारो, विशेषविधावसंभावनञ्च तन्त्रस्य विरक्तिकारणानि ॥ १८ ॥ राजा की सेना की विरक्ति के कारण होते हैं—राजा का स्वयं सेना की देख-भाल न करना, उनको दातव्य अंश का अपहरण कर लेना, समय टालना, उनके आपत्ति ग्रस्त होने पर उसका कोई उपाय न करना, और विवाह आदि शुभावसरों पर उनका यथोचित सम्मान न करना । सेना का स्वयं निरीक्षण आवश्यक— स्वयमेवेक्षणीयं सैन्यं परैरवेक्षयन्नर्थतन्त्राभ्यां परिहीयते ॥ १९ ॥ स्वयं द्रष्टव्य सेना का दूसरों से पर्यवेक्षण कराने से राजा अर्थ और सैन्य बल से क्षीण हो जाता है । ८ नी०
११४ नीतिवाक्यामृतम् आश्रितभरणे, स्वामिसेवायां, धर्मानुष्ठाने, पुत्रोत्पादने च खलु न सन्ति प्रतिहस्ताः ॥ २० ॥ अपने सहारे जीने वालों का भरण-पोषण, स्वामी की सेवा, धर्म-कार्यों का अनुष्ठान और पुत्रोत्पत्ति का कार्य इन चार कार्यों में दूसरे से प्रतिनिधित्व नहीं कराया जाता। आश्रितों को दान द्वारा सन्तुष्ट करने की विधि— तावद् देयं यावदाश्रिताः सम्पूर्णतामाप्नुवन्ति ॥ २१ ॥ अपने आश्रितों को स्वामी को इतना धन देना चाहिए जिससे वह पूर्ण सन्तुष्ट हो सकें। सेना का राजा के प्रति कर्तव्य— न हि स्वं द्रव्यमव्ययमानो राजा दण्डनीयः ॥ २२ ॥ राजा यदि अपना धन (सेवक का, सैन्य का वेतन आदि) न भी दे तब भी उस पर कुपित अथवा उसे दण्डित न करना चाहिए। अर्थात् सेना को चाहिए कि वह विद्रोह करके राजासे हठात् वेतन लेने की चेष्टा न करे। को नाम सचेताः स्वगुडं चौर्यात् खादेत् ॥ २३ ॥ कौन ऐसा समझदार व्यक्ति होगा जो अपना गुड़ चोराकर खायेगा। किं तेन जलदेन यः काले न वर्षति ॥ २४ ॥ जो समय पर वर्षा न करे उस मेघ से क्या लाभ ? स किंस्वामी य आश्रितेषु व्यसने न प्रविधत्ते ॥ २५ ॥ वह स्वामी निन्दनीय है जो अपने आश्रितों की आपत्तिकाल में सहायता नहीं करता। राजा का सेना के प्रति कर्त्तव्य— अविशेषज्ञे राज्ञि को नाम तस्यार्थे प्राणव्ययेनोत्सहेत ॥ २६ ॥ जो राजा गुणग्राही और कृतज्ञ नहीं है उसके लिये कौन प्राण देने को उत्साहित होगा ? [ इति बलसमुद्देशः ] २३. मित्रसमुद्देशः मित्र का लक्षण— यः सम्पदीव विपद्यपि मेद्यति तन्मित्रम् ॥ १ ॥ जो सुख के दिनों के समान दुःख के दिनों में भी स्नेह करता है वह 'मित्र' है।
मित्रसमुद्देशः ११५ नित्य मित्र का लक्षण— यः कारणमन्तरेण रक्ष्यो रक्षको वा भवति तन्नित्यं मित्रम् ॥ २ ॥ बिना किसी कारण के ही जिनमें परस्पर रक्ष्य-रक्षक भाव होता है वह नित्य मित्र है । सहज मित्र का लक्षण— तत्सहजं मित्रं यत् पूर्वपुरुषपरम्परायातः सम्बन्धः ॥ ३ ॥ पूर्वजों की परम्परा से जहां सम्बन्ध हो वह सहज मित्र है । कृत्रिम मित्र का लक्षण— यद्वृत्तिजीवितहेतोराश्रितं तत् कृत्रिमं मित्रम् ॥ ४ ॥ जीविका अथवा प्राणरक्षा के लिए जो आश्रित होता है वह कृत्रिम मित्र है । मित्र के गुण— व्यसनेषूपस्थानमर्थेष्वविकल्पः, स्त्रीषु परमं शौचं, कोपप्रसादविषये वाऽप्रतिपक्षत्वमिति मित्रगुणाः ॥ ५ ॥ मित्र के सङ्कटग्रस्त होने पर सहायतार्थ समुपस्थित होना, द्रव्य के संबन्ध में कपट हीन होना, स्त्री के संबन्ध में परम पवित्र भाव रखना, क्रोध आने पर मनावन की आशा न करना अथवा प्रतिकूल न होना यह मित्र के गुण हैं । मित्र के दोष— दानेन प्रणयः, स्वार्थपरत्वं, विपद्युपेक्षणम्, अहितसम्प्रयोगो, विप्र- लम्भनगर्भप्रश्रयश्चेति मित्रदोषाः ॥ ६ ॥ दान के कारण प्रेम करना, स्वार्थपरता, विपत्ति के अवसर पर उपेक्षा कर देना, मित्र के अहितकारी शत्रु आदि से व्यवहार रखना, और कपट मिश्रित अर्थात् दिखावटी नम्रता का प्रदर्शन यह मित्र के दोष हैं । मैत्री भेद के कारण— स्त्रीसंगतिर्विवादोऽभीक्ष्णयाचनमप्रदानमर्थसम्बन्धः परोक्षदोषग्रहणं पैशून्याकर्णनञ्च मैत्रीभेदकरणानि ॥ ७ ॥ मित्र की स्त्री से समागम करना, मित्र से विवाद करना, बारम्बार पैसा रुपया आदि मांगते रहना, उसे कुछ न देना, रुपये पैसे के लेन देन आदि का सम्बन्ध रखना, परोक्ष में ( पीठ पीछे ) दोषों की चर्चा करना, और उसकी चुगली सुनना इन सब कारणों से मित्रता भङ्ग होती है ।
११६ नीतिवाक्यामृतम् मैत्री के लिये आदर्श— न हि क्षीरात्परं महदस्ति, यत्सङ्गतिमात्रेण करोति नीरम् आत्म- समम् ॥ ८ ॥ मैत्री के आदर्शों में दूध से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है जो मिलते ही पानी को अपने तुल्य बना लेता है । न नीरात्परं महदस्ति यन्मिलितमेव संवर्धयति रक्षति च स्वक्षयेण क्षीरम् ॥ ६ ॥ पानी से भी बढ़ कर दूसरी वस्तु नहीं है जो दूध से मिलते ही उसकी वृद्धि करता है ओर अपने को मिटा कर ( जल जाने पर ) भी दूध की रक्षा करता है । येन केनाप्युपकारेण तिर्यञ्चोऽपि प्रत्युपकारिणोऽव्यभिचारिणश्च न पुनः प्रायेण मनुष्याः ॥ १० ॥ पशु आदि तिर्यग्योनि के भी प्राणी कुछ न कुछ उपकार करके प्रत्युपकार करते हैं और उपकारी के प्रतिकूल नहीं होते किन्तु मनुष्यों में प्रायः ऐसा नहीं देखा जाता । यहां आचार्य प्रवर का आशय यह है कि विचार करने पर यह ज्ञात होता है कि पशु-पक्षी तो उपकृत होने पर उपकार करने वाले की कुछ न कुछ भलाई प्रत्युपकार के रूप में अवश्य करते हैं ओर प्रतिकूल तो कभी होते ही नहीं किन्तु मनुष्य ऐसा है कि वह कृतघ्नता भी कर बैठता है अतः मनुष्य को पशु-पक्षियों से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए । इस सम्बन्ध में दो उदाहरण आख्यान के रूप में यों हैं :— तथा चोपाख्यानकम्— अटव्यां किलान्धकूपे पतितेषु कपिसर्पसिंहाक्षाशालिक-सौवर्णिकेषु कृतोपकारः कङ्कायननामा कश्चित् पान्थो विशालायां धुरि तस्मादाक्ष- शालिकाद् व्यापादनमवाप नाडीजङ्घश्च गौतमादिति ॥ ११ ॥ जङ्गल में एक बार घास फूस से ढंके हुए एक अन्धकूप में बन्दर, सर्प, सिंह और आक्षशालिक अर्थात् एक जुआड़ी सुनार अथवा सर्राफ गिर पड़े । उधर से संयोगवश कङ्कायन नाम का एक पथिक आया और उसने क्रमशः सबको कुएं से निकाल कर उनका उपकार किया—जिनमें से बन्दर सर्प और सिंह ने तो उस पथिक के साथ यथाशक्ति उपकार करके अपने अपने घर का रास्ता लिया किन्तु उस जुआड़ी ने उसके संग घूमते रहकर मित्रता की और विश्वास उत्पन्न किया किन्तु अन्त में उस पथिक के पास वर्तमान धन की
राजरक्षासमुद्देशः ११७ प्राप्ति के लोभ से उसे विशाला नगरी में जब कि वह किसी शून्य देवालय में सो रहा था—तब रात्रि के समय मार डाला। इसी प्रकार नाडीजङ्घ नाम के किसी उपकारी को गौतम नामक व्यक्ति ने मार डाला था। [ इति मित्रसमुद्देशः ] २४. राजरक्षासमुद्देश राजा की सर्वविध रक्षा आवश्यक है— राज्ञि रक्षिते सर्वं रक्षितं भवत्यतः स्वेभ्यः परेभ्यश्च नित्यं राजा रक्षितव्यः ॥ १ ॥ राजा की रक्षा होने पर सब की रक्षा होती है अतः आत्मीयों पट्टीदारों आदि और अनात्मीयों = शत्रु आदि से राजा की रक्षा सर्वदा करनी चाहिए। राजरक्षा के उपाय— सम्बन्धानुबद्धं शिक्षितमनुरक्तं कृतकर्माणं च जनम् आसन्नं कुर्वीत ॥ २ ॥ इसीलिये नीतिवेत्ताओं ने कहा है कि राजा को अपना अङ्गरक्षक और आसन्नचारी ऐसे आदमी को बनाना चाहिए जिसका पिता और पितामह की परम्परा से कोई सम्बन्ध रहा हो, महासम्बन्ध अर्थात् विवाह आदि के सम्बन्ध से वह कोई सम्बन्धी होता हो, शिक्षित हो, और अपने प्रति अनुरक्त एवं श्रद्धालु हो तथा राज-काज कर चुका हो। अन्यदेशीयम्, अकृतार्थमानं, स्वदेशीयञ्चापकृत्योपगृहीतम्-आसन्नं न कुर्वीत ॥ ३ ॥ जो अन्य देश का हो, धनादि देकर जिसका कभी सम्मान न किया हो अपने देश का भी हो किन्तु कभी स्वयं दण्डित करके पुनः उसे रख लिया हो, इस प्रकार के व्यक्तियों को राजा अपना आसन्न चारी न बनावे। चित्तविकृतेर्नास्त्यविषयः, किन्न भवति माताऽपि राक्षसी ॥ ४ ॥ चित्त में विकृति उत्पन्न होने पर—नियत बिगड़ने पर मनुष्य के लिये कोई भी कार्य अकार्य नहीं रह जाता। क्या माता भी राक्षसी होती नहीं देखी जाती ? वह अपने ही पुत्र का अपने हाथों से गला घोंटने वाली देखी जाती हैं। अस्वामिकाः प्रकृतयः समृद्धा अपि निस्तरीतुं न शक्नुवन्ति ? ॥५॥ बिना स्वामी की प्रजा समृद्ध होकर भी सङ्कट के समय स्वयम् अपना उद्धार नहीं कर सकती।
११८ नीतिवाक्यामृतम् देहिनि गतायुषि सकलाङ्गे किं करोति धन्वन्तरिरपि वैद्यः ॥ ६ ॥ जब प्राणी की आयु ही निःशेष हो गई हो तब समस्त अंगों के होते हुए भी धन्वन्तरि भी वैद्य के रूप में क्या कर सकते हैं ? राजा की रक्षा के लिये विचारणीय क्रम— राज्ञस्तावदासन्नाः स्त्रिय आसन्नतरा दायादा, आसन्नतमाश्च पुत्रा- स्ततो राज्ञः प्रथमं स्त्रीभ्यो रक्षणं ततो दायादेभ्यस्ततः पुत्रेभ्यः ॥ ७ ॥ राजा की समीपवर्तिनी स्त्रियां होती हैं, उनसे अधिक समीपवर्ती दायाद- पट्टीदार और उनसे भी निकटतम पुत्र होते हैं । अतः सर्व प्रथम स्त्रियों से राजा की रक्षा करनी चाहिए उसके अनन्तर पट्टीदारों से और तब पुत्रों से रक्षा करनी चाहिए । आप्लवङ्गादाचक्रवर्त्तिनः सर्वोऽपि स्त्रीसुखाय क्लिश्यति ॥ ८ ॥ वानर से लेकर चक्रवर्ती राजा तक सभी व्यक्ति स्त्री-सुख की प्राप्ति के लिये ही क्लेश उठाते हैं । निवृत्तस्त्रीसङ्गस्य धनपरिग्रहो मृतमण्डनमिव ॥ ६ ॥ वनिताओं के सुख भोग से विरक्त व्यक्ति के लिये धन का संचय मृतक को वस्त्राभूषण आदि से सुसज्जित करने के समान व्यर्थ है । स्त्रियों की प्रकृति का वर्णन— सर्वाः स्त्रियः क्षीरोदवेला इव विषामृतस्थानम् ॥ १० ॥ सभी स्त्रियां क्षीरसमुद्र के समान विष और अमृत दोनों का स्थान हैं । समुद्रमन्थन करने पर उसी से हलाहल विष और अमृत दोनों ही निकले थे उसी प्रकार स्त्रियां अमृत के समान सुखदायक और विष के समान दुःखदायक दोनों ही हैं । मकरदंष्ट्रा इव स्त्रियः स्वभावादेव वक्रशीलाः ॥ ११ ॥ मगर की दाढ़ के समान स्त्रियां स्वभाव से ही कुटिल स्वभाव वाली होती हैं । स्त्रीणां वशोपायो देवानांमपि दुर्लभः ॥ १२ ॥ स्त्रियों को वश में कर लेने का उपाय देवताओं के लिये भी दुर्लभ है । कलत्रं रूपवत् , सुभगम् , अनवद्याचारम् , अपत्यवदिति महतः पुण्यस्य फलम् ॥ १३ ॥ स्त्री-सुन्दरी, सौभाग्यशालिनी, अनिन्द्य चरित्रवाली और संतानवाली हो यह महान् पुण्य से होता है । कामदेवोत्सङ्गस्थापि स्त्री पुरुषान्तरम् अभिलषति च ॥ १४ ॥
