नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
युद्धसमुद्देशः १७५ दैव की गति कुटिल होती है वह मरणोन्मुख को भी जिला देती है और जीवितेच्छु को भी मार डालती है । अर्थात् दैवगति को कोई समझ नहीं सकता बहुधा एकदम मरता हुआ प्राणी जी उठता है और सर्वथा स्वस्थ व्यक्ति जिसके जीने की पूरी सम्भावना मनुष्य करता रहता है—मर जाता है । अतः जीवन-मरण के प्रश्न को दैव पर डालकर राजा को युद्ध करना ही उचित है । दीपशिखायां पतंगवदैकान्तिके विनाशेऽविचारमपसरेत् ॥ १४ ॥ दीपक की शिखा ( लौ ) में जिस प्रकार पतंगे का निश्चित विनाश है उसी प्रकार युद्ध में अपना निश्चित विनाश समझकर राजा को युद्ध से, बिना अधिक विचार किये हुए ही पलायन कर देना चाहिए । जीवितसंभवे दैवो देयात् कालबलम् ॥ १५ ॥ जीवन की संभावना अर्थात् आयु रहने पर दैव ही युद्ध काल में निर्बल को भी सबल बना देता है । जिससे वह विजयी हो जाता है । वरम् अल्पमपि सारं बलम् , न भूयसी मुण्डमण्डली ॥ १६ ॥ शक्ति और साहसहीन बहुत बड़ी सेना की अपेक्षा थोड़ी भी वस्तुतः शक्तिशाली सेना श्रेष्ठ है । असारबलभङ्गः सारबलभंगं करोति ॥ १७ ॥ जहां सशक्त और अशक्त दोनों प्रकार की सेनाएं संग्राम भूमि में उपस्थित होती हैं वहां अशक्त सेना के नाश अथवा स्वाभाविक भगदड़ से सारवान् = सशक्त सेना में भी भगदड़ मच जाती है और उसका विनाश हो जाता है । नाप्रतिग्रहो युद्धमुपेयात् ॥ १८ ॥ प्रतिग्रह अर्थात् सैन्य से सुसज्जित हुए बिना अकेले युद्ध में न जाना चाहिए । राजन्यञ्जनं पुरस्कृत्य पश्चात् स्वाम्यधिष्ठितस्य सारबलस्य निवेशनं प्रतिग्रहः ॥ १६ ॥ राजचिह्न पताका और गण-वाद्य आदि आगे करके उसके पीछे स्वामी से अधिष्ठित शक्तिशाली सैन्य की सज्जा का नाम 'प्रतिग्रह' है । सप्रतिग्रहं बलं साधु युद्धायोत्सहते ॥ २० ॥ प्रतिग्रह युक्त सेना युद्ध के लिये भली प्रकार से उत्साहित होती है । पृष्ठतः सद्दुर्गजला भूमिर्बलस्य महानाश्रयः ॥ २१ ॥ सेना के पृष्ठभाग में जलयुक्त दुर्ग का होना सेना के लिये महान् आश्रय ( सहारा ) होता है । नद्या नीयमानस्य तटस्थपुरुषदर्शनमपि जीवितहेतुः ॥ २२ ॥
१७६ नीतिवाक्यामृतम् नदी में बहे जाते हुए मनुष्य के लिये तट पर पुरुष का दिखलाई पड़ना भी उसके जीवन का कारण होता है। निरन्नमपि सप्राणमेव बलं यदि जलं लभेत ॥ २३ ॥ यदि जल मिलता रहें तो अन्नहीन भी सेना जीवित रह सकती हैं। आत्मशक्तिमविज्ञायोत्साहः शिरसा पर्वतभेदनमिव ॥ २४ ॥ अपनी शक्ति का अनुमान किये बिना सबल शत्रु से युद्ध के लिये उत्सा- हित होना पवंत से टक्कर लेकर शिर फोड़ने के तुल्य हैं। सामसाध्यं युद्धसाध्यं न कुर्यात् ॥ २५ ॥ शान्तिमय उपायों से सिद्ध हो सकने वाले कार्यों को युद्धसाध्य नहीं करना चाहिए। गुडादभिप्रेतसिद्धौ को नाम विषं भुञ्जीत ॥ १६ ॥ जब गुड़ खाने से ही मनोरथ पूर्ण होता हो तो विष कौन खायेगा। अल्पव्ययभयात् सर्वनाशं करोति मूर्खः ॥ २७ ॥ मूर्ख व्यक्ति थोड़े से व्यय के भय से अपना सर्वनाश कर बैठता है। अर्थात् वह राजा मूर्ख है जो किसी बली शत्रु राजा द्वारा कोई क्षुद्र वस्तु या प्रदेश मांगने पर उसे नहीं देता ओर परिणाम स्वरूप उस बलवान् व्यक्ति के क्रुद्ध होने पर अपना सब कुछ खो देता है। कोनाम कृतधीः शुल्क-भयाद् भाण्डं परित्यजति ॥ २८ ॥ कौन बुद्धिमान् शुल्क ( चुङ्गी ) देने के डर से अपने व्यापारी माल की गाँठ त्याग देता है ? स किं व्ययो यो महान्तम् अर्थ रक्षति ॥ २६ ॥ वह व्यय क्या व्यय कहा जायगा जिससे महान् अर्थराशि नष्ट होने से बचाई जा सके। प्रसंग के अनुकूल इसका अभिप्राय यह है कि यदि किसी अत्यन्त बलशाली देश से अपने राज्य की रक्षा के निमित्त शत्रु राजा के आगत-स्वागत में कुछ खर्च करने से जिससे कि वह प्रसन्न होकर आक्रमण आदि न करे तो वैसा आगत-स्वागत सम्बन्धी व्यय व्यर्थ व्यय नहीं हैं। [L28
युद्धसमुद्देशः १७७ सीमान्तवर्ती बलशाली शत्रु राजा को यदि धन देना चाहता हो तो विवाहौत्सव आदि के व्याज से अथवा उसके यहां जाकर मिलने की भेंट के व्याज से दे । आभिषमर्थमप्रयच्छतोऽनवधिः स्यान्निबन्धः शासनम् ॥ ३३ ॥ निवंल राजा यदि सीमाधिप बलशाली राजा को उसका भोज्य अर्थ नहीं देता तो उसे दण्ड स्वरूप अवधि-शून्य बन्धन अर्थात् कारागार आदि प्राप्त होता है । कृतसंधानविघातोऽरिभिर्विशीर्णयूथो गज इव कस्य न भवति साध्यः ॥ ३४ ॥ झुण्ड के अन्य हाथियों को इधर-उधर भगाकर जिस प्रकार अकेला हाथी सहज रूप से वश में कर लिया जाता है उसी प्रकार शत्रु के द्वारा सैन्य भंग कर दिये जाने पर राजा भी किसी साधारण राजा के द्वारा भी वश में किया जा सकता है । विनिःसारितजले सरसि विषमोऽपि ग्राहो जलव्यालवत् ॥ ३५ ॥ जिस तालाब का जल एक दम निकाल दिया जाता है । उसमें बड़ा शक्तिशाली भी घड़ियाल पानी के सांप की तरह प्रभावहीन हो जाता है । वनविनिर्गतः सिंहोऽपि शृगालायते ॥ ३६ ॥ वन से बाहर जाने पर सिंह भी स्यार तुल्य हो जाता है । नास्ति संघस्य निःसारता किन्न स्खलयति मत्तमपि वारणं कुथित- तृणसङ्घातः ॥ ३८ ॥ संघ को निःसार = व्यर्थ नहीं कहा जा सकता क्या बटे हुए मूंज की रस्सी से मतवाला हाथी भी बांधा नहीं जाता ? संहतैर्बिसतन्तुभिर्दिग्गजोऽपि नियम्यते ॥ ३८ ॥ कमलनाल के कोमलतन्तुओं के समूह अर्थात् उसकी बनी रज्जु से दिग्गज भी बांधा जा सकता है । दण्डसाध्ये रिपावुपायन्तरमग्नावाहुतिप्रदानमिव ॥ ३६ ॥ दण्ड साध्य शत्रु के लिये किसी दूसरे अर्थात् साम आदि उपायों का अव- लम्बन अग्नि में आहुति डालने के समान है । यन्त्रशस्त्राग्निक्षारप्रतीकारे व्याधौ किं नामान्यौषधं कुर्यात् ॥ ४० ॥ किसी यन्त्र विशेष, शस्त्र अर्थात् चीर-फाड़ और अग्नि-क्षार अर्थात् किसी तेज तेजाब आदि से ही दूर को जा सकने वाली व्याधि के लिये कोई दूसरी ओषधि क्या कर सकती है ? १२ नी०
