भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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पृष्ठ 66

५० नीतिवाक्यामृतम् मन्त्रियों की स्वतन्त्र प्रकृति का दोष — स्वच्छन्दाश्च न विजृम्भन्ते ॥ ७४ ॥ अनेक स्वतन्त्र प्रकृति के मन्त्री परस्पर एकमत नहीं होते । करने योग्य कार्य — यद्बहुगुणमनपायबहुलं भवति तत्कार्यमनुष्ठेयम् ॥ ७५ ॥ ऐसा कार्य करना चाहिए जिसमें गुण बहुत हों और विनाश की सम्भा- वना न हो । दृष्टान्त— तदेव भुज्यते यदेव परिणमति ॥ ७६ ॥ जो वस्तु सुगमता से पच जाने वाली होती है वही खाई जाती है । विशेषार्थ—भोजन के दृष्टान्त से यहां राजा और मनुष्य को कर्त्तव्य का उपदेश दिया गया है कि जिसका परिणाम मङ्गलकारी हो, अपयश आदि न हो वही कार्य करना चाहिए । यथावर्णित गुण के एक दो मन्त्री से भी कार्य निर्वाह— यथोक्तगुणसमवायिन्येकस्मिन् युगले वा मन्त्रिणि न कोऽपि दोषः ॥ ७७ ॥ इस उद्देश्य के पांचवें सूत्र में वर्णित गुण समूह यदि एक या दो मन्त्री में मिलते हों तो ऐसे गुण सम्पन्न एक या दो मन्त्री भी रखने में दोष नहीं है । दृष्टान्त — न हि महानप्यन्धसमवायो रूपमुपलभेत ॥ ७८ ॥ अन्धों का झुण्ड भी रूप ग्रहण करने में समर्थ नहीं होता अर्थात् मन्त्री संख्या में बहुत हों पर मूर्ख हों तो उनसे कोई लाभ नहीं । दृष्टान्त— अवार्यवीर्यौ धुर्यौ किन्न महति भारे नियुज्येते ॥ ७६ ॥ क्या उद्दाम बल वाले दो बैल महान् भारवहन के लिये नहीं नियुक्त होते ? राजा के लिये अनेक सहायकों की आवश्यकता— बहुसहाये राज्ञि प्रसीदन्ति सर्व एव मनोरथाः ॥ ८० ॥ जिस राजा के बहुत से सहायक होते हैं उसके सब मनोरथ सिद्ध होते हैं । उक्त मत का समर्थन — एको हि पुरुषो केषु कार्येष्वात्मानं विभजते ॥ ८१ ॥