राजरक्षासमुद्देशः ११६ कामदेव की भी गोद में बैठी हुई स्त्री पर पुरुष की अभिलाषा करती ही है । न मोहो, लज्जा, भयं, स्त्रीणां रक्षणं किन्तु परपुरुषादर्शनं संभोगः सर्वसाधारणता च ॥ १५ ॥ मोह, लज्जा और भय से स्त्री की रक्षा नहीं हो सकती किन्तु उसकी रक्षा के तीन ही उपाय हैं वह पर पुरुष को देख न सके, पति द्वारा उसे संभोग सुख प्राप्त होता रहे, और पति यदि अन्य स्त्रियों से भी सम्पर्क रखता हो तो उन सबमें सर्वथा समान व्यवहार रखे । दानदर्शनाभ्यां समवृत्तौ हि पुंसि नापराध्यन्ते स्त्रियः ॥ १६ ॥ जिस पुरुष को बहुत सी स्त्रियां हों वह यदि उन सबसे समानरूप से मिलता-जुलता और रुपया-पैसा तथा वस्त्रालङ्कार आदि देता रहता है तो कोई भी स्त्री उससे विरोध नहीं करती । परिगृहीतासु स्त्रीषु प्रियाप्रियत्वं न मन्येत ॥ १७ ॥ विवाहिता पत्नियों में प्रिय-अप्रिय का भेद न रक्खे । सबको समान भाव से माने । कारणवशान्निम्बोऽप्यनुभूयत एव ॥ १८ ॥ कारणवश अर्थात् रोगादि की शान्ति के लिये नीम भी खाई जाती है अतः स्त्रीविरोध के कारण अपने नाश को बचाने हेतु सुन्दरी कुरूपा समस्त प्रकार की विवाहित पत्नियों में एक जैसा व्यवहार करे । ऋतुमती स्त्री के प्रति पुरुष का कर्त्तव्य-- चतुर्थदिवसस्नाता स्त्री तीर्थं तीर्थापराधो महान् धर्मानुबन्धः ॥१९॥ ऋतुमती स्त्री जब चौथे दिन स्नान करती है तब वह तीर्थ तुल्य है उस समय पति का उसके पास न जाना तीर्थ में अपराध करने के समान महान् अधर्म का कारण होता है । ऋतावपि स्त्रियमुपेक्षमाणः पितृणामृणभाजनम् ॥ २० ॥ जो ऋतुकाल में स्त्री समागम नहीं करता और उसकी उपेक्षा करता है वह अपने पितरों का ऋणी बना रहता है । अवरुद्धाः स्त्रियः स्वयं नश्यन्ति स्वामिनं वा नाशयन्ति ॥ २१ ॥ ऋतुकाल में भी उपेक्षित स्त्रियां स्वयं नष्ट हो जाती हैं अथवा स्वामी का नाश कर देती हैं ! न स्त्रीणामकर्त्तव्ये मर्यादास्ति, वरमविवाहो नोढोपेक्षणम् ॥ २२ ॥ स्त्री के कुकृत्य की कोई मर्यादा नहीं है अर्थात् वह बुरे से बुरा कार्य कर
१२० नीतिवाक्यामृतम् सकती है । मनुष्य का विवाह न करना श्रेष्ठ है किन्तु विवाहिता की उपेक्षा ठीक नहीं है । स्त्री रक्षा की आवश्यकता-- अकृतरक्षस्य किं कलत्रेण, अकृषतः किं क्षेत्रेण ॥ २३ ॥ जो खेती नहीं करता उसके लिये जिस प्रकार खेत व्यर्थ है उसी प्रकार जो स्त्री की रक्षा न कर सके उसके लिये स्त्री व्यर्थ है । पति से स्त्री की विरक्ति के कारण-- सपत्नीविधानं, पत्युरसमञ्जसं च, विमाननमपत्याभावश्च चिर- विरहश्च स्त्रीणां विरक्तिकारणानि ॥ २४ ॥ एक स्त्री होते हुए दूसरा-तीसरा विवाह कर सपत्नी बनाना, पति के मन से मन का न मिलना, पति के द्वारा अनादर, सन्तान का अभाव, और पति का चिर वियोग-इन कारणों से स्त्रियां पति से विरक्त हो जाती हैं । स्त्री के भले बुरे होने में संगति की प्रधानता-- न स्त्रीणां सहजो गुणो दोषो वास्ति किन्तु नद्यः समुद्रमिव यादृशं पतिमाप्नुवन्ति तादृश्यो भवन्ति स्त्रियः ॥ २५ ॥ स्त्रियों में स्वाभाविक गुण-दोष नहीं होता, किन्तु नदियां जिस प्रकार समुद्र में मिलकर खारे जलवाली हो जाती हैं उसी प्रकार पति के गुण दोषों के अनुरूप स्त्रियां भी गुण दोषवती बन जाती हैं । स्त्रियों में स्त्री दूत की आवश्यकता-- स्त्रीणां दौत्यं स्त्रिय एव कुर्युस्तैरश्चोऽपि पुंयोगः स्त्रियं दूषयति किं पुनर्मानुष्यः ॥ २६ ॥ स्त्रियों के पास सन्देश आदि भेजने के लिये स्त्रियों को ही दूती बनाना चाहिए क्योंकि तिर्यक् योनि के पशु आदि के पुरुष-संयोग से स्त्रियां दूषित हो जाती हैं, फिर मनुष्य संयोग के विषय में तो कहना ही क्या है ? स्त्रीरक्षण का उद्देश्य-- वंशविशुद्ध्यर्थम् अनर्थपरिहारार्थं स्त्रियो रक्ष्यन्ते न भोगार्थम् ॥ २७ ॥ स्त्रियों की रक्षा अर्थात् विवाह आदि करके स्त्री का लाना वंश की शुद्धि और अनर्थों से बचाव के लिये किया जाता है केवल भोग के लिये नहीं । वेश्या के साथ व्यवहार-- भोजनवत् सर्वसमानाः पण्याङ्गनाः कस्तासु हर्षामर्षयोरवसरः ॥२८॥ जिस प्रकार होटल आदि का बाजारू भोजन सबके लिये समान रूप से सुलभ होता है उसी प्रकार वेश्याएं सर्वसाधारण के उपभोग के लिये होती हैं उनमें हर्ष और अमर्ष ( क्रोध ) कैसा ?