१७८ नीतिवाक्यामृतम् उत्पाटितदंष्ट्रो भुजङ्गो रज्जुरिव ॥ ४१ ॥ दांत उखाड़ देने पर विषधर सर्प साधारण रस्सी के समान हो जाता है अर्थात् सैन्य बल आदि नष्ट कर दिये जाने पर राजा भी प्रभावहीन हो जाता है । प्रतिहतप्रतापोऽङ्गारः संपतितोऽपि किं कुर्यात् ॥ ४२ ॥ ठंडा पड़ गया हुआ अङ्गारा शरीर पर गिरकर भी क्या कर सकता है । विद्विषां चाटुकारं न बहु मन्येत ॥ ४३ ॥ शत्रुओं के चाटुकार (प्रिय वचनों द्वारा प्रशंसा) को बहुत महत्त्व नहीं देना चाहिए । जिह्वया लिहन् खड्गो मारयत्येव ॥ ४४ ॥ जिह्वा से भी चाटने पर तलवार मार ही डालती है । तन्त्रावापौ नीतिशास्त्रम् ॥ ४५ ॥ 'तन्त्र' और 'अवाप' का नाम नीतिशास्त्र है । स्वमण्डलपालनाभियोगस्तन्त्रम् ॥ ४६ ॥ अपने मण्डल अथवा राज्य की सुरक्षा और पालन-पोषण की योजना बनाना 'तन्त्र' है । परमण्डलावाप्त्यभियोगोऽवापः ॥ ४७ ॥ दूसरे के मण्डल अथवा राज्य प्राप्ति के निमित्त सन्धि विग्रहादि की योजना 'अवाप' है । बहूनेको न गृह्णीयात् सदर्पोऽपि सर्पो व्यापाद्यत एव पिपीलि- काभिः ॥ ४८ ॥ प्रतिपक्षी यदि बहुत हों तो उनमें अकेला न जाय क्योंकि बलिष्ठ सर्प को भी बहुत सी चींटियां मिलकर मार ही डालती हैं । अशोधितायां परभूमौ न प्रविशेन्निर्गच्छेद् वा ॥ ४६ ॥ बिना परीक्षण के शत्रु के प्रदेश में गमन-निर्गमन नहीं करना चाहिए । विग्रहकाले परस्मादागतं न किञ्चिदपि गृह्णीयात् गृहीत्वा न संवास- येदन्यत्र तद्दायादेभ्यः । श्रूयते हि निजस्वामिना सह कूटकलहं विधायावाप्तविश्वासः कृकलासो नामानीकपतिरात्मविपक्षं विरूपाक्षं जघानेति ॥ ५० ॥ जब बैर ठना हुआ हो अथवा युद्ध चल रहा हो तब शत्रु पक्ष से आये हुए शत्रु के दायादों—पट्टीदारों को छोड़कर अन्य किसी वस्तु या व्यक्ति को अपने वहां न आने दे न आश्रय दे । ऐसा सुना जाता है कि कृकलास नाम के सेना-
पति ने अपने स्वामी के साथ कूट कलह-झूठी लड़ाई करके अपने स्वामी के विपक्षी विरूपाक्ष का विश्वास भाजन बनकर उसे मार डाला था । बलमपीडयन् परानभिषेणयेत् ॥ ५१ ॥ अपनी सेना को किञ्चित् भी कष्ट न देकर अर्थात् खूब सन्तुष्ट रखकर उस सेना के साथ शत्रु-देश पर आक्रमण करना चाहिए । दीर्घप्रयाणोपहतं बलं न कुर्यात् स तथाविधमनायासेन भवति परेषां साध्यम् ॥ ५२ ॥ अपनी सेना को बहुत लम्बा प्रवास का अवसर न देना चाहिए इससे सेना खिन्न हो उठती है और सुखपूर्वक शत्रु के द्वारा अपनी ओर मिलाई जा सकती है। अर्थात् सेना के आदमियों को कुछ दिनों बाद अपने घर जाने का अवकाश भी देते रहना चाहिए जिससे उनके मन में क्षोभ न उत्पन्न करे । न दायादपरः परबलस्याकर्षणमन्त्रोऽस्ति ॥ ५३ ॥ दायाद-सगोत्रों से बढ़कर शत्रु की सेना के आकर्षण का दूसरा कोई मन्त्र नहीं है। शत्रु के पट्टीदार ही ऐसे व्यक्ति होते हैं जो राज्यप्राप्ति के लोभ से बड़ी सरलता के साथ अपने पक्ष में मिलाये जा सकते हैं अतः विग्रहकाल में यदि शत्रु के सगोत्र पट्टीदार किसी रूप से अपनी ओर मिलाये जा सकें तो अत्युत्तम है । यस्याभिमुखं गच्छेत्तस्यावश्यं दायादानुत्थापयेत् ॥ ५४ ॥ जिसके ऊपर आक्रमण करे उसके दायादों को अवश्य उभारे या भड़कावे । कण्टकेन कण्टकमिव परेण परमुद्धरेत् ॥ ५५ ॥ जिस प्रकार एक कांटे से दूसरा शरीर में गड़ा हुआ कांटा निकाला जाता है उसी प्रकार शत्रु के सहारे शत्रु का नाश करे। बिल्वेन हि बिल्वं हन्यमानमुभयथाप्यात्मनो लाभाय ॥ ५६ ॥ बेल से बेल को तोड़ने से दोनों प्रकार से अपना लाभ होता है। दोनों ही फल अगर टूट गये तो दोनों का उपयोग कर लिया जा सकेगा । यावत्परेणापकृतं तावतोऽधिकमपकृत्य सन्धि कुर्यात् ॥ ५७ ॥ शत्रु ने जितनी अधिक अपनी हानि की हो उससे अधिक उसकी हानि करने के अनन्तर उससे सन्धि कर ले । नातप्तं लोहं लोहेन सन्धत्ते ॥ ५८ ॥ बिना तपाया हुआ लोहखण्ड दूसरे लोहखण्ड से नहीं जुड़ता । तेजो हि सन्धाकारणं, नापराधस्य क्षान्तिरुपेक्षा वा ॥ ५९ ॥ ऐक्य अथवा सन्धि का कारण तेज और प्रभाव होता है न कि अपराधों का क्षमा अथवा उपेक्षा करना ।
