भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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१४ नीतिवाक्यामृतम् स्त्रियो पर अत्यासक्ति के दोष— न तस्य धनं धर्मः शरीरं वा यस्यास्ति स्त्रीष्वत्यासक्तिः ॥ १२ ॥ स्त्रियों पर अत्यन्त यासक्त पुरुष के धन धर्म और शरीर का क्षय हो जाता है । परस्त्रीगमन के दोष-- विरुद्धकामवृत्तिः समृद्धोऽपि न चिरं नन्दति ॥ १३ ॥ विरुद्ध कामवृत्ति अर्थात् परस्त्री में रत पुरुष समृद्धिशाली होते हुये भी चिरकाल तक समृद्धि का उपभोग नहीं कर पाता । धर्म अर्थ और काम की क्रमिक श्रेष्ठता— धर्मार्थकामानां युगपत्समवाये पूर्वः पूर्वो गरीयान् ॥ १४ ॥ धर्म, अर्थ और काम इन तीनों का कार्य एक साथ प्राप्त होने पर क्रमशः पूर्व-पूर्वं गुरुतर है काम की अपेक्षा अर्थ और अर्थ की अपेक्षा धर्म का सेवन श्रेष्ठ है । समयानुसार अर्थसेवन को प्रधानता-- कालसहत्वे पुनरर्थ एव ॥ १५ ॥ ( धर्मकामयोरर्थमूलत्वात् ) यदि धर्म, अर्थ और काम का कर्त्तव्य एक साथ उपस्थित हो और धर्म तथा काम के कर्त्तव्य का पालन समयान्तर में भी किया जा सकता हो तो अर्थ-कर्त्तव्य को ही प्रधानता देनी चाहिए क्योंकि अर्थ समुद्देश के प्रारम्भ में ही कहा गया है—यतः सर्वं प्रयोजन सिद्धिः सोऽर्थः । द्रव्य होने पर ही धर्म और काम का सुचारु-संपादन हो सकता है । इति कामसमुद्देशः ४. अरिषड्वर्गसमुद्देशः राजाओं के छः आभ्यन्तर शत्रु— अयुक्तितः प्रणीताः काम-क्रोध-लोभ-मद-मान-हर्षाः क्षितीशानामन्त- रङ्गोऽरिषड्वर्गः ॥ १ ॥ युक्ति-पूर्वक प्रयोग न करने पर राजाओं के लिये काम, क्रोध, लोभ, मद मान और हर्ष ये छह भीतरी शत्रुसमूह हैं । कामासक्ति का दोष— परपरिगृहीतासु, अनूढासु च स्त्रीषु दुरभिसन्धिः कामः ॥ २ ॥ दूसरे के द्वारा ग्रहण की गई स्त्री अथवा कुमारी कन्या पर आसक्ति ही काम है ।