भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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मन्त्रिसमुद्देशः ५१ अकेला आदमी कितने कार्यों के लिये अपने को विभाजित कर सकता है ? अर्थात् एक व्यक्ति राज्य के नानाप्रकार के कार्यों की स्वयं देख-भाल नहीं कर सकता अतः सहायकों का होना आवश्यक है । दृष्टान्त— किमेकशाखस्य शाखिनो महती भवतिच्छाया ॥ ८२ ॥ क्या एक शाखा वाले वृक्ष की विशाल छाया होती है । अवसर की अपेक्षा से कार्य करना अनुचित है— कार्यकाले दुर्लभः पुरुषसमुदायः ॥ ८३ ॥ अवसर पड़ने पर अर्थात् आपत्ति आ जाने पर पुरुष समुदाय अर्थात् सहायकों का मिलना दुर्लभ होता है । अतः सहायकों का संग्रह पहले से करना चाहिए । दृष्टान्त— दीप्ते गृहे कीदृशं कूपखननम् ॥ ८४ ॥ घर में आग लग जाने पर कुआं खोदना कहाँ तक उचित है ? धनकी अपेक्षा सहायक संग्रह की उत्तमता— न धनं पुरुषसंग्रहाद् बहु मन्तव्यम् ॥ ८५ ॥ धन को सहायक पुरुषों के संग्रह से अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए । अर्थात् धन बटोरने की अपेक्षा सहायकों का संग्रह अच्छा है । दृष्टान्त द्वारा समर्थन— सत्क्षेत्रे बीजमिव पुरुषेषूप्तं कार्यं शतशः फलति ॥ ८६ ॥ अच्छे खेत में बोये गये बीज से जिस प्रकार बहुत अन्न उत्पन्न होता है उसी प्रकार अच्छे सहायकों में बांटा गया कार्य सुन्दर फल देता है । कार्य पुरुष का लक्षण— बुद्ध्यावर्थे युद्धे च ये सहायास्ते कार्यपुरुषाः ॥ ८७ ॥ बुद्धि अर्थात् सन्मति और सत्परामर्श, धन तथा संग्राम में सहायता देने वाले पुरुष कार्य पुरुष अर्थात् काम के आदमी होते हैं । समर्थन— खादनवेलायां को नाम न सहायः ॥ ८८ ॥ खाने के समय कौन नहीं सहायक होता है । मूर्ख के साथ मन्त्रणा का निषेध— श्राद्ध इवाश्रोत्रियस्य न मन्त्रे मूर्खस्याधिकारोऽस्ति ॥ ८९ ॥ श्राद्ध में जिस प्रकार अश्रोत्रिय ब्राह्मण का अधिकार नहीं है उसी प्रकार मन्त्रणा देने के लिये मूर्ख को भी अधिकार नहीं है ।