१८० नीतिवाक्यामृतम उपचीयमानो घटेनेवाश्मा हीनेन विग्रहं कुर्यात् ॥ ६० ॥ जब अपना अभ्युदय हो रहा हो तब अपनी लघुसेना के कारण हीनशक्ति होकर भी महान् शत्रु के साथ युद्ध करना चाहिए । पत्थर का छोटा सा भी टुकड़ा घड़े से टक्कर लेकर उसे फोड़ डालता है । दैवानुलोम्यं, पुण्यपुरुषोपचयोऽप्रतिपक्षता च विजिगीषोरुप- चयः ॥ ६१ ॥ दैव की अनुकूलता, उत्तम पुरुषों का समागम, और विरोधियों का अभाव यह सब विजिगीषु के अभ्युदय के लक्षण हैं । पराक्रमकर्कशः प्रवीरानीकश्चेद् हीनः सन्धाय साधूपचरि- तव्यः ॥ ६२ ॥ शत्रु यदि प्रबल पराक्रमी और वीर पुरुषों की सैन्यशक्ति से सम्पन्न हो तो हीन विजिगीषु को सन्धि के द्वारा सम्यक् व्यवहार करना चाहिए । दुःखामर्षजं तेजो विक्रमयति ॥ ६३ ॥ दुःख से अर्थात् शत्रु द्वारा पीड़ित होने पर क्रोध होता है जिससे तेज- स्विता आती है और पुरुष पराक्रम के लिये तत्पर होता है । स्वजीविते हि निराशस्यावार्यो भवति वीर्यवेगः ॥ ६४ ॥ अपने प्राणों की आशा न रखकर जो युद्ध में प्रवृत्त होता है उसका शौर्य- वेग अजेय होता है । अर्थात् 'कार्यं वा साधयामि शरीरं वा पातयामि' इस संकल्प के साथ जो संग्राम भूमि में अवतीर्ण होता है और अपने प्राणों का मोह छोड़ कर लड़ता है उस योद्धा के आक्रमण के वेग को रोकना दुष्कर होता है । लघुरपि सिंहशावो हन्त्येव दन्तिनम् ॥ ६५ ॥ छोटा भी सिंहशावक हाथी को मार ही डालता है । नातिभग्नं पीडयेत् ॥ ६६ ॥ जो शत्रु अत्यन्त दलित हो चुका हो उसे क्लेश न दे । अर्थात् युद्ध में पराजय के कारण अत्यन्त दुर्दशाग्रस्त होकर जो भाग रहा हो उसका पीछा न करना चाहिए । सम्भव है वह अपने जीवन से निराश होकर 'मरता क्या न करता' उक्ति के अनुसार पुनः समस्त शक्ति से कोई उपद्रव कर दे और उससे अपनी हानि हो जाय । शौर्यैकघनस्योपचारो मनसि तच्छागस्येव पूजा ॥ ६६ ॥ प्रबल पराक्रमी के प्रति सम्मान का बाह्य प्रदर्शन उसके मन में वैसा ही दोष उत्पन्न करता है जैसा कि देवता की पूजा न करके उसके बकरे की पूजा करने से देवता को रोष होता है ।
युद्धसमुद्देशः १८१ समस्य समेन सह विग्रहे निश्चितं मरणं जये च सन्देहः आमं हि पात्रमामेनाभिहतमुभयतः क्षयं करोति ॥ ६८ ॥ समान बल वालों के परस्पर युद्ध में मरण निश्चित होता है और विजय में सन्देह रहता है । मिट्टी के कच्चे बरतन को दूसरे कच्चे बरतन से टकराने पर दोनों का नाश होता है । इस दृष्टान्त का आशय है कि समान बल वाले के साथ युद्ध न करे किन्तु सन्धि कर ले । ज्यायसा सह विग्रहो हस्तिना पदातियुद्धमिव ॥ ६९ ॥ बलवान् के साथ लड़ना पैदल का हाथी से लड़ने के समान विनाश- कारी है । स धर्मविजयोराजा यो विधेयमात्रेणैव सन्तुष्टः प्राणार्थमानेषु न व्यभिचरति ॥ ७० ॥ जो राजा युद्ध के द्वारा किसी को दासमात्र बनाकर ही सन्तुष्ट हो जाता है और प्रजा के प्राण, धन और सम्मान का अपहरण नहीं करता वह धर्म- विजयी है । स लोभविजयी राजा यो द्रव्येण कृतप्रीतिः प्राणाभिमानेषु न व्यभिचरति ॥ ७१ ॥ जो राजा द्रव्य मात्र प्राप्त कर सन्तुष्ट हो जाता है और प्रजा के प्राण और अभिमान का अपहरण नहीं करता वह लोभविजयी है । सोऽसुरविजयी यः प्राणार्थमानोपघातेन महीमभिलषति ॥ ७२ ॥ जो विजित देश की प्रजा के प्राणोंको, सम्पत्तिको और सम्मान को विनष्ट कर उसकी भूमिका अभिलाष रखता है वह असुरविजयी है । असुरविजयिनः संश्रयः सूनागारे मृगप्रवेश इव ॥ ७३ ॥ असुरविजयी राजा के आश्रित होना वधिक के गृह में मृगप्रवेश के समान है । यादृशात्तादृशात् वा यायिनः स्वामी बलवान् यदि साधु चर- संचारः ॥ ७४ ॥ जिस किसी भी प्रकार के आक्रमणकारी से वह प्रभु बलवान् अर्थात् श्रेष्ठ है जिसका गुप्तचर विभाग ठीक है । रणेषु भीतमशस्त्रं च हिंसन् ब्रह्महा भवति ॥ ७५ ॥ संग्राम में, भयभीत और शस्त्रहीन की हिंसा करनेवाला राजा ब्रह्महत्या का भागी होता है । संग्रामधृतेषु यायिषु सत्कृत्य विसर्गः ॥ ७६ ॥
१८२ नीतिवाक्यामृतम् संग्राम में पकड़े गये आक्रमणकारियों को सत्कारपूर्वक अर्थात् कुछ वस्त्र आदि उपहार देकर छोड़ देना चाहिए । मतिनदीयं नाम सर्वेषां प्राणिनामुभयतो वहति पापाय धर्माय च, तत्राद्यं स्रोतोऽतीव सुलभं, दुर्लभं तद् द्वितीयमिति ॥ ७७ ॥ इस संसार में समस्त प्राणियों के दो पार्श्वों में पाप और पुण्य के लिये मति अर्थात् विवेकरूपी सरिता प्रवाहित हो रही है, जिसमें पाप का स्रोत अत्यन्त सुलभ है, किन्तु धर्म का—पुण्य का—स्रोत दुर्लभ है । अर्थात् मनुष्य पाप की ओर सहज रूप से प्रवृत्त होता है; किन्तु धर्म की ओर कठिनता से । सत्येनापि शप्तव्यम् ॥ ७८ ॥ शत्रु के हृदय में विश्वास उत्पन्न कराने के लिये सत्य भाव से भी शपथ करनी चाहिए । महतामभयप्रदानवचनमेव शपथः ॥ ८० ॥ अभयदान देना ही महान् पुरुषों की शपथ है । सतामसतां च वचनायत्ताः खलु सर्वे व्यवहाराः, स एव सर्वलोक- महनीयो यस्य वचनमन्यमनस्कतयाप्यायातं भवति शासनम् ॥ ८१ ॥ संसार के समस्त व्यवहार सज्जनों और असज्जनों के वचन के अधीन हैं । वही आदमी सब लोगों से महान् और पूज्य है जो उदासीन भाव से भी जो कुछ कह देता है वह उसका अनुशासन हो जाता है । अर्थात् ऐसा व्यक्ति जो जिस किसी रूप मे भी कह दे और उसका निर्वाह करे वही सर्वश्रेष्ठ है । १नैयोदिता वाग्वदति सत्या ह्येषा सरस्वती ॥ ८१ ॥ नीतियुक्त वचन ही सत्य सरस्वती का रूप है । व्यभिचारिवचनेषु नैहिकी पारलौकिकी वा क्रियाऽस्ति ॥ ८२ ॥ वचन का पालन न करने वालों का इहलोक तथा परलोक दोनों ही बिगड़ता है । न विश्वासघातात् परं पातकमस्ति ॥ ८३ ॥ विश्वासघात से बढ़कर दूसरा पातक नहीं है । विश्वासघातकः सर्वेषामविश्वासं करोति ॥ ८४ ॥ विश्वासघातक व्यक्ति सब पर स्वयं ही अविश्वास करता है । असत्यसन्धिषु कोशपानं ? जातानुजातान् हन्ति ॥ ८५ ॥ असत्य प्रतिज्ञ पुरुषों का शपथ करना उनके सन्तति का विनाश कर देता है । १. नाप्रेरिता वाग् देवता वदति ।