राजरक्षासमुद्देशः १२१ यथाकामं कामिनीनां संग्रहः परमनर्थषानकल्याणावहः प्रक्रमोऽदौ- वारिके द्वारि को नाम न प्रविशति ॥ २६ ॥ राजा अपने सौख्य के अनुसार कामिनियों (वेश्याओं) को रख सकता है। किन्तु यह काम अनर्थकारी और अमङ्गलकारक है। वेश्या किसी दूसरे से सम्पर्क न रखे अथवा उसके यहां कोई दूसरा न आवे यह कैसे हो सकता है ? जिस द्वार पर उसका रक्षक कोई द्वारपाल नहीं होता वहां कौन नहीं प्रविष्ट होता ? राजा के योग्य वेश्या— मात्राभिजनविशुद्धाः, राज्ञः उदवसत्युपस्थायिन्यः स्त्रियः संभो- क्तव्याः ॥ ३० ॥ जिनकी माता के विषय में ज्ञात हो सके और जो राजद्वार पर नृत्य आदि के निमित्त आती रहती हों ऐसी ही वेश्याएं राजा के भोग योग्य हैं। दर्दुरस्य सर्पगृहप्रवेश इव स्त्रीगृहप्रवेशो राज्ञः ॥ ३१ ॥ राजा का (परकीया अथवा वेश्या) स्त्रीगृह में प्रवेश वैसा ही निरापद नहीं है जैसा कि मेढक का सर्प के गृह में प्रवेश। न हि स्त्रीगृहादायातं किञ्चित् स्वयमनुभवनीयम् ॥ ३२ ॥ स्त्री के गृह से आया हुआ कोई भी भोज्य आदि राजा को स्वयम् नहीं खाना चाहिए। अर्थात् उसका दूसरों से परीक्षण करा करके ही कि उसमें विष आदि तो नहीं मिला है राजा को उसका उपयोग करना चाहिए। नापि स्वयमनुभवनीयेषु स्त्रियो नियोक्तव्याः ॥ ३३ ॥ स्वयम् अनुभवनीय वस्तुओं अर्थात् भोजन आदि के विषयों में स्त्रियों को नहीं नियुक्त करना चाहिए। स्त्रियों के निन्दनीय कृत्य और तत्सम्बन्धी आख्यान— संवननं स्वातन्त्र्यं चाभिलषन्त्यः स्त्रियः किं नाम न कुर्वन्ति ॥३४॥ वशीकरण, मारण मोहन आदि और स्वतन्त्रता की अभिलाषा करती हुई स्त्रियां क्या नहीं कर डालतीं ? अर्थात् निन्दनीय से भी निन्दनीय कुकृत्य करने में उनको सङ्कोच नहीं होता। श्रूयते हि किल आत्मनः स्वच्छन्दवृत्तिमिच्छन्ती विषविदूषित- गण्डूषेण मणिकुण्डला महादेवी यवनेषु निजतनूजराज्यार्थं जघान राजा- नमङ्गम् ॥ ३५ ॥
१२२ नीतिवाक्यामृतम् आख्यानों से अवगत होता है कि अपनी स्वच्छन्दता के लिये महादेवी मणिकुण्डला ने अपने पुत्र को राज्य पर अभिषिक्त करने की अभिलाषा से यवनदेश में अङ्गराज का वध कर दिया था। विषालक्तकदिग्धैनाधरेण वसन्तमतिः शूरसेनेषु सुरतविलासं, विषो- पलिप्तेन मणिना वृकोदरी दशार्णेषु मदनार्णवं, निशितनेमिना मुकुरेण मदिराक्षी मगधेषु मन्मथविनोदं, कबरीनिगूढेनासिपत्रेण चन्द्ररसा पाण्ड्येषु पुण्डरीकमिति ॥ ३६ ॥ जहरीले आलते से रंगे हुए अपने अधरोष्ठ के द्वारा वसन्तमति ने मथुरा में सुरतविलास नाम के राजा को, विदिशा (भेलसा) में वृकोदरी ने विष से रंगी हुई मणि के द्वारा मदनार्णव को, मगध में मदिराक्षी ने तीक्ष्ण धार वाले दर्पण से मन्मथ विनोद को और पाण्ड्य०देश में (तिनेवली, मद्रास) चन्द्ररसा ने केशपाश के भीतर छिपाई हुई तलवार अथवा छुरे से पुण्डरीक को मार डाला था। अमृतरसवाप्य इव क्रीडासुखोपकरणं स्त्रियः ॥ ३७ ॥ अमृत रस की बावली के समान स्त्रियां लक्ष्मी के विलास से सुलभ सुखों की साधन हैं। अतः— कस्तासां कार्याकार्यवलोकनेऽधिकारः ॥ ३८ ॥ वे क्या अच्छा काम करती हैं क्या बुरा काम करती हैं इसको देखने का क्या प्रयोजन है ? अर्थात् अमृत रस के समान आह्लादित करने वाली स्त्रियों के कर्तव्य-कर्तव्य का विवेचन व्यर्थ है। उनका सदुपयोग करना चाहिये। स्त्री की स्वतन्त्रता के क्षेत्र-- अपत्यपोषणे, गृहकर्मणि, शरीरसंस्कारे, शयनावसरे स्त्रीणां स्वातन्त्र्यं नान्यत्र ॥ ३६ ॥ सन्तान पालन, गृहस्थी के दैनिक कार्यकलाप, शारीरिक श्रृंगार और पति के साथ शयन इन चार कार्यों में स्त्रियों को स्वतन्त्रता देनी चाहिए अन्यत्र नहीं। स्त्री के अतिस्वातन्त्र्य से दुष्परिणाम-- अतिप्रसक्तेः स्त्रीषु स्वातन्त्र्यं करपत्रमिव पत्युर्नाविदार्य हृदयं विश्राम्यति ॥ ४० ॥ अत्यन्त आसक्त होकर स्त्रियों को पूर्ण स्वतन्त्रता देने का परिणाम यह होता है कि वे आरे के समान-पति के हृदय को विदीर्ण किये बिना विश्राम
