भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 220 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 188

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri १७२ नीतिवाक्यामृतम् सा गोष्ठी न प्रस्तोतव्या यत्र परेषामपायः ॥ ६२ ॥ किसी कार्य विशेष के लिये ऐसी गोष्ठी का प्रस्ताव नहीं करना चाहिये जिस के लिये प्रस्तावित अथवा चुने गये लोगों से पक्षपात आदि के कारण लोगों की हानि हो अर्थात् निष्पक्ष व्यक्तियों की कमेटी बनानी चाहिए। गृहागतमर्थं केनापि कारणेन नावधीरयेद् । यदैवार्थार्गमस्तदैव सर्वतिथिनक्षत्रग्रहबलम् ॥ ६३ ॥ घर आये हुए द्रव्य का किसी भी कारण वश अनादर न करे अर्थात् उसे लोटावे नहीं। जब ही पैसा आता है तब ही समस्त तिथि नक्षत्र और ग्रहों का बल प्राप्त हो जाता है। अर्थात् किसी से द्रव्य लेने में सदा शुभ मुहूर्त है। गजेन गजबन्धनमिवार्थेनार्थोपार्जनम् ॥ ६४ ॥ जिस प्रकार शिक्षित हाथी के माध्यम से जंगल में दूसरा हाथी पकड़ा जाता है उसी प्रकार द्रव्य से ही द्रव्य का उपार्जन होता है। न केवलाभ्यां बुद्धिपौरुषाभ्यां महतो जनस्य संभूयोत्थाने सङ्घात- विधातेन दण्डं प्रणयेच्छतभवध्यं सहस्रमदण्ड्यं न प्रणयेत् ॥ ६५ ॥ महान् जन समूह यदि सुसंगठित होकर किसी पक्ष का उत्थापन करता है तो उस जन संघ को अवैध घोषित कर राजा को अपने बुद्धि और पौरुष के गर्व से दण्डित नहीं करना चाहिए। सो और हजार आदमियों का संघ तो अवश्य और अदण्ड्य ही है। अर्थात् सुसंगठित जनमत के विषय में बहुत गम्भीरता पूर्वक विचार करना चाहिए सहसा अपने सामर्थ्य के मद से कुछ दण्डका विधान नहीं करना चाहिए। सा राजन्वती भूमिर्यस्यां नासुरवृत्ती राजा ॥ ६६ ॥ राजा से भूमि अर्थात् देश की शोभा तभी होती है जब राजा आसुरी वृत्ति का न हो। परप्रणेयो राजाऽपरीक्षितार्थमानप्राणहरोऽसुरवृत्तिः ॥ ६७ ॥ दूसरे की बुद्धि पर चलने वाला तथा बिना सम्यक् परीक्षण के ही दूसरे के धन और प्राण का अपहरण करने वाला राजा 'असुरवृत्ति' का राजा है। परकोपप्रसादानुवृत्तिः परप्रणेयः ॥ ६८ ॥ दूसरों के कहने से क्रुद्ध और प्रसन्न होनेवाला राजा 'पर प्रणेय' है। तत्स्वामिच्छन्दोऽनुवर्त्तनं श्रेयो यन्न भवत्यायत्यामहिताय ॥ ६६ ॥ स्वामी की उस इच्छा का अनुसरण करना चाहिए जिससे भविष्य में अपना अहित न हो। Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu