नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
१२६ नीतिवाक्यामृतम् अन्यत्र प्राणबाधाबहुजनविरोधपातकेभ्यः ॥ ६२ ॥ स्वामी का आदेश बिना संशय करने को तत्पर अवश्य रहे किन्तु तीन बातों का विचार तो कर ही ले कि उससे, अपना प्राण तो संकट में नहीं पड़ रहा है, जनता का विरोध तो नहीं मिल रहा है तथा कोई पाप तो नहीं बन पड़ रहा है । बलवान् सजातियों के प्रति राजा का कर्तव्य— बलवत्-पक्षपरिग्रहेषु दायिष्वाप्तपुरुषपुरःसरो विश्वासो वशीकरणं गूढपुरुषनिक्षेपः प्रणिधिर्वा ॥ ६३ ॥ किसी कारण-वश बलवान् बन बैठे हुए दायादों को वश में करने के लिये उनके पास आप्त पुरुषों को भेजकर अपने में विश्वास उत्पन्न कराना चाहिए अथवा अपना गुप्तचर भेजकर उनका रहस्य अवगत करते रहना चाहिए कि वह राज्य विनाश का कोई षड्यन्त्र तो नहीं कर रहे हैं । दुर्बोधे सुते दायादे वा सम्यग् युक्तिभिर्दुर्भिनिवेशमुत्तार- येत् ॥ ६४ ॥ किसी दुराग्रहपूर्ण कार्य करने के लिये तुले हुए पुत्र और दायाद को युक्ति के साथ समझा-बुझा कर उसका दुराग्रह दूर करना चाहिए । उपकारी सज्जनों के प्रति सद्व्यवहार आवश्यक— साधूपूचर्यमाणेषु विकृतिभजनं स्वहस्तादंगाराकर्षणमिव ॥६५॥ उपकारक साधु-पुरुषों के प्रति दुर्व्यवहार करना अपने ही हाथों आग का अङ्गारा खींचने के समान है । सन्तति के शुभाशुभ का विचार — क्षेत्रबीजयोर्वैकृत्यमपत्यानि विकारयति ॥ ६६ ॥ जिस प्रकार क्षेत्र और बीज यदि बुरे हों तो खेती विनष्ट होती है उसी प्रकार क्षेत्र और बीज तुल्य माता-पिता में विकृति होने से सन्तान में भी विकृति होती है । कुलविशुद्धिरुभयतः प्रीतिर्मनःप्रसादोऽनुपहतकालसमयश्च श्रीसर- स्वत्यावाहनमन्त्रयुतपरमान्नोपयोगश्च पुरुषोत्तममवतारयन्ति ॥ ६७ ॥ साधारण गृहस्थ के यहाँ महापुरुष किस प्रकार जन्म ग्रहण करते हैं इसका उपक्रम करते हुए आचार्य प्रवर कहते हैं । माता-पिता दोनों शुद्धवंश के हों, उनमें परस्पर प्रेम हो, मन में प्रसन्नता हो, गोधूलि आदि निषिद्ध समय न हो, लक्ष्मी और सरस्वती के सूक्तों से अभिमन्त्रित सात्त्विक अन्न का भोजन किया गया हो—इतने कारणों से घर में पुरुषोत्तम अवतार ग्रहण करते हैं ।
: ह्यन्ति ॥ ७३ ॥ (Wait, there is a handwritten number or mark next to it: looks like a checkmark or stroke, ignore or transcribe? Just transcribe printed text).
Hindi 73, line 1: आप्त और विद्यावृद्ध पुरुषों द्वारा विनीत बनाये गये तथा सुखपूर्वक
Hindi 73, line 2: पालित पोषित राजकुमार अपने पिता माता से द्रोह नहीं करते ।
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`राजरक्षासमुद्देशः १२७`
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१२८ नीतिवाक्यामृतम् राजपुत्र का कर्तव्य— मातापितरौ राजपुत्राणां परमं दैवतम् ॥ ७४ ॥ राजकुमारों के लिये माता और पिता उत्कृष्ट देवता हैं । यत्प्रसादादात्मलाभो राज्यलाभश्च ॥ ७५ ॥ जिनकी कृपा से उनको अपना शरीर मिलता है और राज्य प्राप्ति होती है । मातापित्रोर्मनसाप्यपमानेष्वभिमुखा अपि श्रियो विमुखा- भवन्ति ॥ ७६ ॥ माता और पिता का मन से भी अपमान करने पर आती, हुई भी लक्ष्मी विमुख हो जाती है । किन्तेन राज्येन यत्र दुरपवादोपहतं जन्म ॥ ७७ ॥ लोकनिन्दा से दूषित राज्य से क्या लाभ ? क्वचिदपि कर्मणि पितुराज्ञां नो लङ्घयेत् ॥ ७८ ॥ किसी भी कार्य में पिता की आज्ञा का उल्लङ्घन न करे । किन्नु खलु रामः क्रमेण विक्रमेण वा हीनो यः पितुराज्ञया वनम् आविवेश ॥ ७९ ॥ क्या रामचन्द्र पौरुष और पराक्रम से शून्य थे जो पिता की आज्ञा से वन को चले गये ? यः खलु पुत्रो मनीषितपरम्परया लभ्यते स कथमपकर्त्तव्यः ॥ ८० ॥ जो पुत्र देवताओं से प्रार्थना आदि करके प्राप्त किया गया है उसका अप- कार कैसे किया जा सकता है । पिता पुत्र प्राप्ति के लिये देवी देवताओं का पूजन करता है, व्रत आदि करता है ऐसे पुत्र पर उसका हार्दिक स्नेह रहता है वह कदापि पुत्र के अपकार की बात नहीं सोच सकता अतः पुत्र को अपने मन में कभी ऐसा विचार भी न लाना चाहिए कि पिताजी हमारा अपकार चाहते हैं । कर्त्तव्यमेवाशुभं कर्म यदि हन्यमानस्य विपद्-विधानम् आत्मनो न भवेत् ॥ ८१ ॥ किसी का वध आदि अशुभ कर्म भी राजा राज्य की कल्याण-दृष्टि से कर सकता है यदि बाद में वही आपत्ति अपने ऊपर भी न आने की संभा- वना हो । ते खलु राजपुत्राः सुखिनो येषां पितरि राज्यभारः ॥ ८२ ॥ वे राजपुत्र सुखी हैं जिनके पिता के ऊपर राज्य भार है । राज्य का भार कोई सुखकर कार्य नहीं हैं अनेक चिन्ताओं से मनुष्य घिरा रहता है अतः पिता राज्य संभालें और पुत्र आनन्द करे यह अच्छा हैं ।
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri राजरक्षासमुद्देशः १०६ अलं तया श्रिया या किमपि सुखं जनयन्ती व्यासङ्गपरम्पराभिः शतशो दुःखमनुभावयति ॥ ८३ ॥ उस राज्यलक्ष्मी से क्या लाभ जो थोड़ा सुख देकर सैकड़ों चिन्ताओं से ग्रस्तकर दुःख भोग कराती है । निष्फलो ह्यारम्भः कस्य नामोदर्केण सुखावहः ॥ ८४ ॥ बिना प्रयोजन किसी कार्य का प्रारम्भ करने से किसी को भी परिणाम में सुख नहीं मिलता । परक्षेत्रं स्वयं कृषतः कर्षापयतो वा फलं पुनस्तस्यैव यस्य तत् क्षेत्रम् ॥ ८५ ॥ पराया खेत स्वयं जोतने अथवा दूसरे से जुतवाने पर भी फल का भागी तो वही होगा जिसका वह खेत होगा । राज्य के क्रमानुसार अधिकारी-- सुत-सोदर-सपत्न-पितृव्य-कुल्य-दौहित्र-आगन्तुकेषु पूर्वपूर्वाभावे भवत्युत्तरस्य राज्यपदावाप्तिः ॥ ८६ ॥ पुत्र, सहोदर भ्राता, सौतेला सम्बन्धी, चाचा, अपने कुल का कोई व्यक्ति, नाती (लड़की का लड़का) और इधर-उधर से आकर रह गया व्यक्ति इन सब में क्रमशः पूर्व-पूर्व का अभाव होने पर उत्तर के व्यक्ति को राज्यपद प्राप्त होता है । जो कोई दुष्कर्म कर चुका हो कर रहा हो अथवा करनेवाला हो तो उसमें निम्न चिह्न पाये जाते हैं । शुष्कश्याममुखता, वाक्स्तम्भः, स्वेदो, विजृम्भणम्, अतिमात्रं वेपथुः, प्रस्खलनम्, आस्यप्रेक्षणम्, आवेगः कर्मणि-भूमौ वाऽनव- स्थानमिति दुष्कृतं कृतवतः, कुर्वतः करिष्यतो वा लिङ्गानि ॥ ८७ ॥ मुंह का सूखना और विवर्ण हो जाना, अर्थात् म्लान होकर रङ्ग उतर जाना, वाणी का अवरुद्ध हो जाना, पसीना छूटना, जमुहाई आना, शरीर में बहुत ज्यादा कंपकंपी पैदा हो जाना, लड़खड़ाना, एकटक होकर मुंह देखते रह जाना, काम में घबड़ाहट और शीघ्रता करना, पृथ्वी पर बैठ न सकना अर्थात् स्थिर न होकर टहलते रहना । [ इति राजरक्षासमुद्देशः ] ६ नी० Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
३. समुद्देश २१-३२: षाड्गुण्य, संधि, विग्रह, यान, आसन, युद्ध-कौशल एवं नीतिवाक्यामृतम् उपसंहार
१३० नीतिवाक्यामृतम् २५. दिवसानुष्ठानसमुद्देश इस समुद्देश में आचार्यप्रवर ने मानव जीवन को सुखमय बनाने वाली सुन्दर दिनचर्या का विस्तृत वर्णन किया है अतः यह समुद्देश अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है— ब्राह्मे मुहूर्त्त उत्थायेतिकर्त्तव्यतायां समाधिमुपेयात् ॥ १ ॥ प्रातः काल ब्राह्म मुहूर्त्त में उठकर एकाग्रचित्त से अपने कर्त्तव्य कर्म का चिन्तन करे । सुखनिद्राप्रसन्ने मनसि प्रतिफलन्ति यथार्थग्राहिका बुद्धयः ॥ २ ॥ उस समय सुख-पूर्वक निद्रा से प्रसन्न चित्त में सद्विचार प्रतिबिम्बित होते हैं । उदयास्तमनशायिषु धर्मकालातिक्रमः ॥ ३ ॥ सूर्योदय ओर सूर्यास्त के समय सोने वालों का धार्मिक कृत्यों का समय निकल जाता है । आत्मवक्त्रमाज्ये दर्पणे वा निरीक्षेत ॥ ४ ॥ प्रातः काल उठकर अपना मुख घृत अथवा दर्पण में देखे । न प्रातर्वर्षवरं विकलाङ्गं वा पश्येत् ॥ ५ ॥ प्रातः काल नपुंसक और अङ्गहीनों का दर्शन न करे । सन्ध्यास्वधौतमुखपादं ज्येष्ठा देवता नानुगृह्णाति ॥ ६ ॥ सूर्योदय और सूर्यास्त की सन्धि वेला में जिसका मुख और पैर प्रक्षालित नहीं होता उस पर महान् देवता अनुग्रह नहीं करते । नित्यम् अदन्तधावनस्य नास्ति मुखशुद्धिः ॥ ७ ॥ नित्य दन्त धावन न करने वाले का मुख अशुद्ध रहता है अर्थात् स्वच्छ न होने के कारण उससे दुर्गन्ध आता है । न कार्यव्यासङ्गेन शारीरं कर्मोपहन्यात् ॥ ८ ॥ कार्यों में आसक्त होकर शारीरिक कर्मों का परित्याग न करे । न खलु युगैरपि तरङ्गविगमात् सागरे स्नानम् ॥ ६ ॥ समुद्र की तरङ्गें युग-युग से भी शान्त हो गई हों तब भी उसमें स्नान नहीं करना चाहिए । वेग-व्यायाम-स्वाप-स्नान - भोजन - स्वच्छन्दवृत्ति कालान्न्योपरु- न्ध्यात् ॥ १० ॥ मल-मूत्र आदि के परित्याग का वेग, व्यायाम, शयन, स्नान, भोजन ओर स्वच्छन्द रूप से घूमने आदि के नियत समय का अतिक्रमण न करे ।
दिवसानुष्ठानसमुद्देशः १३१ शुक्र·मल·मूत्र·मरुद्वेगसंरोधोऽश्मरीभगन्दरगुल्मार्शसां हेतुः ॥११॥ शुक्र, मल, मूत्र और अपानवायु के वेग को रोकने से पथरी, भगन्दर, गुल्म और बवासीर रोग होते है । गन्धलेपावसानं शौचम् आचरेत् ॥ १२ ॥ शरीर या उसके अङ्ग में लगा हुआ किसी वस्तु का गन्ध और लेप जब तक छूट न जाय तब तक शुद्धि अर्थात् पानी से धोने आदि की क्रिया करनी चाहिए । बहिरागतो नानाचम्य गृहं प्रविशेत् ॥ १३ ॥ बाहर से घूम-घामकर आने पर बिना कुल्ला किये घर में न प्रविष्ट हो । गोसर्गे व्यायामो रसायनमन्यत्र क्षीणाजीर्णवृद्धवातकिरूक्षभोजिभ्यः ॥१४॥ जिनका शरीर रोगादि के कारण क्षीण न हुआ हो, जिनको अजीर्ण का रोग न हो, जो वृद्ध न हों, जिनको गठिया आदि वायु का रोग न हो और जिनको रूखा-सूखा भोजन नहीं किन्तु स्निग्ध और पौष्टिक भोजन मिलता हो उन लोगों के द्वारा प्रातःकाल जब कि गायें जंगल में चरने के लिए खोली जाती हैं अर्थात् गोधूलि में व्यायाम करना रसायन सेवन के समान महान् गुणकारी होता है । शरीरायासजननी क्रिया व्यायामः ॥ १५ ॥ जिससे शरीर को परिश्रम हो उस क्रिया का नाम व्यायाम है । शस्त्रवाहनाभ्यासेन व्यायामं सफलयेत् ॥ १६ ॥ गदा, लाठी तलवार आदि चलाकर तथा घोड़े आदि की सवारी का अभ्यास कर व्यायाम को सफल बनावे । अर्थात् व्यायाम दण्ड-बैठक आदि के साथ इनको भी करता रहे । आदेहस्वेदं व्यायामकालमुशन्त्याचार्याः ॥ १७ ॥ आचार्यों ने व्यायाम करने की अवधि पसीना निकलने लगने तक कही है । बलातिक्रमेण व्यायामः कां नाम नापदं जनयति ॥ १८ ॥ शक्ति से अधिक व्यायाम करने से कौन सी ऐसी आपत्ति है जो नहीं उत्पन्न होती अर्थात् शक्ति से अधिक व्यायाम अनेक व्याधियों का घर होता है । अव्यायामशीलेषु कुतोऽग्निदीपनमुत्साहो देहदाढ्यंञ्च ॥ १६ ॥ जिसका व्यायाम करने का स्वभाव नहीं है उसकी जठराग्नि किस प्रकार दीप्त रह सकती है और उत्साह तथा देह की पुष्टता भी उसे कैसे प्राप्त हो सकती है ?