राजरक्षासमुद्देशः १२५ नहीं लेतीं। अर्थात् स्त्री को अति स्वतन्त्र करने का परिणाम पति की मृत्यु है। स्त्री वशवर्त्ती होने का कुफल— स्त्रीवशपुरुषो नदीप्रवाहपतितपादप इव न चिरं नन्दति ॥ ४१ ॥ स्त्री के वश में पड़ा हुआ पुरुष नदी के प्रवाह में पड़े हुए वृक्ष के समान चिरकाल तक सुखी नहीं रहता । जिस प्रकार नदी की धार में पड़ा हुआ पेड़ थोड़ी ही देर में उखड़ कर नष्ट हो जाता है उसी प्रकार स्त्री के अत्यन्त अधीन हुआ पुरुष शीघ्र नष्ट हो जाता है । स्त्री को वशवर्तिनी बनाने का लाभ— पुरुषमुष्टिस्था स्त्री खड्गयष्टिरिव कमुत्सवं न जनयति ॥ ४२ ॥ तलवार की मूठ को हाथ में लेकर वीर पुरुष उसे चाहे जैसे चलाकर जिस प्रकार आनन्दित होता है उसी प्रकार स्त्री को अपनी मुट्ठी में दबाकर अर्थात् अपने वश में रख कर कौन सा ऐसा आनन्द है जिसका उपयोग पुरुष नहीं कर सकता। अर्थात् सभी सुख प्राप्त कर सकता है। स्त्री-शिक्षा की नीति— नातीव स्त्रियो व्युत्पादनीयाः, स्वभावसुभगोऽपि शास्त्रोपदेशः स्त्रीषु, शस्त्रीषु पयोलव इव विषमतां प्रतिपद्यते ॥ ४३ ॥ स्त्रियों को शास्त्र की अधिक शिक्षा नहीं देनी चाहिए। स्वभावतः मनोरम भी शास्त्रोपदेश स्त्रियों को उसी प्रकार विनष्ट कर देता है जिस प्रकार छुरी या तलवार पर पड़ी हुई पानी की बूंद भी उसमें मोर्चा आदि लगाकर उसे नष्ट कर देती है । वेश्या को द्रव्योपहार देने का क्रम— अध्रुवेण साधिकोऽप्यर्थेन वेश्यामनुभवति ॥ ४४ ॥ अधिक धन वाला भी व्यक्ति अनिश्चित अर्थ-दान से वेश्या का उपभोग करे। अर्थात् उसके लिये कोई निश्चित द्रव्य राशि का प्रबन्ध न कर दे। उसे कभी थोड़ा कभी अधिक धन देता रहे इससे आशा-वश वेश्या की अनुरक्ति बनी रहती है अन्यथा निश्चित आय समझकर वह विरक्त होकर अनर्थ करने लगती है । वेश्या सम्बन्धी कुछ उत्तम उपदेश— विसर्जनाकारणाभ्यां तदनुभवे महाननर्थः ॥ ४५ ॥ वेश्या को नित्य घर पर बुलाना ओर भेजना--इस प्रकार से वेश्या का
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१२४ नीतिवाक्यामृतम् उपभोग करने में महान् अनर्थ की संभावना है। इससे उसके अन्य प्रेमी ईर्ष्यालु होकर वधादि उपद्रव कर सकते हैं। वेश्यासक्तिः प्राणार्थहानिं कस्य न करोति ॥ ४६ ॥ वेश्या पर अत्यन्त आसक्ति करने से किसके प्राण और अर्थ की हानि नहीं होती । धनमनुभवन्ति वेश्या न पुरुषम् ॥ ४७ ॥ वेश्याएं धन का उपभोग करती हैं पुरुष का नहीं । धनहीने कामदेवेऽपि न प्रीतिं बध्नन्ति वेश्याः ४८ ॥ कामदेव के समान भी सुन्दर व्यक्ति यदि निर्धन होता है तो उस पर वेश्या का अनुराग नहीं होता । स पुमानायतिसुखी यस्य सानुशयं वेश्यासु दानम् ॥ ४६ ॥ वेश्याओं को पैसा रुपया देते समय जिसके हृदय में मानसिक ग्लानि और अनुताप हुआ करता है वह मनुष्य अन्त में अर्थात् भविष्य में अत्यन्त सुख का अनुभव करता है। क्योंकि ऐसा आदमी अवश्य ही किसी न किसी दिन उससे विरक्त होकर सुखी होगा । स पशोरपि पशुः यः स्वधनेन परेषामर्थवतीं करोति वेश्याम् ॥५०॥ वह व्यक्ति पशु से भी बढ़कर है जो अपने धन से वेश्या को दूसरे के लिये धनाढ्य बनाता है। वेश्या का कोई निश्चित उत्तराधिकारी नहीं होता जिससे उसे प्राप्त प्रचुर धन को इधर उधर का नीच व्यक्ति ही प्राप्त करता है। इस स्थिति में यदि कोई व्यक्ति वेश्या को धन देता है तो वह पशु से भी बढ़कर अविवेकी है क्योंकि वह ऐसी जगह धन फेंक रहा है जहाँ से उसे कोई सहायता नहीं मिल सकती। अपनी पत्नी को दिया गया धन सङ्कट आ पड़ने पर सहायक होता है अथवा अन्य कामों में व्यय करने से यश आदि होता है पर वेश्या को दिया गया धन तो इहलोक परलोक दोनों को बिगाड़ने वाला है। आचित्तविश्रान्तेर्वेश्यापरिग्रहः श्रेयान् ॥ ५१ ॥ वेश्या का सेवन चित्त की चञ्चलता मात्र दूर करने तक ही सीमित रखना चाहिए । यहाँ आचार्य प्रवर का आशय यह है कि राजा को यदि कभी किसी कारणवश किसी वेश्या पर अनुरक्ति हो तो उससे समागम कर पुनः उसका त्याग देना ही कल्याणकर है । सुरक्षितापि वेश्या स्वां प्रकृतिं न मुञ्चति ॥ ५२ ॥