युद्धसमुद्देशः १८५ बलं बुद्धिर्भूमिर्ग्रहानुलोम्यं परोद्योगश्च प्रत्येकं बहुविकल्पं दण्डमण्ड- लाभोगा संहतव्यूहरचनायां हेतवः ॥ ५६ ॥ सैन्यबल, बुद्धि, विस्तृतप्रदेश, ग्रहों की अनुकूलता, शत्रु का उद्योग, सैन्य मण्डल का अनेक प्रकार का विस्तार ये सुसंगठित व्यूह-रचना के कारण हैं । साधुरचितोऽपि व्यूहस्तावत्तिष्ठति यावन्न परबलदर्शनम् ॥ ५७ ॥ सुसंगठित व्यूह रचना भी तभी तक स्थिर रहती है जब तक कि वह शत्रुसेना का अवलोकन नहीं करती—उसके अनन्तर संग्राम छिड़ जाने पर व्यूह का संगठन छिन्न भिन्न होने लगता है लोग यथावसर लड़ने के लिये इधर-उधर हो जाते हैं ओर व्यूह भंग हो जाता है । न हि शास्त्रशिक्षाक्रमेण योद्धव्यं किन्तु परप्रहाराभिप्रायेण ॥५८॥ संग्राम में शस्त्रविद्या की शिक्षा के अनुसार नहीं किन्तु शत्रु के प्रहार के अनुकूल युद्ध करना चाहिए । व्यसनेषु प्रमादेषु वा परपुरे सैन्यप्रेषणमवस्कन्दः ॥ ५६ ॥ जब शत्रु संकट में पड़ा हो अथवा असावधान हो तब शत्रु के नगर में विजिगीषु का अपनी सेना भेजना 'अवस्कन्द' है । अन्याभिमुखं प्रयाणकमुपक्रम्यान्योपघातकरणं कूटयुद्धम् ॥ ६० ॥ किसी दूसरी ओर के प्रस्थान की भूमिका रचकर दूसरी ओर आक्रमण करना 'कूटयुद्ध' है । विषविषमपुरुषोपनिषद्वारयोगोपजापैः परोपघातानुष्ठानं तूष्णीं दण्डः ॥ ६१ ॥ शत्रु के लिये विष प्रयोग घातक पुरुषों का प्रयोग उसके समीप जाना, सन्देश भेजना, भेदनीति से काम लेना ये 'तूष्णीं दण्ड' हैं । एकं बलस्याधिकृतं न कुर्यात् , भेदापराधेनैकः समर्थो जनयति महा- न्तमनर्थम् ॥ ६२ ॥ किसी एक व्यक्ति को समस्त सैन्य का पूर्ण अधिकार नहीं देना चाहिए, भेदापराध अर्थात् शत्रु से मिल जाने पर वह महान् उपद्रव कर सकता है । अर्थात् सर्वाधिकार यदि किसी एक ही व्यक्ति के पास हुआ और किसी प्रकार यदि वह शत्रु से जा मिला तो अवश्य ही वह अपने स्वामी का सर्वनाश कर देगा । राजा राजकार्येषु मृतानां सन्ततिमपोषयन्नृणभागी स्यात् साधु नोप- चर्यते तन्त्रेण ॥ ६३ ॥ यदि राजकार्य करते हुये आदमियों के मृत हो जाने पर राजा उनकी सन्तति का पालन पोषण नहीं करता तो वह उनका ऋणी रहता है और
१८४ नीतिवाक्यामृतम् उसके अमात्य आदि उसकी ठीक सेवा नहीं करते, क्योंकि उनको यह अनु- भव होता है कि यह हमारे न रहने पर हमारे बच्चों के साथ भी ऐसा ही कृतघ्नता का व्यवहार करेगा । स्वामिनः पुरःसरणं युद्धेऽश्वमेधसमम् ॥ ६४ ॥ युद्ध में स्वामी के आगे होना अश्वमेघ यज्ञ करने के समान पुण्यदायक है । युधि स्वामिनं परित्यजतो नास्तीहामुत्र च कुशलम् ॥ ६५ ॥ युद्ध में स्वामी का साथ छोड़नेवाले का इस लोक और परलोक में भी कल्याण नहीं होता । विग्रहायोच्चलितस्यार्द्धं बलं सर्वदा सन्नद्धमासीत, सेनापतिः प्रयाणमावासं च कुर्वीत, चतुर्दिशमनीकान्यदूरेण सञ्चरेयुस्तिष्ठे- युश्च ॥ ६६ ॥ राजा जब युद्ध के लिये प्रस्थान करे तब आधी सेना से तो वह व्यावहा- रिक रूप में युद्ध करे और उसकी आधी सेना सदा तैयार रहे । उसका सेना- पति युद्ध में जाय भी और एक स्थान पर आवास बनाकर—डेरा डालकर अवसर के अनुकूल वास भी करे, और शत्रु के चारों ओर अपनी सेनायें घूमती रहें और टिकी रहें । धूमाग्निरजोविषाणध्वनिव्याजेनाटविकाः प्रणिधयः परबलान्याग- च्छन्ति इति, निवेदयेयुः ॥ ६७ ॥ विजिगीषु राजा के गुप्तचर सदा जङ्गलों में घूमते रहें और 'शत्रुसेना आ रही है' इसका निवेदन धूम, अग्नि तथा धूलि के प्रदर्शन से शृंग ध्वनि के व्याज से करे । पुरुषप्रमाणोत्सेधमबहुजनविनिवेशनाचरणापसरणयुक्तमग्रतो महा- मण्डपावकाशं च तदंगमध्यस्य सर्वदाऽऽस्थानं दद्यात् ॥ ६७ ॥ विजिगीषु को अपना आस्थान अर्थात् पड़ाव ऐसी जगह डालना चाहिए जो पुरुष प्रमाण अर्थात् पांच-छह फुट ऊंचा हो, जहाँ बहुत अधिक नहीं किन्तु थोड़े आदमी चल फिर सकें और आ जा सकें, उसके आगे मण्डप के लिये विस्तृत स्थान हो—राजा सदा इस प्रकार के पड़ाव के मध्य में स्थित हो । सर्वसाधारणभूमिकं तिष्ठतो नास्ति शरीररक्षा ॥ ६६ ॥ जहाँ सर्वसाधारण का आना जाना हो ऐसे स्थान पर ठहरने से शरीर रक्षा में संशय रहता है । भूचरो दोलाचरस्तुरङ्गचरो वा न कदाचित् परभूमौ प्रवि- शेत् ॥ १०० ॥