१३२ नीतिवाक्यामृतम् इन्द्रियात्ममनोमरुतां सूक्ष्मावस्था स्वापः ॥ २० ॥ इन्द्रियां, आत्मा, मन और प्राण-वायु का सूक्ष्म अवस्था को प्राप्त हो जाना अर्थात् मन्दशक्ति हो जाना शयन है । यथासात्म्यं स्वापाद् भुक्तान्नपाको भवति प्रसीदन्ति चेन्द्रियाणि ॥२१॥ प्रकृति के अनुकूल पूर्ण निद्रा होने से खाया हुआ अन्न पच जाता है और समस्त इन्द्रियां प्रसन्न हो जाती हैं । अघटितमपिहितं च भाजनं न साधयत्यन्नानि ॥ २२ ॥ टूटे और बिना ढके हुए पात्र में अन्न नहीं पकता । इसका आशय यह है कि शरीर यदि श्रम से चूर-चूर हो रहा हो और निद्रा से उसकी सुरक्षा न की जाय तो अन्न का परिपाक नहीं होगा । प्रथमं नित्यस्नानं, द्वितीयकमुत्सादनं, तृतीयकमायुष्यं चतुर्थकं प्रत्यायुष्यमित्यहीनं सेवेत ॥ २३ ॥ प्रथम नित्यस्नान, द्वितीय सुगन्धित तैल का अथवा उबटन का शरीर में मर्दन, तृतीय आयुर्वर्धक सात्विक और पौष्टिक पदार्थों का सेवन, चतुर्थ मल- मूत्रादि का समय से विसर्जन आदि में नागा न करे । धर्मार्थकामशुद्धिदुर्जनस्पर्शाः स्नानस्य कारणानि ॥ २४ ॥ धार्मिक कार्यों का अनुष्ठान, उत्साहपूर्वक अर्थोपार्जन, प्रसन्नतापूर्वक काम- चेष्टाओं में प्रवृत्ति, शरीरशुद्धि और दुर्जनों के स्पर्शमात्र से उत्पन्न दोषों को दूर करना इन कारणों से स्नान किया जाता है । श्रमस्वेदालस्यविगमः स्नानस्य फलम् ॥ २५ ॥ थकावट, पसीना और आलस्य का दूर हो जाना स्नान का फल है । जलचरस्येव तत्स्नानं यत्र न सन्ति देवगुरुधर्मोपासनानि ॥ २६ ॥ स्नान के अनन्तर यदि देवता, गुरु और स्वधर्म सम्बन्धी कोई उपासना न की जाय तो वह स्नान जल में रहनेवाले जीव मत्स्य मगर आदि के स्नान के समान व्यर्थ है । प्रादुर्भवत् क्षुत्पिपासोऽभ्यङ्गस्नानं कुर्यात् ॥ २७ ॥ जब भूख और प्यास प्रतीत हो तब मनुष्य को समस्त अङ्ग में तैल मर्दन करने के अनन्तर स्नान करना चाहिए। आचार्य प्रवर का आशय है कि जब भूख और प्यास मालूम पड़ने लगे तब स्नान का समय जानकर तैल मर्दन करने के अनन्तर स्नान करे । आतपसंतप्तस्य जलावगाहो दृङ्मान्द्यं शिरोव्यथां च जनयति ॥२८॥
दिवसानुष्ठानसमुद्देशः १३३ सूर्य के आतप से संतप्त व्यक्ति यदि तुरन्त, बिना विश्राम किये ही स्नान करता है तो उसकी दृष्टि मन्द पड़ जाती है और शिर में पीड़ा होती है । बुभुक्षाकालो भोजनकालः ॥ २९ ॥ भोजन का उचित समय वही है जब कि मनुष्य को भूख लगे । अक्षुधितेनामृतमप्युपभुक्तञ्च भवति विषम् ॥ ३० ॥ बिना भूख के खाया गया अमृत भी विष हो जाता है । जठराग्निं वज्राग्निं कुर्वन्नाहारादौ वज्रकं वलयेत् ॥ ३१ ॥ जठराग्नि को कठोर से कठोर वस्तु को पचा डालनेवाली बनाने की दृष्टि से भोजन से पूर्व गदा मुद्गर आदि घुमावे । निरन्नस्य सर्वं द्रवद्रव्यम् अग्निं नाशयति ॥ ३२ ॥ भोजन के समय बिना अन्न के केवल घी, दूध अथवा चाय, शरबत मात्र पीने से जठराग्नि नष्ट हो जाती है । अतिश्रमपिपासोपशान्तौ पेयायाः परं कारणमस्ति ॥ ३३ ॥ अत्यन्त श्रम करने के अनन्तर बारम्बार लगने वाली प्यास की शान्ति के लिये मण्डपान ( चावल का माड़ पीना ) सर्वोत्तम है । घृताधारोत्तरं भुञ्जानोऽग्निं दृष्टिञ्च लभते ॥ ३४ ॥ घृत खाने के अनन्तर भोजन करने से मनुष्य की जठराग्नि दीप्त होती है और दृष्टि अर्थात् नेत्र की ज्योति बढ़ती है । सकृद् भूरिनीरोपयोगो वह्निम् अवसादयति ॥ ३५ ॥ एक वार ही बहुत जल पी लेने से जठराग्नि नष्ट हो जाती है । क्षुत्कालातिक्रमादन्नद्वेषो देहसादश्च भवति ॥ ३६ ॥ भूख लगने पर भोजन न करने से अन्न से अरुचि हो जाती है और देह में शिथिलता आती है । विध्मापिते वह्नौ किं नामेन्धनं कुर्यात् ॥ ३७ ॥ अग्नि बुझ कर जब राख हो जाय तब उसमें ईंधन क्या करेगा ? मनुष्य को जब खूब भूख लगी हो तब वह यदि भोजन नहीं करता तो उसकी जठ- राग्नि शान्त हो जाती है । अनन्तर भोजन करने से वह नहीं पचता । यो मितं भुङ्क्ते स बहु भुङ्क्ते ॥ ३८ ॥ जो थोड़ा खाता है वह बहुत खाता है । अर्थात् स्वल्प भोजन सदा सुख कर और दीर्घायु दाता होता है । अप्रमितम्, असुखं, विरुद्धम्, अपरीक्षितम्, असाधुपाकम्, अतीत- रसम्, अकालं चान्नं नानुभवेत् ॥ ३६ ॥ बिना मात्रा का, अहित कर, अपनी प्रकृति के प्रतिकूल, बिना परीक्षा