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राजरक्षासमुद्देशः १२५ प्रचुर धनधान्य से सन्तुष्टकर सुरक्षित होने पर भी वेश्या अपनी प्रकृति अर्थात् परपुरुष समागम की इच्छा नहीं छोड़ती । प्राणियों की प्रकृति की अपरिवर्त्तनीयता— या यस्य प्रकृतिः सा तस्य दैवेनापि नापनेतुं शक्यते ॥ ५३ ॥ जिसकी जो प्रकृति सहज-स्वभाव होता है उसे विधाता भी नहीं दूर कर सकता । सुभोजितोऽपि श्वा किमशुचीन्यस्थीनि परिहरति ॥ ५४ ॥ सुन्दर भोजन कराने पर भी क्या कुत्ता अपवित्र हड्डियों का खाना छोड़ देता है ? अर्थात् नहीं । न खलु कपिः शिक्षाशतेनापि चापलयं परिहरति ॥ ५५ ॥ बहुत सिखाने पर भी बन्दर अपनी चञ्चलता नहीं छोड़ता । इक्षुरसेनापि सिक्तो निम्बः कटुरेव ॥ ५६ ॥ ईख के रस से भी सींची गई नीम कड़वी ही रहती है । निकट सजातियों के सम्मान-असम्मान का विचार— सन्मानादवसादो कुल्यानामपरिग्रहहेतुः ॥ ५७ ॥ कुल्य अर्थात् स्वजातियों को अधिक सन्मान न देने से उनसे सम्बन्ध छूटता जाता है। अर्थात् उनका अधिक सन्मान और संग्रह नहीं करना चाहिए । तन्त्रकोशवर्द्धनी वृत्तिर्दायादान् विकारयति ॥ ५८ ॥ अपने दायादों अर्थात् कुटुम्बियों को उनका सैन्य और कोश बढ़ाने वाली जीविका प्रदान करने से उनके चित्त में विकार उत्पन्न होता है । अर्थात् अपना सैन्य बल और कोश बल बढ़ जाने पर अपना कुटुम्बी स्वयं राजा बन बैठने की घात सोचता है । भक्तिविश्रम्भादव्यभिचारिणं कुल्यं पुत्रं वा संवर्धयेत् ॥ ५९ ॥ किस प्रकार के कुटुम्बी अथवा पुत्र की शक्ति बढ़ानी चाहिए इस पर आचार्य प्रवर कहते हैं कि अपने प्रति जिसके दृढ़ अनुराग और भक्ति की पूर्ण प्रतीति निश्चित हो ऐसे दायाद अथवा पुत्र का विशेष सम्बर्द्धन करना चाहिए सबका नहीं । विनियुञ्जीत उचितेषु कर्मसु ॥ ६० ॥ पूर्वसूत्र में निर्दिष्ट दायाद को उसके अनुराग और भक्ति का परीक्षण करने के निमित्त उसे उचित कार्यों में नियुक्त करे । भर्तुरादेशं न विकल्पयेत् ॥ ६१ ॥ स्वामी के आदेश-पालन में किसी प्रकार का सोच-विचार न करे ।
१२६ नीतिवाक्यामृतम् अन्यत्र प्राणबाधाबहुजनविरोधपातकेभ्यः ॥ ६२ ॥ स्वामी का आदेश बिना संशय करने को तत्पर अवश्य रहे किन्तु तीन बातों का विचार तो कर ही ले कि उससे, अपना प्राण तो संकट में नहीं पड़ रहा है, जनता का विरोध तो नहीं मिल रहा है तथा कोई पाप तो नहीं बन पड़ रहा है । बलवान् सजातियों के प्रति राजा का कर्तव्य— बलवत्-पक्षपरिग्रहेषु दायिष्वाप्तपुरुषपुरःसरो विश्वासो वशीकरणं गूढपुरुषनिक्षेपः प्रणिधिर्वा ॥ ६३ ॥ किसी कारण-वश बलवान् बन बैठे हुए दायादों को वश में करने के लिये उनके पास आप्त पुरुषों को भेजकर अपने में विश्वास उत्पन्न कराना चाहिए अथवा अपना गुप्तचर भेजकर उनका रहस्य अवगत करते रहना चाहिए कि वह राज्य विनाश का कोई षड्यन्त्र तो नहीं कर रहे हैं । दुर्बोधे सुते दायादे वा सम्यग् युक्तिभिर्दुर्भिनिवेशमुत्तार- येत् ॥ ६४ ॥ किसी दुराग्रहपूर्ण कार्य करने के लिये तुले हुए पुत्र और दायाद को युक्ति के साथ समझा-बुझा कर उसका दुराग्रह दूर करना चाहिए । उपकारी सज्जनों के प्रति सद्व्यवहार आवश्यक— साधूपूचर्यमाणेषु विकृतिभजनं स्वहस्तादंगाराकर्षणमिव ॥६५॥ उपकारक साधु-पुरुषों के प्रति दुर्व्यवहार करना अपने ही हाथों आग का अङ्गारा खींचने के समान है । सन्तति के शुभाशुभ का विचार — क्षेत्रबीजयोर्वैकृत्यमपत्यानि विकारयति ॥ ६६ ॥ जिस प्रकार क्षेत्र और बीज यदि बुरे हों तो खेती विनष्ट होती है उसी प्रकार क्षेत्र और बीज तुल्य माता-पिता में विकृति होने से सन्तान में भी विकृति होती है । कुलविशुद्धिरुभयतः प्रीतिर्मनःप्रसादोऽनुपहतकालसमयश्च श्रीसर- स्वत्यावाहनमन्त्रयुतपरमान्नोपयोगश्च पुरुषोत्तममवतारयन्ति ॥ ६७ ॥ साधारण गृहस्थ के यहाँ महापुरुष किस प्रकार जन्म ग्रहण करते हैं इसका उपक्रम करते हुए आचार्य प्रवर कहते हैं । माता-पिता दोनों शुद्धवंश के हों, उनमें परस्पर प्रेम हो, मन में प्रसन्नता हो, गोधूलि आदि निषिद्ध समय न हो, लक्ष्मी और सरस्वती के सूक्तों से अभिमन्त्रित सात्त्विक अन्न का भोजन किया गया हो—इतने कारणों से घर में पुरुषोत्तम अवतार ग्रहण करते हैं ।
: ह्यन्ति ॥ ७३ ॥ (Wait, there is a handwritten number or mark next to it: looks like a checkmark or stroke, ignore or transcribe? Just transcribe printed text).