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri १८५ विवाहसमुद्देशः शत्रु के प्रदेश में भूमिपर अर्थात् पैदल, पालकी पर चढ़कर और घोड़े पर चढ़कर कभी भी प्रवेश नहीं करना चाहिए। करिणं जंपाणं वाप्यध्यासाने न प्रभवन्ति क्षुद्रोपद्रवाः ॥ १०१ ॥ हाथी अथवा जंपान ( पहाड़ी प्रदेशों में प्रसिद्ध वाहन मनुष्य की पीठ पर बंधे हुए बेंत के आसन पर चलना ) पर चढ़कर चलने से छोटे मोटे उप- द्रवों की संभावना नहीं रहती । [ इति युद्धसमुद्देशः ] ३१. विवाहसमुद्देशः द्वादशवर्षा स्त्री षोडशवर्षः पुमान् प्राप्तव्यवहारौ भवतः ॥ १ ॥ बारह वर्ष की स्त्री, सोलह वर्ष का पुरुष, यह दोनों काम सम्बन्धी व्यव- हारों को समझने योग्य हो जाते हैं । विवाहपूर्वो व्यवहारश्चातुर्वर्ण्यं कुलीनयति ॥ २ ॥ विवाह-पूर्वक काम व्यवहार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों की सन्तान को कुलीन बनाता है। युक्तितो वरणविधानम्, अग्निदेवद्विजसाक्षिकं च पाणिग्रहणं विवाहः ॥ ३ ॥ विधिपूर्वक कन्या और वर का वरण अर्थात् अङ्गीकार या चुनाव करके अग्नि, देवता और ब्राह्मण की साक्षी में उन दोनों का परस्पर पाणिग्रहण कराने का नाम विवाह है । स ब्राह्मो विवाहो यत्र वरायालंकृत्य कन्या प्रदीयते ॥ ४ ॥ जिस विवाह में कन्या को सुन्दर आभूषणों से अलंकृत कर वर को दिया जाता है वह ब्राह्म विवाह है । स दैवो विवाहो यत्र यज्ञार्थमृत्विजः कन्याप्रदानमेव दक्षिणा ॥ ५ ॥ यज्ञ का विधान करके उसमें वर के रूप में वर्त्तमान ऋत्विज् अर्थात् पुरोहित को यज्ञ की दक्षिणा के रूप में कन्यादान करना 'दैवविवाह' है । गोमिथुनपुरः सरं कन्यादानादार्षः ॥ ६ ॥ गाय-बैल की जोड़ी देकर कन्यादान करना 'आर्ष' विवाह है । विनियोगेन कन्याप्रदानात् प्राजापत्यः ॥ ७॥ तुम दोनों एक साथ धर्माचरण करो इस उपदेश या प्रवचन के साथ कन्यादान प्राजापत्य विवाह है । एते चत्वारो धर्म्या विवाहाः ॥ ८ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri १८६ नीतिवाक्यामृतम् ब्राह्म, दैव, आर्ष ओर प्राजापत्य ये चार धर्म्यं अर्थात् शास्त्र धर्मोक्त विवाह हैं। मातुः पितुर्बन्धूनां चाप्रामाण्यात् परस्परानुरागेण मिथः समवायाद् गान्धर्वः ॥ ६ ॥ माता-पिता और बन्धु-बान्धवों द्वारा प्रमाणित अर्थात् स्वीकृत हुए बिना ही परस्पर प्रेम वश पुरुष और स्त्री का सम्मिलन गान्धर्व विवाह है। पणबन्धेन कन्याप्रदानादासुरः ॥ १० ॥ पैसे रुपये का मोल करके अर्थात् वर के पिता से कुछ रुपया आदि लेकर कन्या देना 'आसुर' विवाह हैं। सुप्तप्रमत्तकन्यादानात् पैशाचः ॥ ११ ॥ सोती हुई अथवा मदिरा आदि के नशे से मत्त कन्या का दान 'पैशाच' विवाह है। कन्यायाः प्रसह्मादानाद् राक्षसः ॥ १२ ॥ बलात् कन्या का अपहरण करना 'राक्षस' विवाह है। एते चत्वारोऽधर्म्या अपि नाधर्म्या यद्यस्ति वधू-वरयोरनपवादं पर- स्परस्य भान्यत्वम् ॥ १३ ॥ यद्यपि गान्धर्व, पैशाच, आसुर और राक्षस ये चारों विवाह धर्म-सम्मत नहीं हैं तथापि यदि वर और वधू के बीच परस्पर निर्दोष अनुराग है तो ये अधर्म संगत नहीं होते। उन्नतत्वं कनीनिकयोः, लोमशत्वं जङ्घयोः, अमांसलत्वमूर्वोः, अचा- रुत्वं कटि-नाभि-जठर-कुचयुगलेषु, शिरालुत्वम् अशुभसंस्थानत्वं च बाह्वोः, ऽकृष्णत्वं तालुजिह्वाधरं हरीतकीव, विरलविषमभावो दशनेषु, कूपत्वं कपोलयोः, पिङ्गलत्वमक्ष्णोः, लग्नत्वं पि ( चि ) ल्लिकयोः, स्थपु- टत्वं ललाटे, दुःसन्निवेशत्वं श्रवणयोः, स्थूलकपिलपरुषभावः केशेषु, अतिदीर्घातिलघुन्यूनाधिकताऽसमवादि-कुब्ज-वामन किराताङ्गत्वं, जन्म- देहाभ्यां समानताधिकत्वं चेति कन्यादोषाः । सहसा तद्गृहे स्वयमाहूत- स्यागतस्य वाभ्यक्ता, व्याधिमती, रुदती, पतिघ्नी, सुप्ता, स्तोकायुष्का, बहिर्गता, कुलटा, अप्रसन्ना, दुःखिता, कलहोद्यता, परिजनोद्वासिन्य- प्रियदर्शना, दुर्भगेति नैतां वृणीत कन्याम् ॥ १४ ॥ कन्या के दोष निम्नलिखित हैं। इन दोषों से युक्त कन्या विवाह योग्य नहीं होती। आंखों की पुतलियां उभरी हुई हों, जांघों में रोएं अधिक हों, पिण्डलियों में मांस न हो, कमर, नाभि, पेट और दोनों स्तन सुन्दर न हों, बाहों की नसें Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri विवाहसमुद्देशः १८७ दिखलाई पड़ें और वे सुडोल न हों, तालु, जीभ, और नीचे के होठ हरड़ के रङ्ग के अर्थात् काले हों, दांत ऊंचे नीचे और पृथक्-पृथक् हों, गालों में गड्ढे पड़ते हों, आंखें पीली-पीली हों, पैर की आखिरी अंगुलि सटी हुई हों, माथा उभरा हुआ या धंसा हुआ हो, कान ठीक जगह पर न हों, बाल, मोटे, पीले और कड़े हों, बहुत लम्बी, बहुत लम्बी, बहुत छोटी, और शरीर से बहुत हीन अर्थात् बहुत ही पतली दुबली हो, कमर शरीर के अन्य भागों के अनुकूल न हों, कुबड़ी हो, बौनी हो, अथवा टेढ़े-मेढ़े अंगोंवाली हो, वर के जन्म और देहसे समानता न हो अथवा अधिकता हो, इनके अतिरिक्त घर में अकस्मात् आये हुए अथवा स्वयं बुलाये गये व्यक्ति से मिलने-जुलने वाली हो, रोगिणी हो, सदा रोती रहनेवाली हो, पति की हिंसा करनेवाली, सदा सोनेवाली, अल्पायु, बाहर भागी हुई, कुलटा, सदा उदास, दुःखी और लड़ने के लिये तत्पर, नौकर-चाकरों के लिये उद्वेग उत्पन्न करनेवाली, अप्रियदर्शना और अभागिन—कन्या से विवाह न करे । शिथिले पाणिग्रहणे वरः कन्यया परिभूयते ॥ १५ ॥ पाणिग्रहण में यदि शिथिलता हो तो वर को कन्या से दबकर रहना पड़ता है । मुखमपश्यतो वरस्य, निमीलितलोचना कन्या भवति प्रचण्डा ॥ १६॥ पाणिग्रहण के समय कन्या वर का मुख न देखे और आंखें बन्द कर ले तो समझना चाहिए कि कन्या बड़ी प्रचण्ड अर्थात् उग्र स्वभाव की होगी । सह शयने तूष्णीं भवन् पशुवन्मन्येत ॥ १७ ॥ स्त्री के साथ सोते सयय यदि वर चुपचाप रहता है तो कन्या उसे पशु- तुल्य समझती है । बलादाक्रान्ता जन्मविद्वेष्यो भवति ॥ १८ ॥ यदि वर कन्या के साथ प्रारम्भ में ही बलप्रयोग करता है तो कन्या जन्मभर उससे द्वेष ही करती है । धैर्यचातुर्यायत्तं हि कन्याविस्रम्भणम् ॥ १६ ॥ कन्या को अपना विश्वासभाजन एवं प्रीतिपात्र बनाने के लिये धैर्य और चातुर्य आवश्यक होता है । समविभवाभिजनयोरसमगोत्रयोश्च विवाहसम्बन्धः ॥ २० ॥ समान ऐश्वर्य, समानकुल, किन्तु भिन्न-भिन्न गोत्रवालों का विवाह सम्बन्ध होना चाहिए । महतः पितुरैश्वर्यादल्पमवगणयति ॥ २१ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