किया गया, ठीक से न पका हुआ, नीरस, और असमय का भोजन न करे । फल्गुभुजम्, अननुकूलम्, क्षुधितम्, अतिक्रूरं च न भुक्तिसमये सन्निधापयेत् ॥ ४० ॥ भोजन के समय तुच्छ पदार्थ खाने वाले कुत्ता, सूअर आदि अपने प्रतिकूल व्यक्ति अर्थात् शत्रु भाव रखने वाले मनुष्य, भूखे, और अत्यन्त क्रूर व्यक्ति को अपने पास न बैठावे । गृहीतग्रासेषु सहभोजिष्वात्मनः परिवेषयेत् ॥ ४१ ॥ साथ बैठ कर खाने वाले जब ग्रास उठा लें तब अपने लिये भोजन परसे । आचार्य प्रवर का आशय यह प्रतीत होता है कि जब कुछ लोगों को अपने यहां साथ में भोजन करने के लिये बुलावे तब शिष्टता की दृष्टि से यह उचित है कि अभ्यागत लोग जब खाना प्रारम्भ कर दें तब स्वयम् अपनी थाली मंगावे या भोजन करना प्रारम्भ करे । तथा भुञ्जीत यथा सायम् अन्येद्युश्च न विपद्यते वह्निः ॥ ४२ ॥ भोजन ऐसा करे जिससे सायंकाल अथवा दूसरे दिन पुनः भूख लगे । अर्थात् इतना अधिक भोजन न करे कि शाम को अथवा दूसरे दिन भूख ही न लगे । न भुक्तिपरिमाणे सिद्धान्तोऽस्ति ॥ ४३ ॥ भोजन की मात्रा के विषय में कोई सिद्धान्त नहीं हैं। अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति कितना भोजन करे इसका कोई सिद्धान्त नहीं है । वह्न्यभिलाषायत्तं हि भोजनम् ॥ ४४ ॥ भोजन अग्नि की अभिलाषा के अधीन है । अर्थात् जितनी भूख हो उतना भोजन करे । अतिमात्रभोजी देहमग्निश्च विधुरयति ॥ ४५ ॥ अधिक मात्रा में भोजन करनेवाला व्यक्ति अपनी देह और जठराग्नि का विनाश कर देता है । दीप्तो वह्निर्लघुभोजनाद् बलं क्षपयति ॥ ४६ ॥ प्रदीप्त अग्नि में थोड़ा भोजन करने से बल का ह्रास होता है । अर्थात् जिसकी खुराक बहुत हो उसे यदि कम भोजन मिलेगा तो उसका बल घट जायगा । अत्यशितुर्दुःखेनान्नपरिणामः ॥ ४७ ॥ बहुत खाने वाले का भोजन कठिनता से पचता है । भ्रमार्तस्य पानं भोजनं च ज्वराय छर्दये वा ॥ ४८ ॥
दिवसानुष्ठानसमुद्देशः १९५ अत्यन्त थका हुआ व्यक्ति यदि विश्राम किये बिना भोजन या जलपान करता है तो उससे उसे ज्वर या वमन होता है । न जिहत्सुर्न प्रस्रोतुमिच्छुर्नासमञ्जसमनाश्च नानपनीय पिपासोद्रेक- मश्नीयात् ॥ ४९ ॥ जब मल और मूत्र त्याग की इच्छा हो मन आकुल हो और अत्यधिक प्यास लगी हो तब मल-मूत्र त्याग किये बिना और मन को शान्त तथा प्यास को दूर किये बिना भोजन न करे । भुक्त्वा व्यायामव्यवायौ सद्यो विपत्तिकारणम् ॥ ५० ॥ भोजन के अनन्तर शीघ्र ही व्यायाम और मैथुन करने से तत्काल आपत्ति अर्थात् व्याधि उत्पन्न होती है । आजन्मसात्म्यं विषमपि पथ्यम् ॥ ५१ ॥ जन्मकाल से ही जो भोज्य अपनी प्रकृति के अनुकूल हो गया हो वह विष भी पथ्य होता है । असात्म्यमपि पथ्यं सेवेत न पुनः सात्म्यमप्यपथ्यम् ॥ ५२ ॥ प्रकृति के अनुकूल न भी हो किन्तु पथ्य हो तो उसका सेवन करना चाहिए, किन्तु प्रकृति के अनुकूल पड़ने पर भी अपथ्य पदार्थ का सेवन नहीं करना चाहिए । सर्वं बलवतः पथ्यमिति न कालकूट सेवेत ॥ ५३ ॥ बलशाली के लिये सब कुछ पथ्य ही है ऐसा समझकर कालकूट अर्थात् जहर न खावे । सुशिक्षितोऽपि विषतन्त्रज्ञो म्रियत एव कदाचिद् विषात् ॥ ५४ ॥ विषशास्त्र को जानने वाला सुशिक्षित भी व्यक्ति कभी विष से ही मर जाता है । संविभज्यातिथिष्वाश्रितेषु च स्वयमाहरेत् ॥ ५५ ॥ भोज्य पदार्थ को अतिथियों और आश्रितों को बांट कर तब स्वयं भोजन करे । देवान् गुरून् धर्मं चोपचरन्न व्याकुलमतिः स्यात् ॥ ५६ ॥ देवता गुरु और धर्म की सेवा के समय चित्त को अशान्त न रखे । व्याक्षेपभूमौमनोनिरोधो मन्दयति सर्वाण्यपीन्द्रियाणि ॥ ५७ ॥ चित्त में चञ्चलता उत्पन्न करने वाले स्थान पर बैठकर मन का निरोध करने से समस्त इन्द्रियाँ शिथिल हो जातीं हैं । स्वच्छन्दवृत्तिः पुरुषाणां परमं रसायनम् ॥ ५८ ॥ स्वच्छन्दता-पूर्वक जीवन निर्वाह करना मनुष्य के लिये उत्कृष्ट रसायन है ।
१३६ नीतिवाक्यामृतम् रसायनों का सेवन करने से मनुष्य का बुढ़ापा और रोग दूर होकर सुन्दर स्वास्थ्य बना रहता है इसी तरह स्वतन्त्र रहने पर भी मनुष्य स्वस्थ रहता है । यथाकामं समीहमानाः किल काननेषु करिणो न भवन्त्यास्पदं व्याधीनाम् ॥ ५९ ॥ जङ्गलों में स्वेच्छापूर्वक विहार करनेवाले हाथी रोगी नहीं होते । सततं सेव्यमाने द्वे एव वस्तुनी सुखाय, सरसः स्वैरालापस्ताम्बूल- भक्षणञ्च ॥ ६० ॥ निरन्तर सेवित दो ही वस्तुएं सुखोत्पादक होती हैं स्वच्छन्दभाव से सरस संलाप और ताम्बूल का भक्षण । चिरायोर्ध्वजानुर्जडयति रसवाहिनीः स्नसाः ॥ ६१ ॥ चिरकाल पर्यन्त घुटनों को उठाकर बैठने से रसवाहिनी नसें जकड़ जाती हैं । सततमुपविष्टो जठरमाध्मापयति, प्रतिपद्यते च तुन्दिलतां वाचि मनसि शरीरे च ॥ ६२ ॥ निरन्तर बैठे रहने से जठराग्नि मन्द हो जाती है और वाणी, मन तथा शरीर स्थूल हो जाते हैं । अतिमात्रं खेदः पुरुषमकालेऽपि जरया योजयति ॥ ६३ ॥ अत्यन्त शोक से बिना समय के ही पुरुष की वृद्धावस्था आ जाती है । नादेवं देहप्रासादं कुर्यात् ॥ ६४ ॥ मनुष्य अपने देहरूपी प्रासाद को देवता से शून्य न रक्खे । अर्थात् मन से ईश्वरभक्ति करे । देवगुरुधर्मरहिते पुंसि नास्ति प्रत्ययः ॥ ६५ ॥ जिस पुरुष में देवता की भक्ति, गुरु के प्रति श्रद्धा और धर्म के भाव नहीं वर्तमान हैं वह विश्वासयोग्य नहीं है । क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेषो देवः ॥ ६६ ॥ दुःख, कर्मभोग और ईर्ष्या द्वेष से शून्य पुरुष-विशेष देव हैं । तस्यैवैतानि खलु विशेषनामानि अर्हन्नजोऽनन्तः शम्भुर्बुद्धस्तमो- ऽन्तक इति ॥ ६७ ॥ देवसंज्ञक उसी पुरुष विशेष के अर्हन्, अज, अनन्त, शम्भु, बुद्ध और तमोऽन्तक ( अज्ञान रूप अन्धकार को दूर करने वाला ) यह सब नाम हैं । आत्मसुखानुरोधेन कार्याय नक्तमहश्च विभजेत् ॥ ६८ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
दिवसानुष्ठानसमुद्देशः १३७ मैं सुखपूर्वक कार्य कर सकूं इस दृष्टि से अपने विभिन्न कार्यों के निमित्त रात और दिन का निश्चित समय विभाग बना ले । कालानियमेन कार्यानुष्ठानं हि मरणसमम् ॥ ६६ ॥ समय का कोई नियम न रखकर कार्य करना मरण तुल्य होता है। आत्यन्तिके कार्ये नास्त्यवसरः ॥ ७० ॥ अत्यन्त कल्याणकारी अर्थात् धार्मिक कार्यों के लिये कोई नियत समय नहीं है । अवश्यं कर्त्तव्ये कालं न यापयेत् ॥ ७१ ॥ जो कार्य निश्चित रूप से करना ही हो उसमें समय का अतिक्रमण न होने दे । आत्मरक्षायां कदापि न प्रमाद्येत् ॥ ७२ ॥ आत्मरक्षा के कार्यों में कभी भी असावधानी न करे । सवत्सां धेनुं प्रदक्षिणीकृत्य धर्मोपासनं यायात् ॥ ७३ ॥ धर्मोपासना के निमित्त प्रस्थान करने से पूर्व बछड़े सहित गो की प्रद- क्षिणा कर ले । अनधिकृतोऽनभिमतश्च न राजसभां प्रविशेत् ॥ ७४ ॥ अनधिकृत रूप से तथा बिना आज्ञा प्राप्त किये हुए राजसभा में प्रवेश न करे । आराध्यमुत्थायाभिवादयेत् ॥ ७५ ॥ आराध्य पुरुष की वन्दना खड़ा होकर करे बैठे बैठे नहीं । देवगुरुधर्मकार्याणि स्वयं पश्येत् ॥ ७६ ॥ देवता, गुरु और धर्म-सम्बन्धी कार्यों को स्वयं देखे । कुहकाभिचारकर्मकारिभिः सह न संगच्छेत् ॥ ७७ ॥ छल-कपट और धोखा धड़ी का काम करने वालों एवम् मारण-मोहन आदि का कार्य करने वालों की संगति न करे । प्राण्युपघातेन कामक्रीडां न प्रवर्त्तयेत् ॥ ७८ ॥ प्राणियों की हिंसा करके काम क्रीड़ा में न प्रवृत्त हो । जनन्यादिपरस्त्रिया सह रहसि न तिष्ठेत् ॥ ७९ ॥ सम्बन्ध में माता भी लगने वाली पराई स्त्री के साथ एकान्त में न बैठे । नातिक्रुद्धोऽपि मान्यमतिक्रामेदवमन्येत वा ॥ ८० ॥ अत्यन्त क्रोध की दशा में भी पूज्य पुरुषों की आज्ञा का उल्लङ्घन और अपमान न करे ।
१३८ नीतिवाक्यामृतम् नाप्ताशोधितं परस्थानमुपेयात् ॥ ८१ ॥ अपने प्रामाणिक व्यक्तियों के द्वारा परीक्षण कराये बिना शत्रु के स्थान पर न जाय । नाप्तजनैरनारूढं वाहनमध्यासीत ॥ ८२ ॥ प्रामाणिक व्यक्ति जिन पर न बैठ चुके हों ऐसी सवारी पर भी न बैठे। न स्वैरपरीक्षितं तीर्थं सार्थं तपस्विनं वाभिगच्छेत् ॥ ८३ ॥ अपने आदमियों से परीक्षण कराये विना देवस्थान आदि तीर्थ अथवा यात्री-दल और तपस्वी के पास न जाय । न याष्टिकैरविविक्तं मार्गं भजेत् ॥ ८४ ॥ दण्डधारियों से अपरीक्षित मार्ग पर न जाय । न विषापहारौषधिमणीन् क्षणमप्युपासीत् ॥ ८५ ॥ विष दूर करनेवाली ओषधि और मणि का सेवन क्षणभर के लिये भी न करे । मन्त्रिभिषङ्नैमित्तिकरहितः कदाचिदपि न प्रतिष्ठेत् ॥ ८६ ॥ मन्त्री, ज्योतिषी और वैद्य के बिना कभी भी न रहे । वह्लावन्यचक्षुषि च भोग्यमुपभोग्यं च परीक्षेत ॥ ८७ ॥ अपने भोग और उपभोग की वस्तुओं का परीक्षण अग्नि के द्वारा अथवा अन्य व्यक्ति की दृष्टि से कराले । अमृते मरुति प्रविशति सर्वदा चेष्टेत ॥ ८८ ॥ अपने सब काम सदा 'अमृतसिद्धि' योग में करे । भक्ति-सुरत-समरार्थी दक्षिणे मरुति स्यात् ॥ ८६ ॥ भक्ति कार्य, कामभोग और संग्राम दक्षिण पवन के बहने पर अर्थात् वसन्तऋतु में करे । परमात्मना समीकुर्वन् न कस्यापि भवति द्वेष्यः ॥ ६० ॥ परमात्मा के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेनेवाले से कोई भी द्वेष नहीं करता । मनः-परिजन-शकुन-पवनानुलोम्यं भविष्यतः कार्यस्य सिद्धे- र्लिङ्गम् ॥ ६१ ॥ मन और नौकर-चाकरों का प्रसन्न होना, अच्छे शकुनों का होना तथा अनुकूल वायु का चलना भावी कार्यसिद्धि के लक्षण हैं । नैको नक्तं दिवं हिण्डेत ॥ ६२ ॥ रात-दिन अकेला ही न भ्रमण करे ।
