नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकामसमुद्देशः १३ ऐश्वर्य की सफलता— इन्द्रियमनः प्रसादनफला हि विभूतयः ॥ ६ ॥ ऐश्वर्यं का फल इन्द्रियों और मन की प्रसन्नता है। जिस ऐश्वर्यं से अपनी इंद्रियां और मन प्रसन्न न रह सके वह ऐश्वर्यं व्यर्थं है। अजितेन्द्रिय होने का दोष— नाजितेन्द्रियाणां कापि कार्यसिद्धिरस्ति ॥ ७ ॥ जिन की इन्द्रियां वश में नहीं हैं, उनको किसी भी कार्यं में सफलता नहीं मिलती। इन्द्रिय जय का स्वरूप— इष्टेऽर्थेऽनासक्तिर्विरुद्धे चाप्रवृत्तिरिन्द्रियजयः ॥ ८ ॥ प्रिय वस्तु में अधिक आसक्त न होना और प्रतिकूल में प्रवृत्त न होने का नाम इन्द्रिय जय है। विशेषार्थ—प्रतिकूल कार्य में मनुष्य स्वभावतः नहीं प्रवृत्त होता उसके विषय में यहां विशेष रूप से लिखने का तात्पर्यं "कामसमुद्देश" प्रकरण की दृष्टि से यह है कि प्रिय प्रेयसी पर अधिक अनुरक्त न होना और प्रतिकूल पर- दारा के सेवन में प्रवृत्त ही न होना वास्तविक इन्द्रिय विजय है। अथवा प्रिय पर अधिक अनुरक्त न होना और प्रतिकूल से घबड़ाना नहीं इन्द्रियजय का लक्षण है। अर्थशास्त्र के अध्ययन से "इन्द्रियजय"— अर्थशास्त्राध्ययनं वा ॥ ६ ॥ अथवा अर्थशास्त्र का अध्ययन भी इन्द्रिय जय का कारण है। नीतिशास्त्राण्यधीते यस्तस्य दुष्टानि खान्येपि । वशगानि शनैर्यान्ति कशाघातैर्हया यथा ॥ काम के दोष— योऽनङ्गेनापि जीयते स कथं [पुष्टाङ्गानरातीन् जयेत् ॥ १० ॥ कामदेव को महादेव जी ने भस्म कर दिया था इस लिये उसकी 'अनङ्ग' संज्ञा है। यहां शाब्दिक चमत्कार पूर्वक कहा गया है कि जो बिना अङ्गवाले से भी जीता जा सकता है अर्थात् काम के वशीभूत हो जाता है वह पुष्ट अङ्ग वाले शत्रुओं को कैसे जीत सकता है। कामी पुरुष असाध्य रोगी है— कामासक्तस्य नास्ति चिकित्सितम् ॥ ११ ॥ अत्यन्त कामी पुरुष को विनाश से बचाने के लिये कोई चिकित्सा ( उपाय ) नहीं है।