Hindi 73, line 1: आप्त और विद्यावृद्ध पुरुषों द्वारा विनीत बनाये गये तथा सुखपूर्वक
Hindi 73, line 2: पालित पोषित राजकुमार अपने पिता माता से द्रोह नहीं करते ।
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`राजरक्षासमुद्देशः १२७`
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१२८ नीतिवाक्यामृतम् राजपुत्र का कर्तव्य— मातापितरौ राजपुत्राणां परमं दैवतम् ॥ ७४ ॥ राजकुमारों के लिये माता और पिता उत्कृष्ट देवता हैं । यत्प्रसादादात्मलाभो राज्यलाभश्च ॥ ७५ ॥ जिनकी कृपा से उनको अपना शरीर मिलता है और राज्य प्राप्ति होती है । मातापित्रोर्मनसाप्यपमानेष्वभिमुखा अपि श्रियो विमुखा- भवन्ति ॥ ७६ ॥ माता और पिता का मन से भी अपमान करने पर आती, हुई भी लक्ष्मी विमुख हो जाती है । किन्तेन राज्येन यत्र दुरपवादोपहतं जन्म ॥ ७७ ॥ लोकनिन्दा से दूषित राज्य से क्या लाभ ? क्वचिदपि कर्मणि पितुराज्ञां नो लङ्घयेत् ॥ ७८ ॥ किसी भी कार्य में पिता की आज्ञा का उल्लङ्घन न करे । किन्नु खलु रामः क्रमेण विक्रमेण वा हीनो यः पितुराज्ञया वनम् आविवेश ॥ ७९ ॥ क्या रामचन्द्र पौरुष और पराक्रम से शून्य थे जो पिता की आज्ञा से वन को चले गये ? यः खलु पुत्रो मनीषितपरम्परया लभ्यते स कथमपकर्त्तव्यः ॥ ८० ॥ जो पुत्र देवताओं से प्रार्थना आदि करके प्राप्त किया गया है उसका अप- कार कैसे किया जा सकता है । पिता पुत्र प्राप्ति के लिये देवी देवताओं का पूजन करता है, व्रत आदि करता है ऐसे पुत्र पर उसका हार्दिक स्नेह रहता है वह कदापि पुत्र के अपकार की बात नहीं सोच सकता अतः पुत्र को अपने मन में कभी ऐसा विचार भी न लाना चाहिए कि पिताजी हमारा अपकार चाहते हैं । कर्त्तव्यमेवाशुभं कर्म यदि हन्यमानस्य विपद्-विधानम् आत्मनो न भवेत् ॥ ८१ ॥ किसी का वध आदि अशुभ कर्म भी राजा राज्य की कल्याण-दृष्टि से कर सकता है यदि बाद में वही आपत्ति अपने ऊपर भी न आने की संभा- वना हो । ते खलु राजपुत्राः सुखिनो येषां पितरि राज्यभारः ॥ ८२ ॥ वे राजपुत्र सुखी हैं जिनके पिता के ऊपर राज्य भार है । राज्य का भार कोई सुखकर कार्य नहीं हैं अनेक चिन्ताओं से मनुष्य घिरा रहता है अतः पिता राज्य संभालें और पुत्र आनन्द करे यह अच्छा हैं ।
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri राजरक्षासमुद्देशः १०६ अलं तया श्रिया या किमपि सुखं जनयन्ती व्यासङ्गपरम्पराभिः शतशो दुःखमनुभावयति ॥ ८३ ॥ उस राज्यलक्ष्मी से क्या लाभ जो थोड़ा सुख देकर सैकड़ों चिन्ताओं से ग्रस्तकर दुःख भोग कराती है । निष्फलो ह्यारम्भः कस्य नामोदर्केण सुखावहः ॥ ८४ ॥ बिना प्रयोजन किसी कार्य का प्रारम्भ करने से किसी को भी परिणाम में सुख नहीं मिलता । परक्षेत्रं स्वयं कृषतः कर्षापयतो वा फलं पुनस्तस्यैव यस्य तत् क्षेत्रम् ॥ ८५ ॥ पराया खेत स्वयं जोतने अथवा दूसरे से जुतवाने पर भी फल का भागी तो वही होगा जिसका वह खेत होगा । राज्य के क्रमानुसार अधिकारी-- सुत-सोदर-सपत्न-पितृव्य-कुल्य-दौहित्र-आगन्तुकेषु पूर्वपूर्वाभावे भवत्युत्तरस्य राज्यपदावाप्तिः ॥ ८६ ॥ पुत्र, सहोदर भ्राता, सौतेला सम्बन्धी, चाचा, अपने कुल का कोई व्यक्ति, नाती (लड़की का लड़का) और इधर-उधर से आकर रह गया व्यक्ति इन सब में क्रमशः पूर्व-पूर्व का अभाव होने पर उत्तर के व्यक्ति को राज्यपद प्राप्त होता है । जो कोई दुष्कर्म कर चुका हो कर रहा हो अथवा करनेवाला हो तो उसमें निम्न चिह्न पाये जाते हैं । शुष्कश्याममुखता, वाक्स्तम्भः, स्वेदो, विजृम्भणम्, अतिमात्रं वेपथुः, प्रस्खलनम्, आस्यप्रेक्षणम्, आवेगः कर्मणि-भूमौ वाऽनव- स्थानमिति दुष्कृतं कृतवतः, कुर्वतः करिष्यतो वा लिङ्गानि ॥ ८७ ॥ मुंह का सूखना और विवर्ण हो जाना, अर्थात् म्लान होकर रङ्ग उतर जाना, वाणी का अवरुद्ध हो जाना, पसीना छूटना, जमुहाई आना, शरीर में बहुत ज्यादा कंपकंपी पैदा हो जाना, लड़खड़ाना, एकटक होकर मुंह देखते रह जाना, काम में घबड़ाहट और शीघ्रता करना, पृथ्वी पर बैठ न सकना अर्थात् स्थिर न होकर टहलते रहना । [ इति राजरक्षासमुद्देशः ] ६ नी० Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
