भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

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१७८ नीतिवाक्यामृतम् उत्पाटितदंष्ट्रो भुजङ्गो रज्जुरिव ॥ ४१ ॥ दांत उखाड़ देने पर विषधर सर्प साधारण रस्सी के समान हो जाता है अर्थात् सैन्य बल आदि नष्ट कर दिये जाने पर राजा भी प्रभावहीन हो जाता है । प्रतिहतप्रतापोऽङ्गारः संपतितोऽपि किं कुर्यात् ॥ ४२ ॥ ठंडा पड़ गया हुआ अङ्गारा शरीर पर गिरकर भी क्या कर सकता है । विद्विषां चाटुकारं न बहु मन्येत ॥ ४३ ॥ शत्रुओं के चाटुकार (प्रिय वचनों द्वारा प्रशंसा) को बहुत महत्त्व नहीं देना चाहिए । जिह्वया लिहन् खड्गो मारयत्येव ॥ ४४ ॥ जिह्वा से भी चाटने पर तलवार मार ही डालती है । तन्त्रावापौ नीतिशास्त्रम् ॥ ४५ ॥ 'तन्त्र' और 'अवाप' का नाम नीतिशास्त्र है । स्वमण्डलपालनाभियोगस्तन्त्रम् ॥ ४६ ॥ अपने मण्डल अथवा राज्य की सुरक्षा और पालन-पोषण की योजना बनाना 'तन्त्र' है । परमण्डलावाप्त्यभियोगोऽवापः ॥ ४७ ॥ दूसरे के मण्डल अथवा राज्य प्राप्ति के निमित्त सन्धि विग्रहादि की योजना 'अवाप' है । बहूनेको न गृह्णीयात् सदर्पोऽपि सर्पो व्यापाद्यत एव पिपीलि- काभिः ॥ ४८ ॥ प्रतिपक्षी यदि बहुत हों तो उनमें अकेला न जाय क्योंकि बलिष्ठ सर्प को भी बहुत सी चींटियां मिलकर मार ही डालती हैं । अशोधितायां परभूमौ न प्रविशेन्निर्गच्छेद् वा ॥ ४६ ॥ बिना परीक्षण के शत्रु के प्रदेश में गमन-निर्गमन नहीं करना चाहिए । विग्रहकाले परस्मादागतं न किञ्चिदपि गृह्णीयात् गृहीत्वा न संवास- येदन्यत्र तद्दायादेभ्यः । श्रूयते हि निजस्वामिना सह कूटकलहं विधायावाप्तविश्वासः कृकलासो नामानीकपतिरात्मविपक्षं विरूपाक्षं जघानेति ॥ ५० ॥ जब बैर ठना हुआ हो अथवा युद्ध चल रहा हो तब शत्रु पक्ष से आये हुए शत्रु के दायादों—पट्टीदारों को छोड़कर अन्य किसी वस्तु या व्यक्ति को अपने वहां न आने दे न आश्रय दे । ऐसा सुना जाता है कि कृकलास नाम के सेना-