नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविवादसमुद्देशः १५६ निधिराकस्मिको वाऽर्थलाभः प्राणैः सह सञ्चितमप्यर्थमपहार- यति ॥ २९ ॥ पूर्वजों से संचित अथवा प्राप्त निधि अथवा अकस्मात् मिला हुआ धन प्राणों के साथ सञ्चित अर्थ को भी नष्ट कर देता है। ब्राह्मणानां हिरण्ययज्ञोपवीतस्पर्शनं च शपथः ॥ ३० ॥ ब्राह्मण की शपथ सुवर्ण अथवा यज्ञोपवीत के स्पर्श से होती है। शस्त्ररत्नभूमिवाहनपल्याणानां तु क्षत्रियाणाम् ॥ ३१ ॥ शस्त्र, रत्न मोती, हीरा आदि, पृथ्वी, सवारी घोड़ा, हाथी आदि और सवारी की जीन का स्पर्श कराकर क्षत्रियों से शपथ कराई जाती है। श्रवणपोतस्पर्शनात् काकिणीहिरण्ययोर्वा वैश्यानाम् ॥ ३२ ॥ कान, छोटा बच्चा, तीस कौड़ियां अथवा सुवर्ण के स्पर्श से वैश्यों की शपथ होती है। शूद्राणां क्षीरबीजयोर्वल्मीकस्य वा ॥ ३३ ॥ शूद्रों की शपथ, क्रिया, दूध, अन्न और वांबी के स्पर्श से होती है। कारूणां यो येन कर्मणा जीवति तस्य तत्कर्मोपकरणानाम् ॥३४॥ जो जिस शिल्प से जीवन निर्वाह करता हो उसके साधनभूत औजारों को स्पर्श करके शिल्पी की शपथक्रिया होती है। व्रतिनामन्येषां चेष्टदेवतापादस्पर्शनात् प्रदक्षिणा, दिव्यकोशात्तन्दुल- तुलारोहणैर्विशुद्धिः ॥ ३५ ॥ व्रती, तपस्वी तथा अन्य पुरुषों की शपथक्रिया उनके इष्ट देवता के पाद- स्पर्श से, उनकी प्रदक्षिणा से, देव-निधि के स्पर्श से चावलों के स्पर्श से और तुला पर आरोहण-पैर रखने से होती है। व्याधानां तु धनुर्लङ्घनम् ॥ ३६ ॥ बहेलियों की शपथ धनुष के लांघने से होती है। अन्त्यवर्णावसायिनामार्द्रचर्मारोहणम् ॥ ३७ ॥ शूद्र, चाण्डाल आदि की शपथक्रिया गीले चमड़े पर पैर रखकर खड़े होने से होती है। वेश्या महिला, भृत्यो भण्डः, क्रीणिनियोगो, नियोगिमित्रं चत्वार्य- शाश्वतानि ॥ ३८ ॥ वेश्या का किसी की पत्नी बनना, धूर्त सेवक का होना, चुङ्गी, टैक्स आदि की आय और अधिकारी की मैत्री ये चार अस्थिर वस्तुएं हैं।