३. समुद्देश २१-३२: षाड्गुण्य, संधि, विग्रह, यान, आसन, युद्ध-कौशल एवं नीतिवाक्यामृतम् उपसंहार
१३० नीतिवाक्यामृतम् २५. दिवसानुष्ठानसमुद्देश इस समुद्देश में आचार्यप्रवर ने मानव जीवन को सुखमय बनाने वाली सुन्दर दिनचर्या का विस्तृत वर्णन किया है अतः यह समुद्देश अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है— ब्राह्मे मुहूर्त्त उत्थायेतिकर्त्तव्यतायां समाधिमुपेयात् ॥ १ ॥ प्रातः काल ब्राह्म मुहूर्त्त में उठकर एकाग्रचित्त से अपने कर्त्तव्य कर्म का चिन्तन करे । सुखनिद्राप्रसन्ने मनसि प्रतिफलन्ति यथार्थग्राहिका बुद्धयः ॥ २ ॥ उस समय सुख-पूर्वक निद्रा से प्रसन्न चित्त में सद्विचार प्रतिबिम्बित होते हैं । उदयास्तमनशायिषु धर्मकालातिक्रमः ॥ ३ ॥ सूर्योदय ओर सूर्यास्त के समय सोने वालों का धार्मिक कृत्यों का समय निकल जाता है । आत्मवक्त्रमाज्ये दर्पणे वा निरीक्षेत ॥ ४ ॥ प्रातः काल उठकर अपना मुख घृत अथवा दर्पण में देखे । न प्रातर्वर्षवरं विकलाङ्गं वा पश्येत् ॥ ५ ॥ प्रातः काल नपुंसक और अङ्गहीनों का दर्शन न करे । सन्ध्यास्वधौतमुखपादं ज्येष्ठा देवता नानुगृह्णाति ॥ ६ ॥ सूर्योदय और सूर्यास्त की सन्धि वेला में जिसका मुख और पैर प्रक्षालित नहीं होता उस पर महान् देवता अनुग्रह नहीं करते । नित्यम् अदन्तधावनस्य नास्ति मुखशुद्धिः ॥ ७ ॥ नित्य दन्त धावन न करने वाले का मुख अशुद्ध रहता है अर्थात् स्वच्छ न होने के कारण उससे दुर्गन्ध आता है । न कार्यव्यासङ्गेन शारीरं कर्मोपहन्यात् ॥ ८ ॥ कार्यों में आसक्त होकर शारीरिक कर्मों का परित्याग न करे । न खलु युगैरपि तरङ्गविगमात् सागरे स्नानम् ॥ ६ ॥ समुद्र की तरङ्गें युग-युग से भी शान्त हो गई हों तब भी उसमें स्नान नहीं करना चाहिए । वेग-व्यायाम-स्वाप-स्नान - भोजन - स्वच्छन्दवृत्ति कालान्न्योपरु- न्ध्यात् ॥ १० ॥ मल-मूत्र आदि के परित्याग का वेग, व्यायाम, शयन, स्नान, भोजन ओर स्वच्छन्द रूप से घूमने आदि के नियत समय का अतिक्रमण न करे ।
दिवसानुष्ठानसमुद्देशः १३१ शुक्र·मल·मूत्र·मरुद्वेगसंरोधोऽश्मरीभगन्दरगुल्मार्शसां हेतुः ॥११॥ शुक्र, मल, मूत्र और अपानवायु के वेग को रोकने से पथरी, भगन्दर, गुल्म और बवासीर रोग होते है । गन्धलेपावसानं शौचम् आचरेत् ॥ १२ ॥ शरीर या उसके अङ्ग में लगा हुआ किसी वस्तु का गन्ध और लेप जब तक छूट न जाय तब तक शुद्धि अर्थात् पानी से धोने आदि की क्रिया करनी चाहिए । बहिरागतो नानाचम्य गृहं प्रविशेत् ॥ १३ ॥ बाहर से घूम-घामकर आने पर बिना कुल्ला किये घर में न प्रविष्ट हो । गोसर्गे व्यायामो रसायनमन्यत्र क्षीणाजीर्णवृद्धवातकिरूक्षभोजिभ्यः ॥१४॥ जिनका शरीर रोगादि के कारण क्षीण न हुआ हो, जिनको अजीर्ण का रोग न हो, जो वृद्ध न हों, जिनको गठिया आदि वायु का रोग न हो और जिनको रूखा-सूखा भोजन नहीं किन्तु स्निग्ध और पौष्टिक भोजन मिलता हो उन लोगों के द्वारा प्रातःकाल जब कि गायें जंगल में चरने के लिए खोली जाती हैं अर्थात् गोधूलि में व्यायाम करना रसायन सेवन के समान महान् गुणकारी होता है । शरीरायासजननी क्रिया व्यायामः ॥ १५ ॥ जिससे शरीर को परिश्रम हो उस क्रिया का नाम व्यायाम है । शस्त्रवाहनाभ्यासेन व्यायामं सफलयेत् ॥ १६ ॥ गदा, लाठी तलवार आदि चलाकर तथा घोड़े आदि की सवारी का अभ्यास कर व्यायाम को सफल बनावे । अर्थात् व्यायाम दण्ड-बैठक आदि के साथ इनको भी करता रहे । आदेहस्वेदं व्यायामकालमुशन्त्याचार्याः ॥ १७ ॥ आचार्यों ने व्यायाम करने की अवधि पसीना निकलने लगने तक कही है । बलातिक्रमेण व्यायामः कां नाम नापदं जनयति ॥ १८ ॥ शक्ति से अधिक व्यायाम करने से कौन सी ऐसी आपत्ति है जो नहीं उत्पन्न होती अर्थात् शक्ति से अधिक व्यायाम अनेक व्याधियों का घर होता है । अव्यायामशीलेषु कुतोऽग्निदीपनमुत्साहो देहदाढ्यंञ्च ॥ १६ ॥ जिसका व्यायाम करने का स्वभाव नहीं है उसकी जठराग्नि किस प्रकार दीप्त रह सकती है और उत्साह तथा देह की पुष्टता भी उसे कैसे प्राप्त हो सकती है ?