भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 220 में से

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षाड्गुण्यसमुद्देशः १६५ निश्चित सिद्धान्त नहीं है क्योंकि शत्रुता और मित्रता के कारण कार्य हैं न कि दूरी और सामीप्य । बुद्धिशक्तिरात्मशक्तेरपि गरीयसी ॥ ३६ ॥ बुद्धिबल आत्मबल से भी श्रेष्ठ है । शशकेनेव सिंहव्यापादनमत्र दृष्टान्तः ॥ ३७ ॥ शशक के द्वारा सिंह का मारा जाना इसका दृष्टान्त है । कोशदण्डबलं प्रभुशक्तिः ॥ ३८ ॥ कोशबल और सैन्यबल का होना प्रभुशक्ति है । शूद्रकशक्तिकुमारौ दृष्टान्तौ॥ ३६ ॥ इसमें शूद्रक और शक्तिकुमार दृष्टान्त हैं । राजा शूद्रक ने अपने विपुलकोष और प्रचुर सैन्यबलसे शक्तिकुमार का नाश कर दिया था । विक्रमोबलं चोत्साहशक्तिस्तत्र रामो दृष्टान्तः ॥ ४० ॥ पराक्रम और बल का होना उत्साहशक्ति है, जिसमें राम दृष्टान्त हैं । शक्तित्रयोपचितो ज्यायान् , शक्तित्रयापचितो हीनः, समान- शक्तित्रयः समः ॥ ४१ ॥ तीनों शक्तियों से अभ्युदय को प्राप्त श्रेष्ठ, उक्त शक्तित्रय से हीन हीन और सम शक्तित्रय वाला व्यक्ति सम है । सन्धि-विग्रह-यानासनसंश्रयद्वैधीभावाः षाड्गुण्यम् ॥ ४२ ॥ मैत्री, वैर, आक्रमण, उपेक्षा करके बैठे रहना, आत्मसमर्पण और दो शत्रुओं में एक के साथ मैत्री करने के अनन्तर दूसरे पर आक्रमण = द्वैधीभावः राजा के लिये यह छह गुण समूह हैं । अपराधो विग्रहः ॥ ४४ ॥ विजयेच्छु राजा के प्रति कोई अनुचित करना विग्रह ( वैर ) है । अभ्युदयो यानम् ॥ ४५ ॥ शत्रु पर चढ़ाई कर देना अथवा पलायन कर जाना 'यान' है । उपेक्षणमासनम् ॥ ४५ ॥ शत्रु के प्रति उपेक्षा भाव रख लेना 'आसन' है । परस्यात्मार्पणं संश्रयः ॥ ४७ ॥ शत्रु को आत्मसमर्पण करना संश्रय है । एकेन सह सन्धायान्येन सह विग्रहकरणमेकेन वा शत्रौ सन्धानपूर्वं विग्रहो द्वैधीभावः ॥ ४८ ॥ जब राज्य पर एक साथ दो शत्रु चढ़ाई कर दे तब एक अपेक्षाकृत

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