नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमन्त्रिसमुद्देशः ४७ स्वामी के द्वारा सुप्रतिष्ठित भेड़ा भी सिंह के समान बली हो जाता है । मन्त्रणा के समय ध्यान देने योग्य बातें— मन्त्रकाले विगृह्य विवादः स्वैरालापश्च न कर्त्तव्यः ॥ ४९ ॥ मन्त्रणा के समय मन्त्रियों को परस्पर झगड़कर विवाद और मनमानी बातचीत न करनी चाहिए । मन्त्रणा के योग्य व्यक्ति— अविरुद्धैरस्वैरैर्विहितो मन्त्रो, लघुनोपायेन महतः कार्यस्य सिद्धि- र्मन्त्रफलम् ॥ ५० ॥ जो परस्पर विरोधी और ईर्ष्या-द्वेष वाले न हों तथा बहुत स्वच्छन्द आचरणवाले न हों उनके साथ परामर्श मन्त्रणा है और लघु साधनों से भी महान् कार्य सिद्धि मन्त्रणा का फल है । न खलु तथा हस्तेनोत्थाप्यते ग्रावा यथा दारुणा ॥ ५१ ॥ पत्थर हाथ से उस प्रकार नहीं उठाया जा सकता जैसा कि लकड़ी के सहारे से । राजा की इच्छा मात्र का अनुसरण करना मन्त्री का दोष है— स मन्त्री शत्रुर्यो नृपेच्छयाऽकार्यमपि कार्यरूपतयाऽनुशास्ति ॥५२॥ वह मन्त्री नहीं शत्रु है जो राजा की इच्छा देखकर अकार्य को भी कार्य बतलाता है । वरं स्वामिनो दुःखं न पुनरकार्योपदेशेन तद्विनाशः ॥ ५३ ॥ इच्छा के विघात से स्वामी को दुःख होना अच्छा है, किन्तु न करने योग्य काम का उपदेश देकर उसका विनाश करना उचित नहीं है । पीयूषमपिबतो बालस्य किं न क्रियते कपोलहननम् ॥ ५४ ॥ अमृत अथवा अमृत के समान हितकारी औषध आदि को पीना न चाहने वाले बच्चे को क्या माता गाल में थप्पड़ लगाकर नहीं पिलाती । मन्त्री की किसी से घनिष्ठता अनुचित है— मन्त्रिणो राजद्वितीयहृदयत्वान्न केनचित् सह संसर्गं कुर्युः ॥ ५५ ॥ मन्त्रिगण राजा के दूसरे हृदय-रूप होते हैं अतः उनको किसी के साथ घनिष्ठ स्नेह आदि नहीं रखना चाहिए । राजा और मन्त्री का एकचित्त होना— राज्ञोऽनुग्रहविग्रहावेव मन्त्रिणामनुग्रहविग्रहौ ॥ ५६ ॥ राजा की ही अनुकूलता और प्रतिकूलता मन्त्रियों की अनुकूलता प्रतिकू- लता है अर्थात् राजा जिस पर कृपा करे अथवा जिससे द्वेष करे मन्त्रियों के लिये भी वे ही ग्राह्य और अग्राह्य होने चाहिएं ।