नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजरक्षासमुद्देशः १२५ प्रचुर धनधान्य से सन्तुष्टकर सुरक्षित होने पर भी वेश्या अपनी प्रकृति अर्थात् परपुरुष समागम की इच्छा नहीं छोड़ती । प्राणियों की प्रकृति की अपरिवर्त्तनीयता— या यस्य प्रकृतिः सा तस्य दैवेनापि नापनेतुं शक्यते ॥ ५३ ॥ जिसकी जो प्रकृति सहज-स्वभाव होता है उसे विधाता भी नहीं दूर कर सकता । सुभोजितोऽपि श्वा किमशुचीन्यस्थीनि परिहरति ॥ ५४ ॥ सुन्दर भोजन कराने पर भी क्या कुत्ता अपवित्र हड्डियों का खाना छोड़ देता है ? अर्थात् नहीं । न खलु कपिः शिक्षाशतेनापि चापलयं परिहरति ॥ ५५ ॥ बहुत सिखाने पर भी बन्दर अपनी चञ्चलता नहीं छोड़ता । इक्षुरसेनापि सिक्तो निम्बः कटुरेव ॥ ५६ ॥ ईख के रस से भी सींची गई नीम कड़वी ही रहती है । निकट सजातियों के सम्मान-असम्मान का विचार— सन्मानादवसादो कुल्यानामपरिग्रहहेतुः ॥ ५७ ॥ कुल्य अर्थात् स्वजातियों को अधिक सन्मान न देने से उनसे सम्बन्ध छूटता जाता है। अर्थात् उनका अधिक सन्मान और संग्रह नहीं करना चाहिए । तन्त्रकोशवर्द्धनी वृत्तिर्दायादान् विकारयति ॥ ५८ ॥ अपने दायादों अर्थात् कुटुम्बियों को उनका सैन्य और कोश बढ़ाने वाली जीविका प्रदान करने से उनके चित्त में विकार उत्पन्न होता है । अर्थात् अपना सैन्य बल और कोश बल बढ़ जाने पर अपना कुटुम्बी स्वयं राजा बन बैठने की घात सोचता है । भक्तिविश्रम्भादव्यभिचारिणं कुल्यं पुत्रं वा संवर्धयेत् ॥ ५९ ॥ किस प्रकार के कुटुम्बी अथवा पुत्र की शक्ति बढ़ानी चाहिए इस पर आचार्य प्रवर कहते हैं कि अपने प्रति जिसके दृढ़ अनुराग और भक्ति की पूर्ण प्रतीति निश्चित हो ऐसे दायाद अथवा पुत्र का विशेष सम्बर्द्धन करना चाहिए सबका नहीं । विनियुञ्जीत उचितेषु कर्मसु ॥ ६० ॥ पूर्वसूत्र में निर्दिष्ट दायाद को उसके अनुराग और भक्ति का परीक्षण करने के निमित्त उसे उचित कार्यों में नियुक्त करे । भर्तुरादेशं न विकल्पयेत् ॥ ६१ ॥ स्वामी के आदेश-पालन में किसी प्रकार का सोच-विचार न करे ।