दिवसानुष्ठानसमुद्देशः १३६ नियमितमनोवाक्कायः प्रतिष्ठेत ॥ ६३ ॥ मन, वाणी और शरीर के संयम के साथ प्रस्थान करे। अहनि सन्ध्यामुपासीतानक्षत्रदर्शनात् ॥ ६४ ॥ प्रतिदिन नक्षत्र-दर्शनपर्यन्त सन्ध्यावन्दन करे। चतुः पयोधिपयोधराम्, धर्मवत्सवतीम्, उत्साहबालधिम्, वर्णा- श्रमखुरां, कामार्थश्रवणां, नयप्रतापविषाणां, सत्यशौचचक्षुषं, न्यायमु- खीम्-इमां गां गोपयामि, अतस्तमहं मनसाऽपि न सहेयं योऽपराध्ये- त्तस्यै, इतीमं मन्त्रं समाधिस्थो जपेत् ॥ ६५ ॥ राजा को चाहिये कि वह एकाग्रचित्त होकर निम्नाङ्कित अर्थ के उपर्युक्त मन्त्र का जप करे । चतुर्दिक् के चार समुद्र जिसके चार थन हैं, धर्म जिसका बछड़ा है, उत्साह जिसकी पूंछ है, चार वर्ण और चार आश्रम जिसके खुर हैं, काम और अर्थ जिसके कान हैं, नीति और प्रताप जिसकी सींगें हैं, सत्य और शौच जिसकी आंखें हैं और न्याय जिसका मुख है— ऐसी इस गो रूप पृथ्वी की मैं रक्षा करता हूँ। अतः जो कोई इस पृथ्वी के प्रति कोई अपराध करेगा उसको मैं मनसे भी नहीं सहन करूँगा। कोकवद्दिवाकामो निशि स्निग्धं भुञ्जीत ॥ ६६ ॥ चकवा-चकवी के समान दिन में काम-भोग चाहनेवाला व्यक्ति रात्रि में स्निग्ध पदार्थों का भोजन करे । चकोरवन्नक्तं कामो दिवा च ॥ ६२ ॥ चकोर पक्षी के समान रात्रि में मैथुन-कर्म में प्रवृत्त होने का इच्छुक व्यक्ति दिन में स्निग्ध पदार्थों का भोजन करे । पारावतकामो वृष्यान्नयोगान् चरेत् ॥ ६८ ॥ कबूतर के समान अति कामी पुरुष वीर्यवर्धक व्यञ्जन (पूड़ी, हलवा, मालपूआ, खीर ) आदि का सेवन करे । वष्कयणीनां सुरभीणां पयः सिद्धं माषदलपरमान्नं परो योगः स्मर- संवर्द्धने ॥ ६६ ॥ ज्यादा दिनों की ब्याई हुई गायों के दूध में पकाई उड़द के दाल की खीर काम-शक्ति के संवर्द्धन के लिये सर्वोत्तम योग है । नावृषस्यन्तीं स्त्रीमभियायात् ॥ १०० ॥ कामेच्छा से हीन स्त्री के साथ संभोग न करे । उत्तरः प्रवर्षवान् प्रदेशः परमरहस्यमनुरागे प्रथमप्रकृतीनाम् ॥१०१॥ कामशास्त्र के अनुसार प्रथम प्रकृति अर्थात् वृष जाति के पुरुष और
१४० नीतिवाक्यामृतम् पद्मिनी जाति की स्त्री के लिये उत्तर दिशा का प्रचुर वर्षा वाला प्रदेश विशेष रूप से अनुराग क्रीड़ा में सहायक होता है । अर्थात् प्रथम प्रकृति के नवदम्पति को उत्तर दिशा वाले वर्षायुक्त प्रदेशों में काम-क्रीडा में विशेष आनन्द का अनुभव होता है । द्वितीयप्रकृतिः सशाद्वलमृदूपवनप्रदेशः ॥ १०२ ॥ इसी प्रकार द्वितीय प्रकृति अर्थात् शशजाति के पुरुष और शंखिनी जाति की स्त्री के लिये हरियाली से सुशोभित मनोरम उपवन, बाग, हराभरा जंगल आदि विशेष आनन्ददायक होता है । तृतीयप्रकृतिः सुरतोत्सवाय स्यात् ॥ १०३ ॥ इसी प्रकार तृतीय प्रकृति अर्थात् अश्व प्रकृति का पुरुष रतिकर्म में अत्यन्त आह्लादकर होता है । स्त्रीपुंसयोर्न सम-समायोगात् परं वशीकरणमस्ति ॥ १०४ ॥ परस्पर समान प्रकृति के संयोग से बढ़कर अन्य कोई उपाय स्त्री और पुरुष के वशीकरण के लिये नहीं है । प्रकृतिरूपदेशः [स्वाभाविकं च प्रयोगवैदग्ध्यमिति सम-समायोग- कारणानि ॥ १०५ ॥ समान प्रवृत्ति का होना, कामशास्त्र का समुचित शिक्षण और स्वाभाविक व्यवहार चातुर्य ये सब संयोग के हेतु हैं । क्षुत्तर्ष-पूरीषाभिष्यन्दार्त्तस्याभिगमो नापत्यमनवद्यं करोति ॥ १०६ ॥ भूख प्यास और मल-मूत्र के वेग से पीड़ित स्त्री पुरुषों के संयोग से उत्तम सन्तान नहीं होती । न सन्ध्यासु न दिवा नाप्सु न देवायतने मैथुनं कुर्वीत ॥ १०७ ॥ सन्ध्याकाल, दिन और जल तथा देवमन्दिर में मैथुन न करे । पर्वणि पर्वणि सन्धौ उपहते वाहि कुलस्त्रियं न गच्छेत् ॥ १०८ ॥ अमावास्या-पूर्णिमा आदि पर्व, प्रातः सायं की सन्धि वेला और ग्रहण वाले दिन में कुल-स्त्री अर्थात् अपनी विवाहिता स्त्री के साथ समागम न करे । न तद्गृहाभिगमने कामपि स्त्रियमधिशयीत ॥ १०६ ॥ किसी पराई स्त्री के घर जाकर उसके साथ शयन न करे । वंशवयोवृत्तविद्याविभवानुरूपो वेषः समाचारो वा न विड- म्बयति ॥ ११० ॥ वंश, अवस्था, सदाचार, विद्या और अपने ऐश्वर्य के अनुरूप वेष-भूषा रखने तथा व्यवहार करने से किसी को कोई विडम्बना निन्दा आदि नहीं होती ।
सदाचारसमुद्देशः १४१ अपरीक्षितमशोधितं च राजकुले न किञ्चित् प्रवेशयेन्निष्का- सयेद् वा ॥ १११ ॥ बिना परीक्षा और शोध के कोई भी वस्तु या व्यक्ति का राजकुल में प्रवेश और निष्कासन नहीं होने देना चाहिए । श्रूयते हि स्त्रीवेषधारी कुन्तलनरेन्द्रप्रयुक्तो गूढपुरुषः कर्णनिहितेना- सिपत्रेण पल्लवनरेन्द्रं हयपतिश्च मेष-विषाण-निहितेन विषेण कुशस्थले- श्वरं जघानेति ॥ ११२ ॥ सुनने में आता है कि कुन्तलनरेश के द्वारा प्रेषित स्त्रीवेषधारी किसी गुप्त पुरुष ने कान के साथ छिपाई हुई तलवार या छुरे से पल्लवदेश के राजा को मार डाला और हयपति ने भेड़े की सींग के भीतर छिपाये हुए विष के प्रयोग से कुशस्थलेश्वर ( द्वारकाधीश ) को मार डाला । सर्वत्राविश्वासे नास्ति काचित् क्रिया ॥ ११३ ॥ सर्वत्र अविश्वास ही रखने से कोई भी कार्य नहीं हो सकता । [ इति दिवसानुष्ठानसमुद्देशः ] २६. सदाचार समुद्देशः लोभप्रमादविश्वासैर्बृहस्पतिरपि पुरुषो वध्यते वञ्च्यते वा ॥ १ ॥ बृहस्पति के समान बुद्धिमान् पुरुष भी लोभ, असावधानी और विश्वास के कारण मारा जाता है अथवा वंचित होता है । बलवताऽधिष्ठितस्य गमनं तदनुप्रवेशो वा श्रेयान् अन्यथा नास्ति क्षेमोपायः ॥ २ ॥ अपने से बलशाली के द्वारा आक्रान्त होने पर देशत्याग कर अन्यत्र चले जाना अथवा उससे सन्धि कर लेना ही कल्याणकर है। इससे अतिरिक्त कोई दूसरा कल्याणकारी उपाय नहीं है । विदेशवासोपहतस्य पुरुषकारः को नाम ? येनाविज्ञातस्वरूपः पुमान् स तस्य महानपि लघुरेव ॥ ३ ॥ परदेशगमन रूप दुर्भाग्य से पीड़ित व्यक्ति का अपनी योग्यता और महत्ता आदि के परिचय का पुरुषार्थ व्यर्थ होता है क्योंकि जो जिसके स्वरूप अर्थात् योग्यता और विद्या आदि से परिचित नहीं है उस व्यक्ति की दृष्टि में महान् भी व्यक्ति क्षुद्र ही प्रतीत होता है । अलब्धप्रतिष्ठस्य निजान्वयेनाहङ्कारः कस्य न लाघवं करोति ॥ ४ ॥
१४२ नीतिवाक्यामृतम् जिसने स्वयम् उद्योग करके किसी प्रकार की प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त की वह यदि अपने उच्च वंश में जन्म लेने के अहंकार का प्रदर्शन करता है तो सबकी अप्रतिष्ठा का पात्र होता है। आर्तः सर्वोऽपि भवति धर्मबुद्धिः ॥ ५ ॥ दुखी होने पर सभी व्यक्ति धार्मिकविचार वाले बन जाते हैं। स नीरोगो यः स्वयं धर्माय समीहते ॥ ६ ॥ नीरोग वह व्यक्ति है जो बिना किसी कारण के ही धर्म-बुद्धि वाला हो। व्याधिग्रस्तस्य ऋते धैर्यान्न परमौषधमस्ति ॥ ७ ॥ व्याधि से पीड़ित व्यक्ति के लिये धैर्य के अतिरिक्त दूसरी कोई श्रेष्ठ औषध नहीं है। स महाभागो यस्य न दुरपवादोपहतं जन्म ॥ ८ ॥ भाग्यशाली वह है जिसका जीवन किसी अपयश से कलंकित न हो। पराधीनेष्वर्थेषु स्वोत्कर्षसंभावनं मन्दमतीनाम् ॥ ९ ॥ पराधीन वस्तुओं से अपने उत्कर्ष की आशा करना मूर्खता है। न भयेषु विषादः प्रतीकारः किन्तु धैर्यावलम्बनम् ॥ १० ॥ किसी प्रकार के सङ्कट से भय उत्पन्न होने पर दुखी होकर बैठना उस भय को दूर करने का उपाय नहीं है, किन्तु धैर्यधारण करना ही उसका श्रेष्ठ प्रतीकार है। स किं धन्वी तपस्वी वा यो रणे मरणे शरसन्धाने मनःसमाधाने च मुह्यति ॥ ११ ॥ वह कैसा धनुर्धारी अथवा तपस्वी है जो रण में, मरण में, बाण-चढ़ाने में और मन को समझाने में मोह में—अज्ञान में—पड़ जाता है ? कृते प्रतिकृतमकुर्वतो नैहिकफलमस्ति नामुत्रिकञ्च ॥ १२ ॥ उपकारी के प्रति प्रत्युपकार न करनेवाले को इस लोक और परलोक में भी कोई फल प्राप्त नहीं होता। शत्रुणाऽपि सूक्तमुक्तं न दूषयितव्यम् ॥ १३ ॥ शत्रु के द्वारा भी कही गई उत्तम उक्ति में दोष न लगाना चाहिए। कलहजननम् अप्रीत्युत्पादनं च दुर्जनानां धर्मो न सज्जनानाम् ॥१४॥ लड़ाई लगाना, वैर कराना दुर्जनों का कार्य है सज्जनों का नहीं। श्रीर्न तस्याभिमुखी यो लब्धार्थमात्रेण सन्तुष्टः ॥ १५ ॥ भाग्यवश जो मिल गया उसीसे सन्तुष्ट हो जानेवाले व्यक्ति के पास लक्ष्मी नहीं आती। तस्य कुतो वंशवृद्धियों न प्रशमयति वैरानुबन्धनम् ॥ १६ ॥
सदाचारसमुद्देशः १४३ जो परम्परा से प्राप्त बैरभाव को शान्त नहीं कर सकता उसके वंश का विस्तार कैसे हो सकता है ? अर्थात् किसी से पुराना बैर ठना रहने पर अवश्य ही कभी न कभी मारपीट में कुछ आदमी मरेंगे और इस प्रकार वंश की वृद्धि में बाधा होगी अतः वैर मिटा दे । भीतेष्वभयदानात् परं न दानमस्ति ॥ १७ ॥ डरे हुये को अभयदान देने से बढ़कर दूसरा कोई श्रेष्ठ दान नहीं है । स्वस्यासम्पत्तौ न चिन्ता किञ्चित् काङ्क्षितमर्थं ( प्रसूते ) दुग्धे किन्तूत्साहः ॥ १८ ॥ अपनी दरिद्रता के विषय में चिन्ता में पड़े रहने से कोई लाभ नहीं होता किन्तु उत्साह रखने से अच्छा फल मिलता है। अर्थात् उत्साहपूर्वक उद्योग करने से लक्ष्मी अवश्य प्राप्त होती हैं। स खलु स्वस्यैवापुण्योदयोऽपराधो वा (यः) सर्वेषु कल्पफलप्रदोऽपि स्वामी भवत्यात्मनि वन्ध्यः ॥ १६ ॥ यदि कोई स्वामी सर्वसाधारण के लिये कल्पवृक्ष के तुल्य फलदायक हो किन्तु मात्र अपने को उससे कोई फल न मिल सके तो उसे अपने ही पापों का उदय अथवा अपना ही कोई अपराध समझना चाहिए। स सदैव दुःखितो यो मूलधनमसंवर्धयन्ननुभवति ॥ २० ॥ वह व्यक्ति सदा ही दुखी बना रहता है जो मूल धन का उपयोग करता है। मूर्खदुर्जनचण्डालपतितैः सह संगतिं न कुर्यात् ॥ २१ ॥ मूर्ख, दुर्जन, चण्डाल और पतित पुरुषों की संगति न करे। किं तेन तुष्टेन यस्य हरिद्राराग इव चित्तानुरागः ॥ २२ ॥ जिसका प्रेम हलदी के रंग के समान धो देने से छूट जानेवाला हो अर्थात् थोड़े में ही बदल जानेवाला हो उस मनुष्य के सन्तुष्ट हो जाने से भी क्या लाभ होगा ? वह क्षणभर में फिर बदलकर अहित भी कर सकता है। स्वात्मानमविज्ञाय पराक्रमः कस्य न परिभवं करोति ॥ २३ ॥ अपनी शक्ति और सामर्थ्य का अनुमान किये बिना दूसरे पर आक्रमण करने से किसकी पराजय नहीं होगी ? नाक्रान्तिः पराभियोगस्योत्तरं किन्तु युक्तेरुपन्यासः ॥ २४ ॥ शत्रु के आक्रमण का वास्तविक उत्तर स्वयं भी आक्रमण कर देना नहीं होता, किन्तु युक्ति से कोई बात करना ही उसका वास्तविक उत्तर होता है। राज्ञोऽस्थाने कुपितस्य कुतः परिजनः ॥ २५ ॥