१८८ नीतिवाक्यामृतम् कन्या का पिता यदि अधिक ऐश्वर्यशाली हुआ तो कन्या पति को सदा छोटा समझती है। अल्पस्य कन्यापितुर्दौःस्थ्यं महता कष्टेन विज्ञायते ॥ २२ ॥ यदि कन्या का पिता अल्प विभव वाला और वर विशेष विभव वाला हुआ तो कन्या की मनःस्थिति अथवा मन के दुःखों का ठीक-ठीक अनुभव वर को बड़ी कठिनाई से होता है। अल्पस्य महता सह संव्यवहारे महान् व्ययोऽल्पश्चायः ॥ २३ ॥ छोटे कुल का बड़े कुल के साथ सम्बन्ध होने से व्यय अधिक और आय कम होती है। वरं वेश्यायाः परिग्रहो नाविशुद्धकन्याया परिग्रहः ॥ २४ ॥ वेश्या को अङ्गीकार करना अच्छा है किन्तु वंश अथवा चरित्र से शुद्ध जो न हो ऐसी कन्या का वरण नहीं अच्छा है। वरं जन्मनाशः कन्यायाः नाकुलीनेष्ववक्षेपः ॥ २५ ॥ कन्या का जन्म भले ही नष्ट हो जाय, किन्तु उसे अकुलीन के साथ विवाहित कर देना अच्छा नहीं है। सम्यग् वृत्ता कन्या तावत् सन्देहास्पदं यावन्न पाणिग्रहः ॥ २६ ॥ सदाचार सम्पन्न भी कन्या तब तक सन्देह का स्थान बनी रहती है जब तक कि उसका विवाह नहीं हो जाता। विकृतप्रत्यूढापि पुनर्विवाह मर्हतीति स्मृतिकाराः ॥ २७ ॥ स्मृतिकारों का मत है कि संयोग या भ्रमवश अन्धे, लूले, लंगड़े आदि विकृत अंगवाले पुरुष के साथ विवाहित कन्या पुनर्विवाह के योग्य होती है। आनुलोम्येन चतुस्त्रिद्विवर्णाः कन्याभाजनाः ब्राह्मण-क्षत्रिय- विशः ॥ २८ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये अनुलोम क्रम से अर्थात् ब्राह्मण—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार कन्याओं से क्षत्रिय इसी प्रकार तीन और वैश्य दो कन्याओं से विवाह कर सकता है। देशापेक्षा मातुलसम्बन्धः ॥ २९ ॥ मामा की लड़की के साथ विवाह करना देश की प्रथा के अधीन है। धर्मसन्ततिरनुपहतारतिगृहवार्तासुविहितत्वमाभिजात्याचारविशुद्धि- र्देवद्विजातिथिबान्धवसत्कारानवद्यत्वं च दारकर्मणः फलम् ॥ ३० ॥ धर्मानुसार सन्तानोत्पादन, दोषरहित कायसम्बन्ध, गृह के कार्यों का सुव्यवस्थित रूप से होना, कुलीनता और शुद्ध आचार-व्यवहार का होना,
प्रकीर्णसमुद्देशः १८६ देवता, ब्राह्मण, अतिथि और बन्धु-बान्धवों के सत्कार में त्रुटि न होना ये सब दारसंग्रह अर्थात् विवाह के फल हैं । गृहिणी गृहमुच्यते न पुनः कुड्यकटसंघातः ॥ ३१ ॥ गृहिणी का नाम गृह हैं न कि ईंट-पत्थर और लकड़ी के समूह का । गृहकर्मविनियोगः परिमितार्थत्वम् , अस्वातन्त्र्यं सदा मातृव्यञ्जन- स्त्रीजनावरोध इति कुलवधूनां रक्षणोपायः ॥ ३२ ॥ घर के कामों में लगाये रखना, सीमित रुपया पैसा देना, अधिक स्वच्छ- न्दता का न होने देना और सर्वदा बड़ी बूढ़ी स्त्रियों के बीच रखना ये सब कुलवधुओं की रक्षा के उपाय हैं । रजकशिला, कुर्कुरखर्परसमा हि वेश्याः कस्तास्वभिजातोऽभिर- म्येत ॥ ३३ ॥ वेश्याएं धोबी की शिला एवं कुत्ते के भोजन के लिये रखे गये मिट्टी के खप्पड के समान होती हैं कौन कुलीन उनमें अनुरक्त होना चाहेगा अर्थात् कोई कुलीन जिसे अपने वंश-वैभव का अभिमान होगा वेश्यागामी नहीं होगा । दानैर्दौर्भाग्यं, सत्कृतौ परोपभोग्यत्वम् , आसक्तौ परिभवो मरणं वा महोपकारेऽप्यात्मीयत्वं, बहुकालसम्बन्धेऽपि त्यक्तानां तदैव पुरुषान्तर- गामित्वमिति वेश्यानां कुलागतो धर्मः ॥ ३४ ॥ प्रेमी के दान-मान से कभी सन्तुष्ट न होना सत्कार करते रहने पर भी दूसरों से सम्भोग करना, उन पर अत्यन्त आसक्त होने पर या तो अनादृत होना अथवा मरण को प्राप्त करना, महान् उपकार करने पर भी आत्मीयता का अभाव पाया जाना, बहुत समय का भी सम्बन्ध होने पर परित्यक्त होने पर तत्क्षण ही अन्य पुरुष से सम्बन्ध कर लेना ये सब वेश्याओं के कुल परम्परागत धर्म होते हैं । [ इति विवाहसमुद्देशः ] ३२. प्रकीर्णसमुद्देशः समुद्र इव प्रकीर्णकसूक्तरत्नविन्यासनिबन्धनं प्रकीर्णकम् ॥ १ ॥ समुद्र में जिस प्रकार विशाल रत्नराशि इतस्ततः बिखरी हुई है उसी प्रकार विभिन्न प्रसंगों के उपयुक्त सुभाषित रत्नों का विन्यास जिसमें हो उसे प्रकीर्णक कहते हैं ।
