नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८४ नीतिवाक्यामृतम् उसके अमात्य आदि उसकी ठीक सेवा नहीं करते, क्योंकि उनको यह अनु- भव होता है कि यह हमारे न रहने पर हमारे बच्चों के साथ भी ऐसा ही कृतघ्नता का व्यवहार करेगा । स्वामिनः पुरःसरणं युद्धेऽश्वमेधसमम् ॥ ६४ ॥ युद्ध में स्वामी के आगे होना अश्वमेघ यज्ञ करने के समान पुण्यदायक है । युधि स्वामिनं परित्यजतो नास्तीहामुत्र च कुशलम् ॥ ६५ ॥ युद्ध में स्वामी का साथ छोड़नेवाले का इस लोक और परलोक में भी कल्याण नहीं होता । विग्रहायोच्चलितस्यार्द्धं बलं सर्वदा सन्नद्धमासीत, सेनापतिः प्रयाणमावासं च कुर्वीत, चतुर्दिशमनीकान्यदूरेण सञ्चरेयुस्तिष्ठे- युश्च ॥ ६६ ॥ राजा जब युद्ध के लिये प्रस्थान करे तब आधी सेना से तो वह व्यावहा- रिक रूप में युद्ध करे और उसकी आधी सेना सदा तैयार रहे । उसका सेना- पति युद्ध में जाय भी और एक स्थान पर आवास बनाकर—डेरा डालकर अवसर के अनुकूल वास भी करे, और शत्रु के चारों ओर अपनी सेनायें घूमती रहें और टिकी रहें । धूमाग्निरजोविषाणध्वनिव्याजेनाटविकाः प्रणिधयः परबलान्याग- च्छन्ति इति, निवेदयेयुः ॥ ६७ ॥ विजिगीषु राजा के गुप्तचर सदा जङ्गलों में घूमते रहें और 'शत्रुसेना आ रही है' इसका निवेदन धूम, अग्नि तथा धूलि के प्रदर्शन से शृंग ध्वनि के व्याज से करे । पुरुषप्रमाणोत्सेधमबहुजनविनिवेशनाचरणापसरणयुक्तमग्रतो महा- मण्डपावकाशं च तदंगमध्यस्य सर्वदाऽऽस्थानं दद्यात् ॥ ६७ ॥ विजिगीषु को अपना आस्थान अर्थात् पड़ाव ऐसी जगह डालना चाहिए जो पुरुष प्रमाण अर्थात् पांच-छह फुट ऊंचा हो, जहाँ बहुत अधिक नहीं किन्तु थोड़े आदमी चल फिर सकें और आ जा सकें, उसके आगे मण्डप के लिये विस्तृत स्थान हो—राजा सदा इस प्रकार के पड़ाव के मध्य में स्थित हो । सर्वसाधारणभूमिकं तिष्ठतो नास्ति शरीररक्षा ॥ ६६ ॥ जहाँ सर्वसाधारण का आना जाना हो ऐसे स्थान पर ठहरने से शरीर रक्षा में संशय रहता है । भूचरो दोलाचरस्तुरङ्गचरो वा न कदाचित् परभूमौ प्रवि- शेत् ॥ १०० ॥