भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 220 में से

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पृष्ठ 206

१६० नीतिवाक्यामृतम् वर्णपदवाक्यप्रमाणप्रयोगनिष्णातमतिः सुमुखः सुव्यक्तो मधुरगम्भी- रध्वनिः, प्रगल्भः, प्रतिभावान् सम्यगूहापोहावधारणागमशक्तिसम्पन्नः, संप्रज्ञातसमस्तलिपिभाषावर्णाश्रमसमयस्वपरव्यवहारस्थितिराशुलेखन- वाचनसमर्थश्चेति सान्धिविग्रहिकगुणाः॥ २ ॥ वर्ण-पद वाक्य अर्थात् व्याकरण और प्रमाण अर्थात् तर्कशास्त्र के प्रयोग में कुशल बुद्धि, स्पष्ट अक्षर बोलनेवाला स्पष्ट अर्थवाले वाक्यों को प्रयोग करने वाला, मधुर और गम्भीर ध्वनिवाला, धृष्ट, प्रतिभाशाली, अच्छी तरह तर्क- वितर्क करने में कुशल, और विनयी तथा समस्याओं को निश्चयात्मक रूप में जानकर प्रमाण देने में समर्थ, समस्त लिपि, भाषा, चारों वर्णों के आचार- विचार, समयागम (दर्शन-शास्त्र) और अपने तथा पराये से व्यवहार में कुशल शीघ्र लिखने-पढ़ने में समर्थ व्यक्ति सन्धिविग्रहिक सन्धि और युद्ध के विषय में परामर्श दाता हे अर्थात् महामात्य अथवा राज्यमन्त्री उपर्युक्त गुणों से युक्त होना चाहिए । कथाऽव्यवच्छेदो, व्याकुलत्वं, मुखे वैरस्यम् , अनवेक्षणं, स्थानत्यागः, साध्वाचरितेऽपि दोषोद्भावनं, विज्ञप्ते च मौनम् , अक्षमाकालयापनम् , अदर्शनं, वृथाभ्युपगमश्चेति विरक्तलिङ्गानि ॥ ३ ॥ जो पुरुष अपने प्रति विरक्त हो उसके यह लक्षण होते हैं—कथा भंग करना, अर्थात् चलती हुई बातचीत को बीच से काट देना या न सुनना, व्याकु लता, मुख पर आह्लाद का अभाव, सामने न देखना, स्थान छोड़कर चले जाना, अच्छे कार्यों में भी दोष निकालना, कुछ प्रश्न करने पर मौन हो जाना, उत्तर देने में असमर्थ होकर व्यर्थ समय बिताना, मुंह न दिखाना और बात स्वीकार करके उसे पूरा न करना । दूराद्वेक्षणं, मुखप्रसादः, सम्प्रश्नेष्वादरः, प्रियेषु वस्तुषु स्मरणं, परोक्षे गुणग्रहणं, तत्परिवारस्य सदानुवृत्तिरित्यनुरक्तलिं- ङ्गानि ॥ ४ ॥ अपने प्रति श्रद्धालु और अनुरागी व्यक्ति में—दूर से ही देखने लगना, देखते ही मुख पर आह्लाद का होना, प्रश्न करने पर बड़े आदर के साथ सुनना और उत्तर देना अपने लिये की गई प्रिय बातों का स्मरण करते रहना, पीठ पीछे गुणों का वर्णन आदि करना, और सदा उसके परिवार वालों के अनुकूल व्यवहार करना—ये लक्षण होते हैं । श्रुतिसुखत्वम् , अपूर्वाविरुद्धार्थातिशययुक्तत्वम् , उभयालंकार- सम्पन्नत्वम् , अन्यूनाधिकवचनत्वम् , अतिव्यक्तान्वयत्वम् , इति काव्य- स्य गुणाः ॥ ५ ॥

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