भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 220 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 189

षाड्गुण्यसमुद्देशः १७३ निरनुबन्धमर्थानुबन्धं चार्थमनुगृह्णीयात् ॥ १०० ॥ राजा प्रजा से कर आदि के रूप में धन का ग्रहण इस प्रकार करे जिससे प्रजा को क्लेश न हो और उसकी ऐसी आर्थिक क्षति न हो कि भविष्य में आयका स्रोत ही बन्द हो जाय । नासावर्थो धनाय यत्रायत्यां महानर्थानुबन्धः ॥ १०१ ॥ राजा के लिये वह धन धन नहीं है जिससे भविष्य में उसकी महान् आर्थिक क्षति हो । लाभस्त्रिविधो नवो भूतपूर्वः पैट्यश्च ॥ १०२ ॥ लाभ तीन प्रकार का होता है : सर्वथा नवीन अर्थात् खेती व्यापार आदि से प्राप्त, भूतपूर्वं जैसे कई वर्षों का बचा हुआ अन्न अथवा व्यय से बचाकर एकत्र की गई पूंजी आदि और पैतृक अर्थात् जिसे पिता पितामह आदि छोड़ गये हों । [ इति षाड्गुण्यसमुद्देशः ] ३०. युद्धसमुद्देशः स किं मन्त्री मित्रं वा यः प्रथममेव युद्धोद्योगं भूमित्यागं चोपदि- शति, स्वामिनः सम्पादयति च महान्तमनर्थसंशयम् ॥ १ ॥ वह मन्त्री अथवा मित्र अच्छा नहीं है जो किसी विवाद के प्रारम्भ में ही राजा को अन्य कोई कल्याण-मार्ग न बताकर युद्ध का अथवा देशत्याग का उपदेश देता है और इस प्रकार उसे महान् अनर्थ के संशय में डाल देता है । संग्रामे कोनामात्मवानादावेव स्वामिनं प्राणसन्देहतुलायामारो- पयति ॥ २ ॥ कौन ऐसा विचारशील व्यक्ति होगा जो रण में प्रारम्भ में ही अपने स्वामी के प्राणों को संशय की तुला पर आरोपित करेगा ? अर्थात् अमात्य को प्रारम्भ में सन्धि आदि का उपक्रम कर असफल होने पर ही युद्ध के लिए राजा को तत्पर करना चाहिए । भूम्यर्थन्नृपाणां नयो विक्रमश्च न भूमित्यागाय ॥ ३ ॥ राजा की समस्त नीति और उसका समस्त पराक्रम भूमि अर्थात् देश की रक्षा और वृद्धि के लिये होता है न कि देशत्याग के लिये । बुद्धियुद्धेन परं जेतुमशक्तः शस्त्रयुद्धमुपक्रमेत् ॥ ४ ॥ जब बुद्धि बल से शत्रु को जीतने में असमर्थ हो तब शस्त्रयुद्ध का उपक्रम करे । न तथेषवः प्रभवन्ति यथा प्रज्ञावतां प्रज्ञाः ॥ ५ ॥