नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबलसमुद्देशः १११ है इस प्रकार आठ अङ्गों से शत्रु पर प्रहार करने के कारण हाथी अष्टा- युध है। हस्ति प्रधानो विजयो राज्ञां यदेकोऽपिहस्ती सहस्रं योधयति न सीदति प्रहारसहस्रेणापि ॥ ३ ॥ राजाओं की विजय में हाथी प्रधान कारण होता है यतः अकेला भी हाथी हजार योद्धाओं से लड़ता है और हजार प्रहार होने पर भी पीड़ित नहीं होता । जातिः कुलं वनं प्रचारश्च न हस्तिनां प्रधानं किन्तु शरीरं बलं शौर्यं शिक्षा च तदुचिता च सामग्रीसम्पत्तिः ॥ ४ ॥ हाथी के बल के सम्बन्ध में जाति, वंश, वन और प्रचार यह चार विशे- षताएं होती हैं किन्तु इन सबमें प्रधानता न होकर उसके लिये शारीरिक बल शौर्य और शिक्षा तथा उसके योग्य सामग्री की प्राप्ति प्रधान है। हाथी यदि शरीर से पुष्ट न हुआ तो वह युद्ध में क्या करेगा ? यदि उसमें स्वाभाविक साहस और शौर्य न हुआ तो भी वह व्यर्थ है इसी प्रकार वनैला हाथी यदि रणभूमि के योग्य शिक्षित नहीं किया गया तो वह महावत या स्वामी को ही मार सकता है। शिक्षा के अनुरूप सामग्री भी न एकत्र की जा सकी तो भी हाथी की कला व्यर्थ होगी । हाथी की मन्द, मृग, संकीर्ण और भद्र यह चार जातियां हैं। ऐरावत, पुण्डरीक, वामन, कुमुद, अंजन, पुष्पदन्त और सार्वभौम ये आठ कुल हैं। यही ८ दिग्गजों के भेद के रूप में अमरकोश में परिगणित हैं। अशिक्षित हाथी का दोष— अशिक्षिता हस्तिनः केवलमर्थप्राणहराः ॥ ५ ॥ अशिक्षित हाथी केवल धन और प्राण हरण करने वाले होते हैं। हाथी के गुण— सुखेन यानमात्मरक्षा परपुरावमर्दनम्, अरिव्यूहविधातो जलेषु सेतुबन्धोवचनादन्यत्र सर्वविनोदहेतवश्चेति हस्तिगुणाः ॥ ६ ॥ सुखपूर्वक चलना, आत्मरक्षा, शत्रु के नगर को रौंद देना, शत्रु की व्यूह- रचना का विनाश कर देना, जल में पुल सा बांध देना, और कर्कश चिंघाड़ रूपी वचन के अतिरिक्त अनेक प्रकार से मनोविनोद करना ये हाथी के गुण हैं। अश्वसेना की उपयोगिता— अश्वबलं सैन्यस्य जङ्गमः प्रकारः ॥ ७ ॥ अश्वबल सेना का जङ्गम भेद है। सेना में घोड़ों की सेना का चलता-