नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजरक्षासमुद्देशः १२१ यथाकामं कामिनीनां संग्रहः परमनर्थषानकल्याणावहः प्रक्रमोऽदौ- वारिके द्वारि को नाम न प्रविशति ॥ २६ ॥ राजा अपने सौख्य के अनुसार कामिनियों (वेश्याओं) को रख सकता है। किन्तु यह काम अनर्थकारी और अमङ्गलकारक है। वेश्या किसी दूसरे से सम्पर्क न रखे अथवा उसके यहां कोई दूसरा न आवे यह कैसे हो सकता है ? जिस द्वार पर उसका रक्षक कोई द्वारपाल नहीं होता वहां कौन नहीं प्रविष्ट होता ? राजा के योग्य वेश्या— मात्राभिजनविशुद्धाः, राज्ञः उदवसत्युपस्थायिन्यः स्त्रियः संभो- क्तव्याः ॥ ३० ॥ जिनकी माता के विषय में ज्ञात हो सके और जो राजद्वार पर नृत्य आदि के निमित्त आती रहती हों ऐसी ही वेश्याएं राजा के भोग योग्य हैं। दर्दुरस्य सर्पगृहप्रवेश इव स्त्रीगृहप्रवेशो राज्ञः ॥ ३१ ॥ राजा का (परकीया अथवा वेश्या) स्त्रीगृह में प्रवेश वैसा ही निरापद नहीं है जैसा कि मेढक का सर्प के गृह में प्रवेश। न हि स्त्रीगृहादायातं किञ्चित् स्वयमनुभवनीयम् ॥ ३२ ॥ स्त्री के गृह से आया हुआ कोई भी भोज्य आदि राजा को स्वयम् नहीं खाना चाहिए। अर्थात् उसका दूसरों से परीक्षण करा करके ही कि उसमें विष आदि तो नहीं मिला है राजा को उसका उपयोग करना चाहिए। नापि स्वयमनुभवनीयेषु स्त्रियो नियोक्तव्याः ॥ ३३ ॥ स्वयम् अनुभवनीय वस्तुओं अर्थात् भोजन आदि के विषयों में स्त्रियों को नहीं नियुक्त करना चाहिए। स्त्रियों के निन्दनीय कृत्य और तत्सम्बन्धी आख्यान— संवननं स्वातन्त्र्यं चाभिलषन्त्यः स्त्रियः किं नाम न कुर्वन्ति ॥३४॥ वशीकरण, मारण मोहन आदि और स्वतन्त्रता की अभिलाषा करती हुई स्त्रियां क्या नहीं कर डालतीं ? अर्थात् निन्दनीय से भी निन्दनीय कुकृत्य करने में उनको सङ्कोच नहीं होता। श्रूयते हि किल आत्मनः स्वच्छन्दवृत्तिमिच्छन्ती विषविदूषित- गण्डूषेण मणिकुण्डला महादेवी यवनेषु निजतनूजराज्यार्थं जघान राजा- नमङ्गम् ॥ ३५ ॥