नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुद्धसमुद्देशः १७५ दैव की गति कुटिल होती है वह मरणोन्मुख को भी जिला देती है और जीवितेच्छु को भी मार डालती है । अर्थात् दैवगति को कोई समझ नहीं सकता बहुधा एकदम मरता हुआ प्राणी जी उठता है और सर्वथा स्वस्थ व्यक्ति जिसके जीने की पूरी सम्भावना मनुष्य करता रहता है—मर जाता है । अतः जीवन-मरण के प्रश्न को दैव पर डालकर राजा को युद्ध करना ही उचित है । दीपशिखायां पतंगवदैकान्तिके विनाशेऽविचारमपसरेत् ॥ १४ ॥ दीपक की शिखा ( लौ ) में जिस प्रकार पतंगे का निश्चित विनाश है उसी प्रकार युद्ध में अपना निश्चित विनाश समझकर राजा को युद्ध से, बिना अधिक विचार किये हुए ही पलायन कर देना चाहिए । जीवितसंभवे दैवो देयात् कालबलम् ॥ १५ ॥ जीवन की संभावना अर्थात् आयु रहने पर दैव ही युद्ध काल में निर्बल को भी सबल बना देता है । जिससे वह विजयी हो जाता है । वरम् अल्पमपि सारं बलम् , न भूयसी मुण्डमण्डली ॥ १६ ॥ शक्ति और साहसहीन बहुत बड़ी सेना की अपेक्षा थोड़ी भी वस्तुतः शक्तिशाली सेना श्रेष्ठ है । असारबलभङ्गः सारबलभंगं करोति ॥ १७ ॥ जहां सशक्त और अशक्त दोनों प्रकार की सेनाएं संग्राम भूमि में उपस्थित होती हैं वहां अशक्त सेना के नाश अथवा स्वाभाविक भगदड़ से सारवान् = सशक्त सेना में भी भगदड़ मच जाती है और उसका विनाश हो जाता है । नाप्रतिग्रहो युद्धमुपेयात् ॥ १८ ॥ प्रतिग्रह अर्थात् सैन्य से सुसज्जित हुए बिना अकेले युद्ध में न जाना चाहिए । राजन्यञ्जनं पुरस्कृत्य पश्चात् स्वाम्यधिष्ठितस्य सारबलस्य निवेशनं प्रतिग्रहः ॥ १६ ॥ राजचिह्न पताका और गण-वाद्य आदि आगे करके उसके पीछे स्वामी से अधिष्ठित शक्तिशाली सैन्य की सज्जा का नाम 'प्रतिग्रह' है । सप्रतिग्रहं बलं साधु युद्धायोत्सहते ॥ २० ॥ प्रतिग्रह युक्त सेना युद्ध के लिये भली प्रकार से उत्साहित होती है । पृष्ठतः सद्दुर्गजला भूमिर्बलस्य महानाश्रयः ॥ २१ ॥ सेना के पृष्ठभाग में जलयुक्त दुर्ग का होना सेना के लिये महान् आश्रय ( सहारा ) होता है । नद्या नीयमानस्य तटस्थपुरुषदर्शनमपि जीवितहेतुः ॥ २२ ॥