नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ नीतिवाक्यामृतम् ग्रामे पुरे वा वृत्तो व्यवहारस्तस्य विवादे तथा राजानमुपेयात् ॥२२॥ ग्राम अथवा तहसील में झगड़ा निपट जाने पर भी यदि पुनः विवाद उपस्थित हो जाय तो ऐसे विवाद में राजा के पास आना चाहिए। राज्ञा दृष्टे व्यवहारे नास्त्यनुबन्धः ॥ २३ ॥ राजा के द्वारा अभियोग का निर्णय हो जाने पर अपील नहीं होती। अनुबन्ध का अर्थ दोष किया गया है जिसके अनुसार अर्थ होगा राजाके निर्णय में दोष नहीं होता। राजाज्ञां मर्यादाम् वाऽतिक्रामन् सद्यः फलेन दण्डेनोपहन्तव्यः ॥२४॥ राजा की आज्ञा अथवा न्याय की मर्यादा का उल्लङ्घन करने वालेको तात्कालिक दण्ड से दण्डित करना चाहिए। न हि दण्डादन्योऽस्ति विनयोपायोऽग्निसंयोग एव वक्रं काष्ठं सर- लयति ॥ २५ ॥ प्रजा को अनुशासन में लाने के लिये दण्ड के अतिरिक्त दूसरा उपाय नहीं है। टेढ़ा काष्ठ अग्नि के संयोग से ही सीधा होता है। ऋजुं सर्वेऽपि परिभवन्ति नहि तथा वक्रः संछिद्यते यथा सरलः ॥ २६ ॥ सीधे को सब दबा लेते हैं। वन में खड़ा टेढ़ा पेड़ वैसा नहीं काटा जाता जैसा कि सीधा। स्वोपालम्भपरिहारेण परमुपालभेत स्वामिनमुत्कर्षयन् गोष्ठीमव- तारयेत् ॥ २७ ॥ राजा की ओर से नियुक्त धर्माधिकारी सरकारी वकील को राजकीय पक्ष को प्रबल सिद्ध करते हुए राज्य के ऊपर लगाया गया आरोप दूर कर दूसरे को दोषी ठहराते हुए समझौता करा देना चाहिए। न हि भर्तुरभियोगात् परं सत्यमसत्यं वा वदन्तम् अवगृह्णीयात् ॥ २८ ॥ स्वामी का पक्षपात करके सत्य अथवा असत्य कहनेवाले के अनुसार किसी को दोषी नहीं सिद्ध करना चाहिए। अर्थात् राजनियुक्त पुरुष को विवाद में पक्षपात नहीं करना चाहिए। अर्थसम्बन्धः सहवासश्च नाकलहः संभवति ॥ २८ ॥ एक ही साथ रहकर पैसे का लेन देन बिना झगड़ा के नहीं चल सकता। अर्थात् ऐसी स्थिति में कलह, अवश्य होगा। अतः दो पृथक् व्यक्ति यदि एक साथ शान्ति से रहना चाहें तो आपस में पैसे का लेन-देन नहीं करना चाहिए।