भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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व्यवहारसमुद्देशः १४६ स किं बन्धुर्यो व्यसनेषु नोपतिष्ठते ॥ १० ॥ दुःख के अवसर पर काम न आने वाला क्या बन्धु है ? अर्थात् वह कुत्सित बन्धु है । तत्किं मित्रं यत्र नास्ति विश्वासः ॥ ११ ॥ जिस पर विश्वास न किया जा सके वह कुत्सित मित्र है । स किं गृहस्थो यस्य नास्ति सत्कलत्रसम्पत्तिः ॥ १२ ॥ जिसके पास सती भार्या रूप सम्पत्ति नहीं है वह गृहस्थ निन्दनीय है । तत्किं दानं यत्र नास्ति सत्कारः ॥ १३ ॥ विना सम्मान का दान निन्दनीय है । तत्किं भुक्तं यत्र नास्त्यतिथिसंविभागः ॥ १४ ॥ जिस भोजन में अतिथि का भाग न हो वह निन्दनीय भोजन है । तत्किं प्रेम यत्र कार्यवशात् प्रवृत्तिः ॥ १५ ॥ जहाँ प्रयोजन-वश प्रवृत्ति हो वह प्रेम निन्दनीय है । तत् किमाचरणं यत्र वाच्यता मायाव्यवहारो वा ॥ १६ ॥ वह आचार निन्दनीय है जिसमें अपयश और छल-कपट पूर्ण व्यव- हार हो । तत् किमपत्यं यत्र नाध्ययनं विनयो वा ॥ १७ ॥ वह कुत्सित पुत्र है जिसमें न अध्ययन हो न विनय हो । तत्किं ज्ञानं यत्र मदेनान्धता चित्तस्य ॥ १८ ॥ मदान्ध चित्त वाले का ज्ञान निन्दनीय है । तत्किं सौजन्यं यत्र परोक्षे पिशुनभावः ॥ १९ ॥ जहां पीठ पीछे निन्दा की जाती हो वह सज्जनता कैसी ? सा किं श्रीर्यया न सन्तोषः सत्पुरुषाणाम् ॥ २० ॥ उस लक्ष्मी से भी क्या जिससे सत्पुरुषों का सन्तोष न हो । तत्किं कृत्यं यत्रोक्तिरुपकृतस्य ॥ २१ ॥ किये हुए उपकार को जहां कह-कहकर प्रकट किया जाय वह उपकार प्रशंसनीय नहीं है । तयोः को नाम निर्वाहो यौ द्वावपि प्रभूतमानिनौ पण्डितौ लुब्धौ साहङ्कारौ ॥ २२ ॥ ऐसे उन दो आदमियों का परस्पर निर्वाह कैसे हो सकता है जो दोनों ही बड़े अभिमानी, पण्डित, लोभी और अहङ्कारी हों । स्ववान्त इव स्व-दत्ते नाभिलाषं कुर्यात् ॥ २३ ॥