नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
पृष्ठ 64, कुल 220 में से
संदर्भ में पढ़ें४८ नीतिवाक्यामृतम् राजा के भाग्यदोष का अवसर— म दैवस्यापराधो न मन्त्रिणां यत् सुघटितमपिकार्यं न घटते ॥५७॥ जब मन्त्रियों द्वारा सुविचारित और सुनियोजित कार्य सिद्ध न हो तब उसमें मन्त्रियों का नहीं किन्तु दैव अर्थात् राजा का भाग्य दोष समझना चाहिए। मन्त्री की उपेक्षा का दोष— स खलु को राजा यो मन्त्रिणोऽतिक्रम्य वर्त्तेत ॥ ५८ ॥ वह राजा राजा नहीं है जो मन्त्रियों के परामर्श का उल्लंघन करके व्यवहार करता है। अर्थात् हितैषी मन्त्रियों की बातें न मान कर चलने वाला राजा अपना राज्य खो बैठता है। कार्यसिद्धि के लिये सुविचारित मन्त्रणा की आवश्यकता— सुविवेचिताद् मन्त्राद् भवत्येव कार्यसिद्धियदि स्वामिनो न दुराग्रहः स्यात् ॥ ५६ ॥ राजा यदि हठी नहीं होता तो सुविचारित मन्त्रणा से कार्य सिद्धि अवश्य होती है। राजा के लिये पुरुषार्थ की आवश्यकता— अविक्रमतो राज्यं वणिक् खड्गयष्टिरिव ॥ ६० ॥ राजा यदि पराक्रम का प्रदर्शन नहीं करता तो उस का राज्य बनिये की तलवार के समान है। विशेषार्थ—व्यापारी आदमी तलवार चलाने में कुशल नहीं हो सकता अतः उसके पास तलवार का होना व्यर्थ होता है उसी प्रकार राजा भी यदि कुछ पौरुष न प्रदर्शित करे तो उसका राज्य व्यर्थ है। नीति शास्त्र की उपयोगिता— नीतिर्यथावस्थितमर्थमुपलम्भयति ॥ ६१ ॥ नीति-ज्ञान के द्वारा यथार्थ विषय का अर्थात् कर्त्तव्याकर्त्तव्य का ज्ञान हो जाता है। पुरुषार्थ के लाभ— हिताहितप्राप्तिपरिहारौ पुरुषकारायत्तौ ॥ ६२ ॥ हित की प्राप्ति और अहितकापरित्याग अपने पुरुषार्थ के अधीन है। समय से कार्य करने की आवश्यकता— अकालसहकार्यम् अद्यश्वीनं न कुर्यात् ॥ ६३ ॥ विलम्ब से बिगड़ जाने वाले कार्य में आज कल आज-कल करता हुआ विलम्ब न करे। अर्थात् कार्य समय से ही कर डालने पर ठीक होता है।