नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ नीतिवाक्यामृतम् नमोऽस्तु राज्यवृक्षाय षाड्गुण्याय प्रशाखिने । सामादिचारुपुष्पाय त्रिवर्गफलदायिने ॥ नीति-ग्रन्थ के प्रारम्भ में राज्य की वन्दना बड़ी उपयुक्त और सुन्दर कल्पना है । धर्म का लक्षण — यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः ॥ २ ॥ जिससे मानव का अभ्युदय और कल्याण हो वह धर्म है । विशेषार्थ—महर्षि कणाद के मत से अभ्युदय का अर्थ तत्त्वज्ञान और निःश्रेयस का दुःखों की अत्यन्त निवृत्ति है । इस प्रकार तत्त्वज्ञान के द्वारा दुःख की अत्यन्त निवृत्ति धर्म है, महर्षि गौतम के अनुसार अभ्युदय अर्थात् स्वर्ग और निःश्रेयस् अर्थात् मोक्ष जिससे प्राप्त हो वह धर्म है । मीमांसकों के चोदनालक्षणोऽर्थोधर्मः' इस सूत्र के अनुसार वेदों के द्वारा प्रतिपादित कर्म ही धर्म है । किन्तु वेदों के द्वारा उपदिष्ट क्या सभी कर्म अविचारणीय और आवश्यक रूप से कर्त्तव्य हैं ऐसा कहकर इस मत का खण्डन भी किया जाता है । अधर्म का लक्षण— अधर्मः पुनरेतद् विपरीतफलः ॥ ३ ॥ जिस कार्य का फल अभ्युदय और निःश्रेयस् से विपरीत हो वह अधर्म है । धर्मप्राप्ति के उपाय — आत्मवत् परत्र कुशलचिन्तनं शक्तितस्त्यागतपसी च धर्माधिगमो- पायाः ॥ ४ ॥ अपने ही समान दूसरे के कुशल और कल्याण का चिन्तन तथा शक्ति के अनुसार त्याग, तपस्या करना धर्म की प्राप्ति के साधन हैं । श्रेष्ठ आचरण— सर्वसत्वेषु हि समता सर्वाचरणानां परमाचरणम् ॥ ५ ॥ जीव-मात्र पर समता अर्थात् निर्वैरता का भाव समस्त शुभ आचरणों में श्रेष्ठ आचरण है । जीवद्रोहियों की दशा का वर्णन — न खलु भूतद्रुहां कापि क्रिया प्रसूते श्रेयांसि ॥ ६ ॥ जीवों से द्रोह करनेवाले व्यक्ति की कोई भी क्रिया कल्याण-कारिणी नहीं होती । विशेषार्थ—जीव चार प्रकार के हैं—स्वेदज, अण्डज, उद्भिज और