नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ नीतिवाक्यामृतम् राजा के चले जाने के अनन्तर जो क्षोभकर उस विजिगीषु के देश का मर्दन कर डाले वह पाष्णिग्राह' है । पाष्णिग्राहाद्यः पश्चिमः स आक्रन्दः ॥ २७ ॥ पाष्णिग्राह के लक्षणों से विपरीत लक्षण जिसमें हो वह 'आक्रन्द' है । पाष्णिग्राहामित्रभासार आक्रन्दमित्रं च ॥ २८ ॥ जो पाष्णिग्राह का शत्रु और आक्रन्द का मित्र है वह "आसार" संज्ञक है । अरिविजिगीषोर्मण्डलान्तर्विहितवृत्तिरुभयवेतनः पर्वताटवीकृताश्रय- श्चान्तर्धिः ॥ २६ ॥ जो अरि और विजिगीष इन दोनों के मण्डल के मध्यवर्ती होकर जीवन निर्वाह करे और दोनों ओर से वेतन ग्रहण करे तथा पर्वत अथवा अरण्य में निवास करे वह "अन्तर्धि" है । अराजबीजी लुब्धः क्षुद्रो विरक्तप्रकृतिरन्यायपरो व्यसनी विप्रतिपन्न- मित्रामात्यसामन्तसेनापतिः शत्रुरभियोक्तव्यः ॥ ३० ॥ जो राजा से न उत्पन्न हो, लोभी, क्षुद्र, विरक्त स्वभाव वाला, अन्यायी, मद्य द्यूत आदि दुर्गुणों का व्यसनी हो तथा जिसके मित्र, अमात्य, सामन्त और सेनापति उसके विरुद्ध हो गये हों ऐसे शत्रु पर आक्रमण कर देना चाहिए । अनाश्रयो दुर्बलाश्रयो वा शत्रुरुच्छेद्नीयः ॥ ३१ ॥ जिसका कोई सहायक न हो या हो भी तो हीनशक्ति वाला हो तो ऐसे शत्रु का उन्मूलन कर देना चाहिए । विपर्ययो निष्पीडनीयः कर्षयेद्वा ॥ ३२ ॥ शत्रु यदि मित्र बन जाय तो भी उसे विभवहीन कर दे अर्थात् उसका धन छीन ले अथवा उसे मार डाले । समाभिजनः सहजशत्रुः ॥ ३३ ॥ अपने दायाद पट्टीदार सहज शत्रु होते हैं । विरोधी विरोधयिता वा कृत्रिमः शत्रुः ॥ ३४ ॥ जो किसी कारणवश विरोध करता हो या विरोध करानेवाला हो वह कृत्रिम शत्रु है । अनन्तरः शत्रुरेकान्तरं मित्रमिति नैष एकान्ततः कार्य हि मित्रता- मित्रत्वयोः कारणं न पुनर्विप्रकर्षसन्निकर्षौ ॥ ३५ ॥ दूर सीमान्तवर्त्ती आदि राजा शत्रु होते हैं और समीपवर्ती मित्र यह Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu