भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

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प्रकीर्णसमुद्देशः १८६ देवता, ब्राह्मण, अतिथि और बन्धु-बान्धवों के सत्कार में त्रुटि न होना ये सब दारसंग्रह अर्थात् विवाह के फल हैं । गृहिणी गृहमुच्यते न पुनः कुड्यकटसंघातः ॥ ३१ ॥ गृहिणी का नाम गृह हैं न कि ईंट-पत्थर और लकड़ी के समूह का । गृहकर्मविनियोगः परिमितार्थत्वम् , अस्वातन्त्र्यं सदा मातृव्यञ्जन- स्त्रीजनावरोध इति कुलवधूनां रक्षणोपायः ॥ ३२ ॥ घर के कामों में लगाये रखना, सीमित रुपया पैसा देना, अधिक स्वच्छ- न्दता का न होने देना और सर्वदा बड़ी बूढ़ी स्त्रियों के बीच रखना ये सब कुलवधुओं की रक्षा के उपाय हैं । रजकशिला, कुर्कुरखर्परसमा हि वेश्याः कस्तास्वभिजातोऽभिर- म्येत ॥ ३३ ॥ वेश्याएं धोबी की शिला एवं कुत्ते के भोजन के लिये रखे गये मिट्टी के खप्पड के समान होती हैं कौन कुलीन उनमें अनुरक्त होना चाहेगा अर्थात् कोई कुलीन जिसे अपने वंश-वैभव का अभिमान होगा वेश्यागामी नहीं होगा । दानैर्दौर्भाग्यं, सत्कृतौ परोपभोग्यत्वम् , आसक्तौ परिभवो मरणं वा महोपकारेऽप्यात्मीयत्वं, बहुकालसम्बन्धेऽपि त्यक्तानां तदैव पुरुषान्तर- गामित्वमिति वेश्यानां कुलागतो धर्मः ॥ ३४ ॥ प्रेमी के दान-मान से कभी सन्तुष्ट न होना सत्कार करते रहने पर भी दूसरों से सम्भोग करना, उन पर अत्यन्त आसक्त होने पर या तो अनादृत होना अथवा मरण को प्राप्त करना, महान् उपकार करने पर भी आत्मीयता का अभाव पाया जाना, बहुत समय का भी सम्बन्ध होने पर परित्यक्त होने पर तत्क्षण ही अन्य पुरुष से सम्बन्ध कर लेना ये सब वेश्याओं के कुल परम्परागत धर्म होते हैं । [ इति विवाहसमुद्देशः ] ३२. प्रकीर्णसमुद्देशः समुद्र इव प्रकीर्णकसूक्तरत्नविन्यासनिबन्धनं प्रकीर्णकम् ॥ १ ॥ समुद्र में जिस प्रकार विशाल रत्नराशि इतस्ततः बिखरी हुई है उसी प्रकार विभिन्न प्रसंगों के उपयुक्त सुभाषित रत्नों का विन्यास जिसमें हो उसे प्रकीर्णक कहते हैं ।