नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुद्धसमुद्देशः १७७ सीमान्तवर्ती बलशाली शत्रु राजा को यदि धन देना चाहता हो तो विवाहौत्सव आदि के व्याज से अथवा उसके यहां जाकर मिलने की भेंट के व्याज से दे । आभिषमर्थमप्रयच्छतोऽनवधिः स्यान्निबन्धः शासनम् ॥ ३३ ॥ निवंल राजा यदि सीमाधिप बलशाली राजा को उसका भोज्य अर्थ नहीं देता तो उसे दण्ड स्वरूप अवधि-शून्य बन्धन अर्थात् कारागार आदि प्राप्त होता है । कृतसंधानविघातोऽरिभिर्विशीर्णयूथो गज इव कस्य न भवति साध्यः ॥ ३४ ॥ झुण्ड के अन्य हाथियों को इधर-उधर भगाकर जिस प्रकार अकेला हाथी सहज रूप से वश में कर लिया जाता है उसी प्रकार शत्रु के द्वारा सैन्य भंग कर दिये जाने पर राजा भी किसी साधारण राजा के द्वारा भी वश में किया जा सकता है । विनिःसारितजले सरसि विषमोऽपि ग्राहो जलव्यालवत् ॥ ३५ ॥ जिस तालाब का जल एक दम निकाल दिया जाता है । उसमें बड़ा शक्तिशाली भी घड़ियाल पानी के सांप की तरह प्रभावहीन हो जाता है । वनविनिर्गतः सिंहोऽपि शृगालायते ॥ ३६ ॥ वन से बाहर जाने पर सिंह भी स्यार तुल्य हो जाता है । नास्ति संघस्य निःसारता किन्न स्खलयति मत्तमपि वारणं कुथित- तृणसङ्घातः ॥ ३८ ॥ संघ को निःसार = व्यर्थ नहीं कहा जा सकता क्या बटे हुए मूंज की रस्सी से मतवाला हाथी भी बांधा नहीं जाता ? संहतैर्बिसतन्तुभिर्दिग्गजोऽपि नियम्यते ॥ ३८ ॥ कमलनाल के कोमलतन्तुओं के समूह अर्थात् उसकी बनी रज्जु से दिग्गज भी बांधा जा सकता है । दण्डसाध्ये रिपावुपायन्तरमग्नावाहुतिप्रदानमिव ॥ ३६ ॥ दण्ड साध्य शत्रु के लिये किसी दूसरे अर्थात् साम आदि उपायों का अव- लम्बन अग्नि में आहुति डालने के समान है । यन्त्रशस्त्राग्निक्षारप्रतीकारे व्याधौ किं नामान्यौषधं कुर्यात् ॥ ४० ॥ किसी यन्त्र विशेष, शस्त्र अर्थात् चीर-फाड़ और अग्नि-क्षार अर्थात् किसी तेज तेजाब आदि से ही दूर को जा सकने वाली व्याधि के लिये कोई दूसरी ओषधि क्या कर सकती है ? १२ नी०