नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ नीतिवाक्यामृतम् आख्यानों से अवगत होता है कि अपनी स्वच्छन्दता के लिये महादेवी मणिकुण्डला ने अपने पुत्र को राज्य पर अभिषिक्त करने की अभिलाषा से यवनदेश में अङ्गराज का वध कर दिया था। विषालक्तकदिग्धैनाधरेण वसन्तमतिः शूरसेनेषु सुरतविलासं, विषो- पलिप्तेन मणिना वृकोदरी दशार्णेषु मदनार्णवं, निशितनेमिना मुकुरेण मदिराक्षी मगधेषु मन्मथविनोदं, कबरीनिगूढेनासिपत्रेण चन्द्ररसा पाण्ड्येषु पुण्डरीकमिति ॥ ३६ ॥ जहरीले आलते से रंगे हुए अपने अधरोष्ठ के द्वारा वसन्तमति ने मथुरा में सुरतविलास नाम के राजा को, विदिशा (भेलसा) में वृकोदरी ने विष से रंगी हुई मणि के द्वारा मदनार्णव को, मगध में मदिराक्षी ने तीक्ष्ण धार वाले दर्पण से मन्मथ विनोद को और पाण्ड्य०देश में (तिनेवली, मद्रास) चन्द्ररसा ने केशपाश के भीतर छिपाई हुई तलवार अथवा छुरे से पुण्डरीक को मार डाला था। अमृतरसवाप्य इव क्रीडासुखोपकरणं स्त्रियः ॥ ३७ ॥ अमृत रस की बावली के समान स्त्रियां लक्ष्मी के विलास से सुलभ सुखों की साधन हैं। अतः— कस्तासां कार्याकार्यवलोकनेऽधिकारः ॥ ३८ ॥ वे क्या अच्छा काम करती हैं क्या बुरा काम करती हैं इसको देखने का क्या प्रयोजन है ? अर्थात् अमृत रस के समान आह्लादित करने वाली स्त्रियों के कर्तव्य-कर्तव्य का विवेचन व्यर्थ है। उनका सदुपयोग करना चाहिये। स्त्री की स्वतन्त्रता के क्षेत्र-- अपत्यपोषणे, गृहकर्मणि, शरीरसंस्कारे, शयनावसरे स्त्रीणां स्वातन्त्र्यं नान्यत्र ॥ ३६ ॥ सन्तान पालन, गृहस्थी के दैनिक कार्यकलाप, शारीरिक श्रृंगार और पति के साथ शयन इन चार कार्यों में स्त्रियों को स्वतन्त्रता देनी चाहिए अन्यत्र नहीं। स्त्री के अतिस्वातन्त्र्य से दुष्परिणाम-- अतिप्रसक्तेः स्त्रीषु स्वातन्त्र्यं करपत्रमिव पत्युर्नाविदार्य हृदयं विश्राम्यति ॥ ४० ॥ अत्यन्त आसक्त होकर स्त्रियों को पूर्ण स्वतन्त्रता देने का परिणाम यह होता है कि वे आरे के समान-पति के हृदय को विदीर्ण किये बिना विश्राम