नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मसमुद्देशः ३ जरायुज—इन पर जो दयाभाव न रखकर द्रोह अथवा हिंसा का भाव रखता है उसके स्नान-दान-जप आदि समस्त शुभाचरण व्यर्थ होते हैं। अहिंसक होने का फल— परत्राजिघांसुमनसां व्रतरिक्तमपि चित्तं स्वर्गाय जायते ॥ ७ ॥ दूसरों पर अहिंसा का भाव रखनेवाले व्यक्ति का व्रत-हीन भी जीवन स्वर्गदायक होता है। असत् त्याग का लक्षण— स खलु त्यागो देशत्यागाय यस्मिन् कृते भवत्यात्मनो दौः- स्थित्यम् ॥ ८ ॥ जिस त्याग-कार्य से अपनी दुर्दशा हो जाय वह त्याग का कार्य देश-त्याग करा देता है। विशेषार्थ—इस सूत्र का स्पष्टीकरण शुक्रनीति के निम्न-श्लोक में देखिए, आगतेरधिकं त्यागं यः कुर्यात् तत्सुतादयः । दुःस्थिताः स्युः ऋणग्रस्ताः सोऽपि देशान्तरं व्रजेत् ॥ अविवेकी याचक की निन्दा— स खल्वर्थी परिपन्थी यः परस्य दौःस्थित्यं जानन्नप्यभिलष- त्यर्थम् ॥ ९ ॥ वह याचक निश्चय ही शत्रु है जो दूसरे की दरिद्रावस्था को जानते हुए भी उससे धन की याचना करता है। व्रत-ग्रहण से पूर्व विचार की आवश्यकता— तद् व्रतमाचरितव्यं यत्र न संशयतुलामारोहतः शरीरमनसी ॥१०॥ उस व्रत-नियम आदि का पालन करना चाहिए जिससे शरीर और मन को क्लेश न हो। विशेषार्थ—यही आशय 'चारायण' के निम्न श्लोक में भी अभिव्यक्त हुआ है। अशक्त्या यः शरीरस्य व्रतं नियममेव वा। करोत्यार्त्तो भवेत् पश्चात् पश्चात्तापात् फलच्युतिः ॥ वास्तविक त्याग का लक्षण— ऐहिकामुष्मिकफलार्थमर्थव्ययस्त्यागः ॥ ११ ॥ जिस अर्थ-व्यय अथवा त्याग से इहलोक, परलोक दोनों के ही फल का लाभ हो वही वास्तविक त्याग है।