१६० नीतिवाक्यामृतम् वर्णपदवाक्यप्रमाणप्रयोगनिष्णातमतिः सुमुखः सुव्यक्तो मधुरगम्भी- रध्वनिः, प्रगल्भः, प्रतिभावान् सम्यगूहापोहावधारणागमशक्तिसम्पन्नः, संप्रज्ञातसमस्तलिपिभाषावर्णाश्रमसमयस्वपरव्यवहारस्थितिराशुलेखन- वाचनसमर्थश्चेति सान्धिविग्रहिकगुणाः॥ २ ॥ वर्ण-पद वाक्य अर्थात् व्याकरण और प्रमाण अर्थात् तर्कशास्त्र के प्रयोग में कुशल बुद्धि, स्पष्ट अक्षर बोलनेवाला स्पष्ट अर्थवाले वाक्यों को प्रयोग करने वाला, मधुर और गम्भीर ध्वनिवाला, धृष्ट, प्रतिभाशाली, अच्छी तरह तर्क- वितर्क करने में कुशल, और विनयी तथा समस्याओं को निश्चयात्मक रूप में जानकर प्रमाण देने में समर्थ, समस्त लिपि, भाषा, चारों वर्णों के आचार- विचार, समयागम (दर्शन-शास्त्र) और अपने तथा पराये से व्यवहार में कुशल शीघ्र लिखने-पढ़ने में समर्थ व्यक्ति सन्धिविग्रहिक सन्धि और युद्ध के विषय में परामर्श दाता हे अर्थात् महामात्य अथवा राज्यमन्त्री उपर्युक्त गुणों से युक्त होना चाहिए । कथाऽव्यवच्छेदो, व्याकुलत्वं, मुखे वैरस्यम् , अनवेक्षणं, स्थानत्यागः, साध्वाचरितेऽपि दोषोद्भावनं, विज्ञप्ते च मौनम् , अक्षमाकालयापनम् , अदर्शनं, वृथाभ्युपगमश्चेति विरक्तलिङ्गानि ॥ ३ ॥ जो पुरुष अपने प्रति विरक्त हो उसके यह लक्षण होते हैं—कथा भंग करना, अर्थात् चलती हुई बातचीत को बीच से काट देना या न सुनना, व्याकु लता, मुख पर आह्लाद का अभाव, सामने न देखना, स्थान छोड़कर चले जाना, अच्छे कार्यों में भी दोष निकालना, कुछ प्रश्न करने पर मौन हो जाना, उत्तर देने में असमर्थ होकर व्यर्थ समय बिताना, मुंह न दिखाना और बात स्वीकार करके उसे पूरा न करना । दूराद्वेक्षणं, मुखप्रसादः, सम्प्रश्नेष्वादरः, प्रियेषु वस्तुषु स्मरणं, परोक्षे गुणग्रहणं, तत्परिवारस्य सदानुवृत्तिरित्यनुरक्तलिं- ङ्गानि ॥ ४ ॥ अपने प्रति श्रद्धालु और अनुरागी व्यक्ति में—दूर से ही देखने लगना, देखते ही मुख पर आह्लाद का होना, प्रश्न करने पर बड़े आदर के साथ सुनना और उत्तर देना अपने लिये की गई प्रिय बातों का स्मरण करते रहना, पीठ पीछे गुणों का वर्णन आदि करना, और सदा उसके परिवार वालों के अनुकूल व्यवहार करना—ये लक्षण होते हैं । श्रुतिसुखत्वम् , अपूर्वाविरुद्धार्थातिशययुक्तत्वम् , उभयालंकार- सम्पन्नत्वम् , अन्यूनाधिकवचनत्वम् , अतिव्यक्तान्वयत्वम् , इति काव्य- स्य गुणाः ॥ ५ ॥
प्रकीर्णसमुद्देशः १६१ काव्य के गुण इस प्रकार हैं :—सुनने में सुखद, नवीन, और अविरोधी अर्थ एवं कल्पनाओं से परिपूर्ण, शब्द और अर्थ उभयविध अलंकारों से युक्त न न्यून न अधिक वचनों के प्रयोग से युक्त और अत्यन्त स्फुट पद तथा वाक्य सम्बन्ध का होना । अतिपरुषवचनविन्यासत्वमनन्वितगतार्थत्वं, दुर्बोधानुपपन्नपदोप- न्यासम्, अयथार्थयतिविन्यासत्वम्, अभिधानाभिधेयशून्यत्वम्, इति काव्यस्य दोषाः ॥ ६ ॥ काव्य के दोष निम्नलिखित हैं : अत्यन्त कर्कश वाक्य रचना, असम्बद्ध और उक्त अर्थ की पुनः आवृत्ति करना, कठिनता से समझ में आने योग्य एवं व्याकरण से सिद्ध न होने वाले पदों का प्रयोग करना, अनुचित स्थानों पर यति अर्थात् विराम का प्रयोग करना, कोश आदि में कथित शब्दों के प्रयोग से शून्य होना । वचनकविः, अर्थकविः, उभयकविः, वर्णकविः, चित्रकविः, दुष्कर- कविः, अरोचकी, सम्मुखाभ्यवहारी चेत्यष्टौ कवयः ॥ ७ ॥ वचन कवि अर्थात् कालिदास आदि के समान प्रसाद गुण सम्पन्न कविता करने वाला, अर्थकवि अर्थात् भारवि के समान गूढार्थ कविता करनेवाला, उभयकवि अर्थात् माघ आदि कवि के समान शब्द और अर्थ दोनों के प्रयोग में अत्यन्त कुशल, वर्णकवि, चित्रकवि और क्लिष्ट कविता करनेवाला, अरोचकी अर्थात् अरुचि उत्पन्न करनेवाली कविता करनेवाला, और सम्मुखाभ्यवहारी अर्थात् सामने ही कविता बना देने वाला—आशुकवि ये आठ प्रकार के कवि होते हैं । मनः प्रसादः, कलासु कौशलं, सुखेन चतुर्वर्गविषया व्युत्पत्तिः, आसंसारं च यश इति कविसङ्ग्रहस्य फलम् ॥ ८ ॥ राजा को अपनी सभा में कवियों का संग्रह करने से ये लाभ होते हैं। कवि की कविताएं सुन सुन कर मन प्रसन्न रहता है, विभिन्न प्रकार की कलाओं में निपुणता प्राप्त होती है, धर्म, अर्थ काम और मोक्ष के सम्बन्ध का ज्ञान सुखपूर्वक हो जाता है तथा संसार की सत्ता जब तक है तब तक उस राजा का यश कवि की कविता के माध्यम से बना रहता है । आलप्तिशुद्धिः, माधुर्यातिशयः, प्रयोगसौन्दर्यम्, अतीव मसृणता, स्थान-कम्पित-कुहरित-आदि भावः, रागान्तर संक्रान्तिः, परिगृहीतराग- निर्वाहः, हृदयग्राहिता चेति गीतस्य गुणाः ॥ ९ ॥ आलाप का शुद्ध होना, अत्यधिक माधुर्य, पदरचना का सौष्ठव, अत्यन्त स्निग्धता और कोमलता, ऊंचा स्तर करके गा सकने योग्य, धुन में गा
१६२ नीतिवाक्यामृतम् सकना, ओर ध्वनि संकोच कर सकना, दूसरे राग में सरलता से परिवर्त्तन किया जा सकना ओर स्वीकृत राग का पूर्ण निर्वाह होना एवं हृदय ग्राहिता का होना यह सब गीत के गुण हैं । समत्वं, तालानुयायित्वं, गेयाभिनेयानुगत्वं, श्लक्ष्णत्वं, प्रव्यक्तयात- प्रयोगत्वम् , श्रुतिसुखावहत्वं चेति वाद्यगुणाः ॥ १० ॥ सम पर बजना, ताल के अनुसार रहना, नेत्र ओर अभिनेय अर्थात् गीत ओर नाट्य के अनुरूप होना कोमलता, स्फुटयति का प्रयोग होना, ओर सुनने में प्रिय लगना ये वाद्य के गुण हैं । दृष्टि हस्तपादक्रियासु समसमायोगः, संगीतकानुगतत्वं, सुश्लिष्ट- ललिताभिनयाङ्गहारप्रयोगभावो, रसभाववृत्तिलावण्यभाव इति नृत्य- गुणाः ॥ ११ ॥ दृष्टि, हाथ और पैर का संचालन समान रूप से, ताल और लय के अनु- सार हो, जो संगीत छिड़ा हो उसका अनुसरण होना, बिना विच्छेद के अभि- नयानुकूल अंगों फा इधर-उधर चलाना, शृङ्गारादि रस, आलम्बन उद्दीपन आदि भाव विभाव तथा कौशिकी आदि वृत्तियों के अनुरूप सौन्दर्य का होना यह सब नृत्य के गुण हैं । स खलु महान् यः खल्वात्तॊ न दुर्वचनं ब्रूते ॥ १२ ॥ जो दुःखी होने पर भी दुर्वचनों का प्रयोग नहीं करता वही व्यक्ति महान् है । स किं गृहाश्रमी यत्रागत्यार्थिनो न भवन्ति कृतार्थाः ॥ १२ ॥ जिसके पास आकर याचक गण सफल होकर न लौटें वह गृहस्थ गृहस्थ नहीं है । ऋणग्रहणेन धर्मः सुखं सेवा वणिज्या च तादात्विकानां नायतिहित- वृत्तीनाम् १४ ॥ इस समय अपना काम निकाल लो भविष्य में देखा जायगा—इस तरह के विचार वाले 'तादात्विक' लोग ही ऋण लेकर तीर्थ यात्रा, यज्ञ आदि सांसारिक सुखभोग और किसी बड़े आदमी का स्वागत-सत्कार रूप सेवा कार्य तथा व्यापार करते हैं, किन्तु जो विवेकी हैं और उत्तर काल में अपना कल्याण चाहते हैं वे ऐसा नहीं करते । स्वस्य विद्यमानम् अर्थिभ्यो देयं नाविद्यमानम् ॥ १५ ॥ अपने पास जो वस्तु वर्त्तमान हो उसे ही याचकों फो देना चाहिए न कि जो न हो उसे भी ऋण आदि कर देना ।
प्रकीर्णसमुद्देशः १६३ ऋणदातुरासन्नं फलं परोपास्तिः कलहः परिभवः प्रस्तावेऽर्था- लाभश्च ॥ १६ ॥ ऋणदाता को तत्काल यही फल मिलता है कि उसे दूसरे की उपासना करनी पड़ती है अर्थात् जिसे ऋण दिया है उसके यहां जाकर मांगना पड़ता है, कलह होता है, ऋण लेने वाले के द्वारा तिरस्कार होता है और अपने काम के समय उसे अपना धन नहीं मिलता । अदातुस्तावत् स्नेहः सौजन्यं प्रियभाषणं वा साधुता च यावन्ना- र्थावाप्तिः ॥ १७ ॥ कर्ज लेकर फिर उसे न देने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति कर्ज लेनेवाले से तभी तक स्नेह, सजनता और प्रियभाषण तथा साधुता-पूर्ण व्यवहार रखता है जब तक कि उसे अर्थ अर्थात् कर्ज नहीं मिल जाता । तदसत्यमपि नासत्यं यत्र न सम्भाव्यार्थहानिः ॥ १८ ॥ झूठ बोलकर भविष्य की किसी विशेष अर्थहानि को बचाया जा सके अथवा महान् कार्य सिद्ध हो सके तो वह झूठ-मूठ नहीं है । प्राणवधे नास्ति कश्चिदसत्यवादः ॥ १९ ॥ झूठ बोलकर किसी निरपराध के प्राण बचाए जा सकें तो वह झूठ- मूठ नहीं है । अर्थाय मातरमपि लोको हिनस्ति किं पुनरसत्यं न भाषते ॥ २० ॥ धन के लिये लोग माता को भी मार डालते हैं तो क्या झूठ न बोलेंगे । अतः धन के सम्बन्ध में विश्वास नहीं करना चाहिए चाहे कितनी ही शपथ कोई क्यों न ले । सत्कला-सत्योपासनं हि विवाहकर्म, दैवायत्तस्तु वधूवरयो- र्निर्वाहः ॥ २१ ॥ सत् कलाओं की प्राप्ति, सत्य भाषण में स्वाभाविक रुचि ये विवाह के कर्त्तव्य-कर्म हैं और वधू तथा वर का निर्वाह पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति तो भाग्याधीन ही होती है । रतिकाले तन्नास्ति कामात्तों यन्न ब्रूते पुमान् , न चैतत्प्रमा- णम् ॥ २२ ॥ काम-बाधा से पीड़ित मनुष्य रति के समय अपनी प्रिया के विश्वास और प्रसन्नता के लिये ऐसी कौन सी बात है जो नहीं कहता किन्तु वह सब प्रामाणिक नहीं होतीं । तावत् स्त्री-पुरुषयोः परस्परं प्रीतिर्यावन्न प्रातिलोम्यं कलहो रतिः र्त्तवं च ॥ २३ ॥ १३ नी०
१६४ नीतिवाक्यामृतम्
स्त्री और पुरुष में परस्पर प्रेम तभी तक बना रहता है जब तक कि उनमें किसी बात से परस्पर प्रतिकूलता न हो, कलह न हो और रति-संबंधी कोई छल-कपट न पैदा हो। तादात्विकबलस्य कुतो रणे जयः, प्राणार्थः स्त्रीषु कल्याणं वा ॥ २४ ॥ अस्थायी सेना से संग्राम में विजय नहीं मिलती तथा प्राण-रक्षा की दृष्टि से स्त्रियों के प्रति किये गये कल्याणकारी कार्यों से प्राण-रक्षा नहीं होती। अर्थात् तत्काल के लिये इकट्ठा की गई सेना से संग्राम नहीं जीता जा सकता और भविष्य में यह हमारी रक्षा करेगी इस दृष्टि से स्त्रियों के संग की गई भलाई भी काम नहीं देती। तावत् सर्वः सर्वस्यानुनयवृत्तिपरो यावन्न भवति कृतार्थः ॥ २५ ॥ तब तक सभी सब की सेवा में विनम्र भाव से लगे रहते हैं जब तक कि उनका काम नहीं निकल जाता। काम निकल जाने पर कोई किसी को नहीं पूछता। अशुभस्य कालहरणमेव प्रतीकारः ॥ २६ ॥ अशुभ बातों को दूर रखने के लिये समय का बिता देना ही एक मात्र उपाय है। पक्वान्नादिव स्त्रीजनाद्दोषशान्तिरेव प्रयोजनं किं तत्र रागविरा- गाभ्याम् ॥ २७ ॥ पका हुआ अन्न खाने से जैसे भूख मिट जाती है उसी प्रकार स्त्रियों से कामशान्ति मात्र करना प्रयोजन रखना चाहिए उनमें आसक्ति और विरक्ति नहीं। तृणेनापि प्रयोजनमस्ति किं पुनर्न पाणिपादवता मनुष्येण ॥ २८ ॥ समय पर घास तिनके से भी मनुष्य को प्रयोजन होता है तो हस्त- पाद आदि से संयुक्त मनुष्य से क्यों न होगा ? अतः सब से मैत्री भाव रखना चाहिए। न कस्यापि लेखमवमन्येत, लेखप्रधाना हि राजानस्तन्मूलत्वात् सन्धिविग्रहयोः सकलस्य जगद्व्यापारस्य च ॥ २६ ॥ किसी सामान्य राजा के भी लेख का अनादर नहीं करना चाहिए। राजाओं के यहाँ लेख ही मुख्य होता है। उसी के आधार पर उनके यहाँ सन्धि और विग्रह का काम चलता है और समस्त संसार के काम भी लेख के ही अधीन होते हैं। पुष्पयुद्धमपि नीतिवेदिनो नेच्छन्ति किं पुनः शस्त्रयुद्धम् ॥ ३० ॥
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