१४४ नीतिवाक्यामृतम् बिना बात की बात बिगड़ बैठने वाले राजा के पास सेवकों का अभाव रहता है। न मृतेषु रोदितव्यमश्रुपातसमा हि किल पतन्ति तेषां हृदयेष्व- ङ्गाराः ॥ २६ ॥ किसी व्यक्ति के मृत हो जाने पर रुदन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे उस मृत व्यक्ति को अश्रुपात के तुल्य अङ्गारपतन की हार्दिक पीड़ा होती है। अतीते च वस्तुनि शोकः श्रेयानेव यदास्ति तत्समागमः ॥ २७ ॥ नष्ट हुए पदार्थ के लिये शोक करना तभी कल्याणकारक समझा जायगा जब कि वह पुनः मिल जाय किन्तु ऐसा कभी होता नहीं। अतः मृत व्यक्ति अथवा नष्ट पदार्थ के लिये शोक करना सर्वथा व्यर्थ है। शोकमात्मनि चिरमनुवासयँस्त्रिवर्गमनुशोषयति ॥ २८ ॥ किसी वस्तु के लिये चिरकाल तक शोक करते रहने से धर्म, अर्थ और काम तीनों का नाश होता है। स किंपुरुषो योऽकिञ्चनः सन् करोति विषयाभिलाषम् ॥ २६ ॥ जो व्यक्ति दरिद्र होकर भी अगम्य विषयों की अभिलाषा करता है वह निन्दनीय है। अपूर्वेषु प्रियपूर्वं सम्भाषणं स्वर्गच्युतानां लिङ्गम् ॥ ३० ॥ जो व्यक्ति अपरिचितों से मिलकर मधुर भाषणपूर्वक बातचीत करे उसे समझना चाहिये कि वह किसी कारणवश स्वर्ग से भ्रष्ट होकर इस मृत्युलोक में आ गया है। न ते मृता येषामिहास्ति शाश्वती कीर्त्तिः ॥ ३१ ॥ जिसकी कीर्ति इस लोक में निरन्तर वर्त्तमान है वह मृत होकर भी जीवित है। स केवलं भूभाराय जातो येन न यशोभिर्धवलितानि भुवनानि ॥ ३२॥ जिसने अपनी कीर्त्ति-चन्द्रिका से भुवनों को उज्ज्वल नहीं किया उसका जन्म पृथ्वी के लिये व्यर्थ भार है। परोपकारो योगिनां महान् भवति श्रेयोबन्ध इति ॥ ३३ ॥ योगियों-महापुरुषों द्वारा किये गये जनकल्याण के कार्य लोगों के लिये महती कल्याण परम्परा है। का नाम शरणागतानां परीक्षा ॥ ३४ ॥ जो व्यक्ति अपनी शरण में आ जाय उसकी परीक्षा नहीं करनी चाहिए।
सदाचारसमुद्देशः १४५ अभिभवनमन्त्रेण परोपकारो महापातकिनां न महासत्त्वानाम् ॥३५॥ किसी अभिलाषा से परोपकार करना महापातकियों का कार्य है, महा- पुरुषों का नहीं। तस्य भूपतेः कुतोऽभ्युदयो जयो वा यस्य द्विषत्सभासु नास्ति गुण- ग्रहणप्रागल्भ्यम् ॥ ३६ ॥ शत्रुओं की भी सभा में जिस राजा की कीर्त्ति का गान नहीं किया जाता उसका जय और अभ्युदय कैसा ! अर्थात् राजा को इतना प्रभावशाली होना चाहिए कि शत्रु भी उसके गुणों और प्रभाव का लोहा मानें। तस्य गृहे कुटुम्बं धरणीयं यत्र न भवति परेषामाभिषम् ॥ ३७ ॥ आपत्ति के समय पलायन करते समय अपने कुटुम्ब को ऐसे व्यक्ति के यहां छोड़ जाना चाहिए जहाँ कुटुम्ब को दूसरे के द्वारा कोई हानि न हो। परस्त्रीद्रव्यरक्षणेन नात्मनः किमपि फलं विप्लवेन महाननर्थ- सम्बन्धः ॥ ३८ ॥ दूसरे की स्त्री और द्रव्य रखने से अपना कोई लाभ नहीं होता किन्तु यदि किसी प्रकार का उपद्रव हुआ तो उससे महान् अनर्थ होता है। आत्मानुरक्तं कथमपि न त्यजेत् यथास्ति तदन्ते तस्य सन्तोषः ॥ ३९ ॥ अपने यहां रहने में जिसे परम सन्तोष हो और जो अपने ऊपर अनुरागी हो ऐसे व्यक्ति का परित्याग कभी भी नहीं करना चाहिए। आत्मसंभावितः परेषां भृत्यानामसहमानश्च भृत्यो हि बहुपरिजन- मपि करोत्येकाकिनं स्वामिनम् ॥ ४० ॥ जो नौकरों की बढ़ती न देख सके और अपने को बहुत बड़ा माने ऐसे भृत्य के होने से राजा के बहुत से भी सेवक धीरे-धीरे करके चले जाते हैं और राजा अकेला रह जाता है। अतः राजा को चाहिए कि वह सेवकों में प्रमुख ऐसे व्यक्ति को बनावे जो अपने साथी सेवकों की तरक्की से प्रसन्न हो और स्वयं विनम्र स्वभाव का हो। अपराधानुरूपो दण्डः पुत्रेऽपि प्रणेतव्यः ॥ ४१ ॥ अपराध के अनुसार पुत्र को भी दण्ड देना चाहिए। देशानुरूपः करो ग्राह्यः ॥ ४२ ॥ देश की स्थिति के अनुसार ही कर ग्रहण करना चाहिए। प्रतिपाद्यानुरूपं वचनम् उदाहर्त्तव्यम् ॥ ४३ ॥ प्रतिपादन किये जाने वाले विषय के अनुकूल ही वाणी का प्रयोग करे। अर्थात् लोगों को जैसा विषय समझाना हो वैसी ही भाषा का व्यवहार करे। १० नी०