भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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१२६ नीतिवाक्यामृतम् अन्यत्र प्राणबाधाबहुजनविरोधपातकेभ्यः ॥ ६२ ॥ स्वामी का आदेश बिना संशय करने को तत्पर अवश्य रहे किन्तु तीन बातों का विचार तो कर ही ले कि उससे, अपना प्राण तो संकट में नहीं पड़ रहा है, जनता का विरोध तो नहीं मिल रहा है तथा कोई पाप तो नहीं बन पड़ रहा है । बलवान् सजातियों के प्रति राजा का कर्तव्य— बलवत्-पक्षपरिग्रहेषु दायिष्वाप्तपुरुषपुरःसरो विश्वासो वशीकरणं गूढपुरुषनिक्षेपः प्रणिधिर्वा ॥ ६३ ॥ किसी कारण-वश बलवान् बन बैठे हुए दायादों को वश में करने के लिये उनके पास आप्त पुरुषों को भेजकर अपने में विश्वास उत्पन्न कराना चाहिए अथवा अपना गुप्तचर भेजकर उनका रहस्य अवगत करते रहना चाहिए कि वह राज्य विनाश का कोई षड्यन्त्र तो नहीं कर रहे हैं । दुर्बोधे सुते दायादे वा सम्यग् युक्तिभिर्दुर्भिनिवेशमुत्तार- येत् ॥ ६४ ॥ किसी दुराग्रहपूर्ण कार्य करने के लिये तुले हुए पुत्र और दायाद को युक्ति के साथ समझा-बुझा कर उसका दुराग्रह दूर करना चाहिए । उपकारी सज्जनों के प्रति सद्व्यवहार आवश्यक— साधूपूचर्यमाणेषु विकृतिभजनं स्वहस्तादंगाराकर्षणमिव ॥६५॥ उपकारक साधु-पुरुषों के प्रति दुर्व्यवहार करना अपने ही हाथों आग का अङ्गारा खींचने के समान है । सन्तति के शुभाशुभ का विचार — क्षेत्रबीजयोर्वैकृत्यमपत्यानि विकारयति ॥ ६६ ॥ जिस प्रकार क्षेत्र और बीज यदि बुरे हों तो खेती विनष्ट होती है उसी प्रकार क्षेत्र और बीज तुल्य माता-पिता में विकृति होने से सन्तान में भी विकृति होती है । कुलविशुद्धिरुभयतः प्रीतिर्मनःप्रसादोऽनुपहतकालसमयश्च श्रीसर- स्वत्यावाहनमन्त्रयुतपरमान्नोपयोगश्च पुरुषोत्तममवतारयन्ति ॥ ६७ ॥ साधारण गृहस्थ के यहाँ महापुरुष किस प्रकार जन्म ग्रहण करते हैं इसका उपक्रम करते हुए आचार्य प्रवर कहते हैं । माता-पिता दोनों शुद्धवंश के हों, उनमें परस्पर प्रेम हो, मन में प्रसन्नता हो, गोधूलि आदि निषिद्ध समय न हो, लक्ष्मी और सरस्वती के सूक्तों से अभिमन्त्रित सात्त्विक अन्न का भोजन किया गया हो—इतने कारणों से घर में पुरुषोत्तम अवतार ग्रहण करते हैं ।