भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 220 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 201

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri १८५ विवाहसमुद्देशः शत्रु के प्रदेश में भूमिपर अर्थात् पैदल, पालकी पर चढ़कर और घोड़े पर चढ़कर कभी भी प्रवेश नहीं करना चाहिए। करिणं जंपाणं वाप्यध्यासाने न प्रभवन्ति क्षुद्रोपद्रवाः ॥ १०१ ॥ हाथी अथवा जंपान ( पहाड़ी प्रदेशों में प्रसिद्ध वाहन मनुष्य की पीठ पर बंधे हुए बेंत के आसन पर चलना ) पर चढ़कर चलने से छोटे मोटे उप- द्रवों की संभावना नहीं रहती । [ इति युद्धसमुद्देशः ] ३१. विवाहसमुद्देशः द्वादशवर्षा स्त्री षोडशवर्षः पुमान् प्राप्तव्यवहारौ भवतः ॥ १ ॥ बारह वर्ष की स्त्री, सोलह वर्ष का पुरुष, यह दोनों काम सम्बन्धी व्यव- हारों को समझने योग्य हो जाते हैं । विवाहपूर्वो व्यवहारश्चातुर्वर्ण्यं कुलीनयति ॥ २ ॥ विवाह-पूर्वक काम व्यवहार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों की सन्तान को कुलीन बनाता है। युक्तितो वरणविधानम्, अग्निदेवद्विजसाक्षिकं च पाणिग्रहणं विवाहः ॥ ३ ॥ विधिपूर्वक कन्या और वर का वरण अर्थात् अङ्गीकार या चुनाव करके अग्नि, देवता और ब्राह्मण की साक्षी में उन दोनों का परस्पर पाणिग्रहण कराने का नाम विवाह है । स ब्राह्मो विवाहो यत्र वरायालंकृत्य कन्या प्रदीयते ॥ ४ ॥ जिस विवाह में कन्या को सुन्दर आभूषणों से अलंकृत कर वर को दिया जाता है वह ब्राह्म विवाह है । स दैवो विवाहो यत्र यज्ञार्थमृत्विजः कन्याप्रदानमेव दक्षिणा ॥ ५ ॥ यज्ञ का विधान करके उसमें वर के रूप में वर्त्तमान ऋत्विज् अर्थात् पुरोहित को यज्ञ की दक्षिणा के रूप में कन्यादान करना 'दैवविवाह' है । गोमिथुनपुरः सरं कन्यादानादार्षः ॥ ६ ॥ गाय-बैल की जोड़ी देकर कन्यादान करना 'आर्ष' विवाह है । विनियोगेन कन्याप्रदानात् प्राजापत्यः ॥ ७॥ तुम दोनों एक साथ धर्माचरण करो इस उपदेश या प्रवचन के साथ कन्यादान प्राजापत्य विवाह है । एते चत्वारो धर्म्या विवाहाः ॥ ८ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu