भारतकोश
संग्रह पर लौटें

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

मन्त्रिसमुद्देशः ५१ अकेला आदमी कितने कार्यों के लिये अपने को विभाजित कर सकता है ? अर्थात् एक व्यक्ति राज्य के नानाप्रकार के कार्यों की स्वयं देख-भाल नहीं कर सकता अतः सहायकों का होना आवश्यक है । दृष्टान्त— किमेकशाखस्य शाखिनो महती भवतिच्छाया ॥ ८२ ॥ क्या एक शाखा वाले वृक्ष की विशाल छाया होती है । अवसर की अपेक्षा से कार्य करना अनुचित है— कार्यकाले दुर्लभः पुरुषसमुदायः ॥ ८३ ॥ अवसर पड़ने पर अर्थात् आपत्ति आ जाने पर पुरुष समुदाय अर्थात् सहायकों का मिलना दुर्लभ होता है । अतः सहायकों का संग्रह पहले से करना चाहिए । दृष्टान्त— दीप्ते गृहे कीदृशं कूपखननम् ॥ ८४ ॥ घर में आग लग जाने पर कुआं खोदना कहाँ तक उचित है ? धनकी अपेक्षा सहायक संग्रह की उत्तमता— न धनं पुरुषसंग्रहाद् बहु मन्तव्यम् ॥ ८५ ॥ धन को सहायक पुरुषों के संग्रह से अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए । अर्थात् धन बटोरने की अपेक्षा सहायकों का संग्रह अच्छा है । दृष्टान्त द्वारा समर्थन— सत्क्षेत्रे बीजमिव पुरुषेषूप्तं कार्यं शतशः फलति ॥ ८६ ॥ अच्छे खेत में बोये गये बीज से जिस प्रकार बहुत अन्न उत्पन्न होता है उसी प्रकार अच्छे सहायकों में बांटा गया कार्य सुन्दर फल देता है । कार्य पुरुष का लक्षण— बुद्ध्यावर्थे युद्धे च ये सहायास्ते कार्यपुरुषाः ॥ ८७ ॥ बुद्धि अर्थात् सन्मति और सत्परामर्श, धन तथा संग्राम में सहायता देने वाले पुरुष कार्य पुरुष अर्थात् काम के आदमी होते हैं । समर्थन— खादनवेलायां को नाम न सहायः ॥ ८८ ॥ खाने के समय कौन नहीं सहायक होता है । मूर्ख के साथ मन्त्रणा का निषेध— श्राद्ध इवाश्रोत्रियस्य न मन्त्रे मूर्खस्याधिकारोऽस्ति ॥ ८९ ॥ श्राद्ध में जिस प्रकार अश्रोत्रिय ब्राह्मण का अधिकार नहीं है उसी प्रकार मन्त्रणा देने के लिये मूर्ख को भी अधिकार नहीं है ।

५२ नीतिवाक्यामृतम् दृष्टान्त द्वारा समर्थन— किं नामान्धः पश्येत् ॥ ६० ॥ अन्धा क्या देखेगा ? । द्वितीय दृष्टान्त— किमन्धेनाकृष्यमाणोऽन्धः समं पन्थानं प्रतिपद्यते ॥ ६१ ॥ क्या अन्धे के सहारे चलता हुआ अन्धा सम-मार्ग को पा सकता है ? समर्थन— तदन्धवर्त्तकीयं काकतालीयं वा यन्मूर्खमन्त्रात् कार्यसिद्धिः ॥ ६२ ॥ मूर्ख पुरुष की मन्त्रणा से कभी-कभी कार्य का सिद्ध हो जाना संयोग वश अन्धे के हाथ बटेर आ जाने के तथा स्वयं गिरते हुए ताड़ के फल पर अक- स्मात् कौवे के बैठ जाने के समान है । समर्थन-- स घुणाक्षरन्यायो यन्मूर्खेषु मन्त्रपरिज्ञानम् ॥ ६३ ॥ मूर्ख को मन्त्रणा का ज्ञान घुणाक्षरन्याय के समान है। लकड़ी का कीड़ा 'घुन' स्वेच्छा से लकड़ी खाता है उसमें कभी संयोग-वश किसी अक्षर की आकृति बन जाना जैसे सार्वकालिक या घुन की स्वाभाविक कला नहीं होती उसी प्रकार संयोग वश कभी ही मूर्ख अच्छी सलाह दे सकता है । मन्त्रणा के लिये शास्त्र ज्ञान की आवश्यकता— अनालोकं लोचनमिवाशास्त्रं मनः कियत् पश्येत् ॥ ६४ ॥ बिना ज्योति के नेत्र के समान शास्त्र ज्ञान से शून्य मन कितना विचार कर सकता है । सेवक के लिये स्वामी की प्रसन्नता ही मुख्य है— स्वामिप्रसादः सम्पदं जनयति न पुनराभिजात्यं पाण्डित्यं वा ॥ ६५ ॥ । स्वामी की कृपा से सम्पत्ति प्राप्त होती है कुलीनता और पाण्डित्य से नहीं । यथार्थ का गौरव अक्षुण्ण रहता है— । हरकण्ठलग्नोऽपि कालकूटः काल एव ॥ ६६ ॥ शङ्कर जी के गले में भी लगा हुआ कालकूट विष सर्वसाधारण के लिये मारक विष ही है । मूर्ख व्यक्ति पर राज्य-भार की निन्दा— स्ववधाय कृत्योत्थापनमिव मूर्खेषु राज्यभारारोपणम् ॥ ६७ ॥ मूर्ख पुरुष को राज्य भार सौंपना अपने ही वध के लिए 'कृत्या' उत्पन्न करने के समान है ।

मन्त्रिसमुद्देशः ५३ कृत्या—अपने शत्रु का विनाश करने के लिये यज्ञानुष्ठान के द्वारा शक्ति विशेष या पुरुष विशेष को प्राप्त करना 'कृत्या' उत्पन्न करना कहा जाता है। अविवेकी का शास्त्रज्ञान व्यर्थ है— अकार्यवेदिनः किं बहुना शास्त्रेण ॥ ९८ ॥ कर्त्तव्य कर्म को न जानने वाले का अनेक शास्त्रों का ज्ञान व्यर्थ है। गुणहीन व्यक्ति की निन्दा— गुणहीनं धनुः पिंजनादपि कष्टम् ॥ ९९ ॥ प्रत्यञ्चाहीन धनुष पिंजन अर्थात् रुई धुनने की 'धुनकी' से भी अधिक कष्टदायक होता है। धुनकी से तो कम से कम रुई तो साफ हो जाती है। पर बिना डोर का धनुष क्या काम देगा ? मन्त्री के गौरव का कारण— चक्षुष इव मन्त्रिणोऽपि यथार्थदर्शनमेवात्मगौरवहेतुः ॥ १०० ॥ जिस प्रकार आंख की प्रशंसा उसकी सूक्ष्मदर्शी ज्योति के कारण होती है उसी प्रकार मन्त्री का राजनीति का यथार्थ ज्ञान ही उसको गौरव प्रदान करता है । शस्त्र और मन्त्र का अधिकार भिन्न-भिन्न है— शस्त्राधिकारिणो न मन्त्राधिकारिणः स्युः ॥ १०१ ॥ शस्त्र के अधिकारी अर्थात् क्षत्रिय अथवा शस्त्रोपजीवियों को मन्त्रणा देने का अधिकार नहीं देना चाहिए। क्षत्रिय का स्वभाव— क्षत्रियस्य परिहरतोऽप्यायात्युपरि भण्डनम् ॥ १०२ ॥ क्षत्रिय बचाते बचाते हुए भी लड़ बैठता है। शस्त्रोपजीविनां कलहमन्तरेण भक्तमपि भुक्तं न जीर्यति ॥ १०३ ॥ शस्त्रोपजीवी अर्थात् क्षत्रियों को लड़ाई किये बिना खाया हुआ भात अर्थात् सूक्ष्म भोजन भी नहीं पचता । मनुष्य के गर्व के हेतु— मन्त्राधिकारः, स्वामिप्रसादः शस्त्रोपजीवनं चेत्येकैकमपि पुरुषमुत्से- कयति किं पुनर्न समुदायः ॥ १०४ ॥ जब कि मन्त्रिपद, राजा की कृपा और शस्त्र से आजीविका इन तीनों में से एक एक वस्तु भी पुरुष को मदमत्त करने में समर्थ होती है तो क्या इन तीनों का एकत्र होना उसे मदमत्त नहीं करेगा ? अधिकारी होने के अयोग्य व्यक्ति— न लम्पटोऽधिकारी ॥ १०५ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

५४ नीतिवाक्यामृतम् स्त्री, धनादि का लोभी पुरुष अधिकारी बनने योग्य नहीं है। अर्थ लोभी मन्त्री के दोष— मन्त्रिणोऽर्थग्रहणलालसायां मतौ न राजकार्यमर्थोवा ॥ १०६ ॥ जब मन्त्री को धन की स्पृहा हो जाती है तब न तो राजा की कार्य सिद्धि होती है न धन होता है। उदाहरण द्वारा उक्तनीति का समर्थन— वरणार्थं प्रेषित एव यदि कन्यां परिणयति तदा वरयितुस्तप एव शरणम् ॥ १०७ ॥ किसी के विवाहार्थ कन्या को देखने के लिये भेजा गया व्यक्ति ही जब उस कन्या से विवाह कर ले तो वर के लिये तप ही शरण है। प्रसङ्गानुसार आशय है कि यदि मन्त्री स्वयं ही अधिकार और धन-लोलुप हो जाय तो राजा क्या करेगा ? दृष्टान्त— स्थाल्येव भक्तं चेद् स्वयमश्नाति कुतो भोक्तुर्भुक्तिः ॥ १०८ ॥ बटलोई ही अगर भात को स्वयं खाने लगेगी तो भोजन करने वाले को किस प्रकार भोजन मिल सकेगा ? मानवीय शुचिता की सीमा— तावत् सर्वोऽपि शुचिर्निः स्पृहोयावन्न परस्त्रीदर्शनमर्थागमोवा ॥१०९॥ तब तक सभी मनुष्य शुद्ध और निःस्पृह होते है जब तक उनको परस्त्री दर्शन और धनागम नहीं होता है। निर्दोष को दोषी सिद्ध करने से, हानि — अदुष्टस्य हि दूषणं सुप्तव्यालप्रबोधनमिव ॥ ११० ॥ निर्दोष को दोषी बनाना सोए हुए सर्प को जगाने के समान है। एक बार फटा मन फिर नहीं जुड़ता— सकृद्विघटितं चेतः स्फटिकवलयमिव कः सन्धातुमीश्वरः ॥१११॥ एक बार फटे हुए मन को स्फटिक के कङ्कन के समान कौन दुबारा जोड़ सकता है। मेल की अपेक्षा बैर सहज होता है— न महतांप्युपकारेण चित्तस्य तथानुरागो यथा विरागो भवत्यल्पेना- प्यपकारेण ॥ ११२ ॥ बहुत बड़े उपकार के कार्य से भी चित्त में उतना अनुराग नहीं उत्पन्न होता जितना कि थोड़े से भी अपकार से विराग होता है।

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri मन्त्रिसमुद्देशः ५५ क्षति प्राप्त पुरुष की प्रतिक्रिया— सूचीमुखसर्पवन्नानपकृत्य विरमन्त्यपराद्धाः ॥ १ ॥ जिन के प्रति कोई अपकार या अपराध किया गया हो ऐसे व्यक्ति 'सूची मुख' जाति के सर्प के समान बिना हानि पहुँचाए विश्राम नहीं लेते । अतिकामी के दोष— अतिवृद्धः कामस्तन्नास्ति यन्न करोति ॥ ११४ ॥ अत्यधिक कामी पुरुष ऐसा कोई अकार्य नहीं है जो वह न करे । दृष्टान्त — श्रूयते किल हि कामपरवशः प्रजापतिरात्मदुहितरि, हरिर्गोपवधुषु, हरः शान्तनुकलत्रेषु, सुरपतिर्गौतमभार्यायां चन्द्रश्च वृहस्पतिपत्न्यां मनश्चकारेति ॥ ११५ ॥ पुराणादि की कथा में सुना जाता है कि कामातुर ब्रह्मा अपनी कन्या पर, कृष्ण गोपों की स्त्रियों पर, महादेव शान्तनु की स्त्री गङ्गा पर इन्द्र गौतम ऋषि की पत्नी अहल्यापर और चन्द्रमा वृहस्पति की पत्नी तारा पर कामासक्त हुए । धन की स्पृहा स्वाभाविक है— अर्थेषूपभोगरहितास्तरवोऽपि साभिलाषाः किंपुनर्मनुष्याः ॥ ११६ ॥ फल पुष्पादि का स्वयम् उपभोग न करने वाले वृक्ष भी जब फल पुष्परूप अर्थ के इच्छुक होते हैं तो फिर मनुष्यों का क्या कहना है । वह तो अर्थ का स्वयम् उपभोग करता है उसे तो धन की स्पृहा होगी ही । धन प्राप्ति से लोभ वृद्धि— कस्य न धनलाभाल्लोभः प्रवर्तते ॥ ११७ ॥ धन का लाभ होने लगने पर किसे लोभ नहीं होता ? प्रत्यक्ष देवता का स्वरूप— स खलु प्रत्यक्षं दैवं यस्य परस्वेष्विवपरस्त्रीषु निःस्पृहं चेतः ॥११८॥ निश्चय ही वह प्रत्यक्ष देवता है जिसकी पराये धन के समान ही परस्त्री में स्पृहा नहीं होती । आय-व्यय में विवेक की आवश्यकता— समायव्ययः कार्यारम्भो राभसिकानाम् ॥ ११६ ॥ बिना विवेक के तुरन्त कार्य अथवा व्यापार अर्थात् जल्दबाजी में काम करने वाले को काम का लाभ नहीं होता । लाभ हानि बराबर हो जाता है । महामूर्खता के लक्षण— बहुक्लेशोनाल्पफलः कार्यारम्भो महामूर्खाणाम् ॥ १२० ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

५६ नीतिवाक्यामृतम् जो महामूर्ख होते हैं वे ही बहुत क्लेश साध्य किन्तु स्वल्प फल वाले कार्य आरम्भ करते हैं । कापुरुष का लक्षण— दोषभयान्न कार्यारम्भः कापुरुषाणाम् ॥ १२१ ॥ दोष के भय से कार्य न करना कापुरुष का लक्षण है । दृष्टान्त— मृगाः सन्तीति किं कृषिर्न क्रियते ॥ १२२ ॥ अजीर्णभयात् किं भोजनं परित्यज्यते ॥ १२३ ॥ मृग हैं इसलिए क्या कोई खेती नहीं करता । और अजीर्ण के भय से क्या कोई भोजन छोड़ देता है ? विघ्नों की अनिवार्यता— स खलु कोऽपीहाभूदस्ति भविष्यति वा यस्य कार्यारम्भेषु प्रत्यवाया न भवन्ति ॥ १२४ ॥ इस संसार में क्या कोई ऐसा भी है या होगा जिसके कार्य में विघ्न न होते हों । दुष्टात्मा की कार्य पद्धति— आत्मसंशयेन कार्यारम्भो व्यालहृदयानाम् ॥ १२५ ॥ अपने प्राणों को संशय में डालकर कार्य प्रारम्भ करना दुष्टात्माओं का कार्य है । महापुरुष की पहिचान— दूरभीरुत्वमासन्नशूरत्वं ( रिपुं प्रति ) महापुरुषाणाम् ॥ १२६ ॥ महापुरुष लोग शत्रु जब तक दूर रहता है तब तक तो उससे डरते हैं किन्तु जब वह आक्रमण कर समीप आ जाता है तब अपनी शूरता का प्रदर्शन करते हैं । मृदुता के गुण— जलवन्मार्दवोपेतः पृथूनपि भूभृतो भिनत्ति ॥ १२७ ॥ जिस प्रकार कोमल जल प्रवाह बड़े-बड़े पर्वतों को भी फोड़ कर गिरा देता है उसी प्रकार मृदुतायुक्त राजा भी बड़े-बड़े राजाओं का विनाश कर देता है । प्रियवादिता के लाभ— प्रियम्बदः शिखीव सदर्पानपि द्विषत्सर्पानुत्सादयति ॥ १२८ ॥ प्रिय वाणी वाला मयूर जिस प्रकार दर्प युक्त सर्पों को नष्ट कर देता है उसी प्रकार प्रियवक्ता राजा भी सदर्प शत्रुओं का विनाश कर देता है ।

मन्त्रिसमुद्देशः ५७ महापुरुष का स्वभाव— नाविज्ञाय परेषामर्थमनर्थं वा स्वहृदयं प्रकाशयन्ति महानुभावाः ॥ दूसरों का सदाशय और दुराशय जाने बिना महापुरुष अपने मन की बात नहीं प्रकट करते। महान् व्यक्ति से सम्भाषण का लाभ— क्षीरवृक्षवत् फलसम्पादनमेव महतामालापः ॥ १३० ॥ महापुरुषों का सम्भाषण दूधवाले वृक्ष की तरह फल सम्पादन करता है। विशेषार्थ—जिस प्रकार पत्ता या छाल निकालने पर जिनमें दूध निकल आता है ऐसे वृक्ष मीठा फल देते हैं उसी प्रकार महापुरुषों की बातचीत से भी अच्छा परिणाम निकलता है। नीच को वश में लाने का उपाय— दुरारोहपादप इव दण्डाभियोगेन फलप्रदो भवति नीचप्रकृतिः ॥ कांटे या ऊँचाई के कारण न चढ़े जा सकने योग्य वृक्षों का फल जैसे दण्ड से पीटने पर ही गिरता है उसी प्रकार नीच प्रकृति के पुरुष भी दण्डदान से ही फलीभूत या वशीभूत होते हैं। महान् पुरुष का लक्षण— स महान् यो विपत्सु धैर्यमवलम्बते ॥ १३२ ॥ महान् वही है जो विपत्ति में धैर्य धारण करे। आकुलता दोष है— उत्तापकत्वं हि सर्वकार्येषु सिद्धीनां प्रथमोऽन्तरायः ॥ १३३ ॥ आकुल हो उठना समस्त कार्यों की सिद्धि के निमित्त प्राथमिक या प्रार- म्भिक विघ्न है। कुलीन का लक्षण— शरद्घना इव न खलु वृथालापं गलगर्जितं वा कुर्वन्ति सत्कुल- जाताः ॥ १३४ ॥ उत्तम कुल में उत्पन्न व्यक्ति शरत्कालीन मेघ की गर्जना के समान व्यर्थ आलाप नहीं करते। सुन्दर-असुन्दर का भेद— न स्वभावेन किमपि वस्तु सुन्दरमसुन्दरं वा, किन्तु यदेव यस्य प्रकृतितो भाति तदेव तस्य सुन्दरम् ॥ १३५ ॥ स्वभाव से ही कोई वस्तु सुन्दर या असुन्दर नहीं होती किन्तु जिसकी प्रकृति से जिसका मेल बैठता है अथवा जिस किसी को स्वभाव से ही जो वस्तु अच्छी लगती है वही उसके लिये सुन्दर होती है।

५८ नीतिवाक्यामृतम् दृष्टान्त-- न तथा कर्पूररेणुना प्रीतिः केतकीनां यथाऽमेध्येन ॥ १२६ ॥ केतकी के वृक्ष को कपूंर की रज से वह प्रसन्नता नही होती जितनी अमेध्य वस्तु गोबर आदि की खाद से । केतकी का वृक्ष कपूर का चूरा डालने से नहीं किन्तु खाद डालने से बढ़ता हैं । अधिक क्रोध से प्रभुता की हानि— अतिक्रोधनस्य प्रभुत्त्वमग्नौ पतितं लवणमिव शतधा विशीर्यते ॥ जो पुरुष अत्यन्त क्रोधी होता है उसकी प्रभुता अग्नि में पतित लवण खण्ड अर्थात् नमक के टुकड़े की भांति सौ-सौ टुकड़े हो जाती है । अर्थात् खण्डित होकर नष्ट हो जाती है । गुणों के नष्ट होने का कारण— सर्वान् गुणान् निहन्त्यनुचितज्ञः ॥ १३८ ॥ उचित अनुचित का ज्ञान न रखनेवाला व्यक्ति अपने समस्त गुणों को नष्ट कर देता है । जिसे भले बुरे का ज्ञान न रहा वह गुणशाली होते हुए भी निर्गुण है । गुप्त रहस्य दूसरों से न कहना चाहिए— परस्य मर्मकथनम् आत्मविक्रय एव ॥ १३६ ॥ दूसरे को अपना गुप्त भेद बता देना उसके हाथ अपने को बेच देना ही है । क्योंकि तब उस व्यक्ति से यह डर सदा बना रहेगा कि कहीं यह व्यक्ति मेरा भेद न खोल दे और मैं विपत्ति में पड़ जाऊं इस प्रकार उसकी सदा अनुनय-विनय ही करनी पड़ेगी । शत्रु पर विश्वास घातक है— तदजाकृपाणीयं यः परेषु विश्वासः ॥ १४० ॥ शत्रु पर विश्वास करना 'अजाकृपाणीय' है बकरी बकरे का मांस खाने वालों का खड्ग कब बकरी या बकरे पर गिरेगा जैसे यह निश्चय नहीं उसी प्रकार विश्वस्त शत्रु कब वध कर देगा यह निश्चय नहीं कहा जा सकता । अतः शत्रु पर विश्वास उचित नहीं । चञ्चलता से हानि— क्षणिकचित्तः किंचिदपि न साधयति ॥ १४१ ॥ चञ्चल चित्त वाला व्यक्ति कोई भी काम पूरा नहीं करता । राजा की स्वेच्छाचारिता का दोष— स्वतन्त्रः सहसाकारित्वात् सर्वं विनाशयति ॥ १४२ ॥

मन्त्रिसमुद्देशः ५६ स्वतन्त्र व्यक्ति, प्रसङ्गानुसार, मन्त्रियों से परामर्श न लेकर एकाएक कार्य करने वाला राजा अपना सर्वनाश कर बैठता है । आलसी की अयोग्यता— अलसः सर्वकर्मणामनधिकारी ॥ १४३ ॥ आलसी व्यक्ति समस्त प्रकार के कार्यों के अयोग्य होता है । प्रमाद का दोष— प्रमादवान् भवत्यवश्यं विर्द्विषां वशः ॥ १४४ ॥ प्रमादी अर्थात् असावधान रहने वाला निश्चय ही शत्रु के वश में आ जाता है । अनुकूल को प्रतिकूल न करने का उपदेश— कमप्यात्मनोऽनुकूलं प्रतिकूलं न कुर्यात् ॥ १४५ ॥ जो व्यक्ति अपने अनुकूल रहता हो या हो ऐसे किसी एक भी व्यक्ति को प्रतिकूल न होने दे । गुप्त भेद की रक्षा की आवश्यकता— प्राणादपि प्रत्यवायो रक्षितव्यः ॥ १४६ ॥ प्राण से भी अधिक गुप्त भेद की रक्षा करनी चाहिये । गुप्त बात का फूटना तरह-तरह के विघ्न उत्पन्न करता है अतः यहां विघ्न- वाचक प्रत्यवाय शब्द का 'गुप्त रहस्य' अर्थ करना उचित है । अपनी शक्ति समझने की आवश्यकता— आत्मशक्तिमजानतो विग्रहः क्षयकाले कीटिकानां पक्षोत्थान- मिव ॥ १४७ ॥ अपनी शक्ति का अनुमान न करके बैर ठान लेना मरते समय चींटियों और फतिङ्गों को पर निकलने के समान है । शत्रु से सद्व्यवहार की अवधि— कालमलभमानोऽपकर्त्तरि साधु वर्त्तेत ॥ १४८ ॥ अपने अनुकूल समय न पाकर मनुष्य को अपने अपकारी अथवा शत्रु के प्रति सद्व्यवहार करते रहना चाहिए । दृष्टान्त— किन्नु खलु लोको न वहति मूर्ध्ना दग्धुमिन्धनम् ॥ १४६ ॥ जलाने वाली लकड़ी को क्या लोग शिर पर नहीं ढोते ? दृष्टान्त— नदीरयस्तरूणामङ्घ्रीन् क्षालयन्नप्युन्मूलयति ॥ १५० ॥

६० नीतिवाक्यामृतम् नदी का वेग वृक्षों की जड़ को जो उसके चरण के समान हैं—धोते-धोते भी उखाड़ देता हैं जिससे पेड़ गिर जाता है । इसी प्रकार अत्यन्त मृदु व्यवहार करते हुए भी शत्रु का उन्मूलन किया जा सकता है । उत्सेको हस्तगतमपि कार्यं विनाशयति ॥ १५१ ॥ उत्सेक अर्थात् अपनी शक्ति का मद सिद्ध होते हुए भी काम को बिगाड़ देता है । उपायज्ञ की प्रशंसा— नाल्पं महद्वापद्येतोपायज्ञस्य ॥ १५२ ॥ शत्रु नाश के विविध उपायों को जानने वाले के लिये छोटा बड़ा किसी प्रकार का उपद्रव या विघ्न नहीं होता अर्थात् छोटा बड़ा कैसा भी शत्रु नहीं ठहर सकता । दृष्टान्त— नदीपूरः सममेवोन्मूलयति तीरजतृणाङ्घ्रिपान् ॥ १५३ ॥ नदी का प्रवाह किनारे के तृणों अर्थात् छोटी मोटी घासों और बड़े-बड़े वृक्षों को समान रूप से विनष्ट कर देता है । युक्त वचन को ग्रहण करना कर्तव्य है— युक्तमुक्तं वचो बालादपि गृह्णीयात् ॥ १५४ ॥ बच्चों की भी बात युक्तियुक्त हो तो मान लेनी चाहिए । दृष्टान्त— रवेरविषये किं न दीपः प्रकाशयति ॥ १५५ ॥ जहां सूर्य का प्रकाश नहीं पहुंचता क्या वहां दीपक अपना प्रकाश नहीं करता ? दृष्टान्त— अल्पमपि वातायनविवरं बह्वनुपलम्भयति ॥ १५६ ॥ छोटा सा भी झरोखा या रोशनदान बहुत सी चीजों को प्रकाश में ला देता है । अर्थात् जिस प्रकार किसी अन्धकार पूर्ण स्थान में बनाया गया छोटा सा भी झरोखा बहुत सी चीजों को प्रकाशित कर देता है उसी प्रकार बालक की भी बहुधा नीति पूर्ण और युक्तियुक्त बात अनेक समस्याओं का समाधान कर सकती है । व्यर्थ बोलने का दोष— पतिंवरा इव परार्थाः खलु वाचः, ताश्च निरर्थकं प्रकाश्यमानाः शप- न्त्यवश्यं जनयितारम् ॥ १५७ ॥

मन्त्रिसमुद्देशः ६१ कन्या के समान वाणी भी पराया धन है—दूसरों के लिये है—उसे यदि निरर्थक प्रकाशित किया जाता है—व्यर्थ वचन बोला जाता है—तो जिस प्रकार निरर्थक अर्थात् निर्धन अथवा अकर्मण्य या नपुंसक को दी गई कन्या पिता को श्राप देती है उसी प्रकार बिना प्रयोजन की वाणी वक्ता को श्राप देती है । व्यर्थ का वचन नहीं बोलना चाहिए । मूर्ख के समक्ष हितोपदेश अनावश्यक— तत्र युक्तमप्युक्तमयुक्तसमं यत्र न विशेषज्ञः ॥ १५८ ॥ जहां जिस बात के विशेष जानकार न हों वहां कही गई ठीक बात भी अयुक्त—अनुचित लगती है । स खलु पिशाचकी वातकी वा यः परेऽनर्थिनि वाचमुदीरयति ॥१५६॥ उस वक्ता को भूत लगा हुआ अथवा वातव्याधि से युक्त समझना चाहिए जो न सुनने वाले को अपनी बात सुनाता है । इन दो सूत्रों का आशय है कि मूर्ख या हठी को उपदेश न दे । विष्वायतः प्रदीपस्येव नयहीनस्य वृद्धिः ॥ १६० ॥ नीति के अनुसार न चलने वाले की श्री वृद्धि बुझते हुए दीपक की लौ के समान है । जिस प्रकार बुझते समय दीपक एक बार तेज प्रकाश कर शीघ्र बुझ जाता है उसी प्रकार नीति का पालन न करने वाले की बढ़ती कुछ ही दिनों में समाप्त हो जाती है । कृतघ्न सेवक की दशा— जीवोत्सर्गः स्वामिपदमभिलषतामेव ॥ १६१ ॥ जो सेवक अपने स्वामी के ही पद की कामना करने लगे उसे प्राणत्याग करना पड़ता है । दुष्टों के प्रति नीति— बहुदोषेषु क्षणदुःखप्रदोपायोऽनुग्रह एव ॥ १६२ ॥ बहुत दोष वाले व्यक्तियों को क्षण भरके लिये दुःखप्रद अर्थात् मृत्युदण्ड आदि राजा के लिये अनुग्रह ही है अतः इससे कण्टक दूर होकर राज्य वृद्धि होगी । कृत्या का लक्षण— स्वामिदोषस्वदोषाभ्यामुपहृतवृत्तयः क्रुद्ध-लुब्ध-भीतावमानिताः कृत्याः ॥ १६३ ॥ स्वामी के अथवा अपने दोषों के कारण जिन की वृद्धि--जीविका के साधन--नष्ट हो गये हैं ऐसे क्रोधी लोभी, भयभीत और अपमानित व्यक्ति

६२ नीतिवाक्यामृतम् कृत्या--यज्ञ अनुष्ठान आदि के विधिवत् सम्पन्न न होने से उस के द्वारा उत्पन्न, कर्त्ता के लिये ही घातक व्यक्ति या विनाशकारी वायु-के समान हैं ! कृत्या को वश में करने का उपाय— अनुवृत्तिरभयं त्यागः सत्कृतिश्च कृत्यानां वशोपायाः ॥ १६४ ॥ इन उपर्युक्त प्रकार की कृत्याओं को वश में करने के उपाय हैं—उनकी इच्छानुसार कार्य कर देना, उनको अभय दान देना, अर्थदान देना, पुनः उनका सत्कार करना अर्थात् नौकरी आदि दे देना । राजा की सामान्यनीति— क्षयलोभविरागकारणानि प्रकृतीनां न कुर्यात् ॥ १६५ ॥ राजा को चाहिए कि वह अपनी प्रकृति मन्त्री सेनापति आदि अथवा साधारण प्रजा के विनाश, लोभ और वैराग्य का हेतु न बने अर्थात् प्रजा में इन बातों को न पैदा होने दे । प्रजा के असन्तोष की महत्ता— सर्वकोपेभ्यः प्रकृतिकोपो गरीयान् ॥ १६६ ॥ प्रकृति प्रजा अथवा अमात्यादि का कोप सब कोपों से बढ़कर है । दुष्टों के योग्य कार्य— अचिकित्स्य-दोषदुष्टान् खनिदुर्गसेतुबन्धाकरकर्मान्तेरेषु क्लेश- येत् ॥ १६७ ॥ जिनके दोष किसी प्रकार दूर ही न किये जा सकते हों ऐसे दुष्टों को खाई, किला, पुल बाँध आदि के कार्यों में लगाकर पीडित करे । गोष्ठी के अयोग्य व्यक्ति— अपराध्यैरपराधकैश्च सह गोष्ठीं न कुर्यात् ॥ १६८ ॥ अपराधी और अपराध करानेवालों के साथ उठना-बैठना आदि छोड़ दे । दृष्टान्त— ते हि गृहप्रविष्टसर्पवत् सर्वव्यसनानामागमनद्वारम् ॥ १६६ ॥ ऐसे व्यक्ति घर में प्रविष्ट सर्प की भांति समस्त प्रकार के दुःखों के लिये आगमन-द्वार होते हैं । किसके आगे न आवे— न कस्यापि क्रुद्धस्य पुरतस्तिष्ठेत् ॥ १७० ॥ किसी भी क्रोधी के सामने न आवे ।

मन्त्रिसमुद्देशः ६३ दृष्टान्त— क्रुद्धो हि सर्प इव यमेवाग्रे पश्यति तत्रैव दोषविषमुत्सृजति ॥१७१॥ क्रोधी व्यक्ति सर्प के समान होता है वह जिसे ही आगे पाता है उसी पर अपना क्रोधरूपी विष उगलता है । कार्य के समय योग्य व्यक्ति का ही आगमन श्रेयस्कर है— अप्रतिविधातुरागमानाद् वरमनागमनम् ॥ १७२ ॥ जो किसी बात का प्रतीकार न कर सके अर्थात् आई हुई आपत्ति आदि को दूर न कर सके ऐसे आदमी का न आना ही आने से अच्छा है। क्योंकि ऐसा आदमी कुछ काम तो आवेगा नहीं और व्यर्थ समय नष्ट करेगा । [ इति मन्त्रिसमुद्देशः ] ११. पुरोहितसमुद्देशः राजपुरोहित के गुण— पुरोहितमुदितोदितकुलशीलं षडंगवेदे, दैवे, निमित्ते, दण्डनीत्यां च प्रवीणमथर्वज्ञमतिविनीतमभिनीतम् , आपदां दैवीनां मानुषीणाञ्च प्रतिक- र्त्तारं कुर्वीत ॥ १ ॥ राजा अपना पुरोहित ऐसा चुने जिसमें निम्न गुण हों । प्रख्यातवंश और शील-स्वभाव वाला, शिक्षा, व्याकरण आदि षडङ्ग युक्त वेद में निष्णात, दैवी तथा ग्रहादि के कारण उत्पन्न होनेवाले उत्पात दूर करने में निपुण, शासन में प्रवीण अथर्ववेद में उक्त अभिचार और शान्तिकर्म का ज्ञाता, अत्यन्त विनययुक्त और सुसंस्कृत अथवा मैत्रीपूर्ण, दैवी और मानुषी आप- त्तियों को दूर करने वाला । राजा के लिये मन्त्री और पुरोहित की महत्ता— राज्ञो हि मन्त्रिपुरोहितौ मातापितरौ, अतस्तौ न केषुचिद् वाञ्छि- तेषु विसूरयेत् , दुःखयेद्दुर्वि नयेद् वा ॥ २ ॥ राजा के लिये मन्त्री और पुरोहित माता और पिता के समान हैं अतः उनको किसी भी अभिलषित वस्तु के लिये दुःखित अथवा तिरस्कृत न करे । आपत्तियों की गणना— अमानुषोऽग्निः, अवर्षम् , अतिवर्षम् , मारको, दुर्भिक्षम् सस्योप- पघातः, जन्तूसर्गा, व्याधि-भूत-पिशाच-शाकिनी-सर्प-व्याल-मूपक क्षोभ- श्चेत्यापदः ॥ ३ ॥

६४ नीतिवाक्यामृतम् आपत्तियां निम्न प्रकार की हैं—बिजली गिरने से अथवा उल्कापात से अग्नि लग जाना, वर्षा का न होना, अतिवृष्टि का होना, महामारी, हैजा, प्लेग आदि का फैलना, अकाल पड़ना, पौधों में कीड़ों का लगना, टिड्डी दल आदि का आना, रोग, भूत-पिशाच, डाकिनी शाकिनी अर्थात् चुड़ैल आदि सर्प ओर अन्य हिंसक जन्तु तथा चूहों आदि का उपद्रव। राजकुमारों की शिक्षा के विषय— शिक्षालापक्रियाक्षमो राजपुत्रः सर्वासु लिपिषु, प्रसंख्याने पद-प्रमाण- प्रयोगकर्मणि नीत्यागमेषु, रत्नपरीक्षायां सम्भोगप्रहरणोपवाह्यविद्यासु च साधु विनेतव्यः ॥ ४ ॥ राजा को चाहिए कि जब राजकुमार शिक्षा ग्रहण करने योग्य, बातचीत के योग्य और काम-काज करने योग्य हो जाय तब उसे सब प्रकार की लिपियों में, गणित में, व्याकरण और न्याय शास्त्र के व्यावहारिक प्रयोग में नीति- शास्त्रों में, रत्न परीक्षा में, काम शास्त्र, संग्राम विद्या और तरह तरह की सवारियों की विद्या में भली प्रकार सुशिक्षित बनावे। गुरुसेवा— अस्वातन्त्र्यमुक्तकारित्वं, नियमो विनीतता च गुरूपवासनकार- णानि ॥ ५ ॥ स्वच्छन्द न होना, गुरु की आज्ञाओं का पालन करना, नियमपूर्वक रहना और विनीत होना, ये सब गुण गुरु की उपासना के कारण हैं। विनय का स्वरूप— व्रतविद्यावयोऽधिकेषु नीचैराचरणं विनयः ॥ ६ ॥ किसी व्रत विशेष के पालन से, ज्ञान से और अवस्था से जो अपने से उत्कृष्ट हों उनके आगे अत्यन्त विनम्र-व्यवहार करना विनय है। विनय का फल— पुण्यावाप्तिः, शास्त्ररहस्यपरिज्ञानं, सत्पुरुषाधिगम्यत्वं च विनय- फलम् ॥ ७ ॥ पुण्य की प्राप्ति, शास्त्र के गूढ रहस्य का ज्ञान और सत्पुरुषों के साथ समागम यह सब विनय के फल हैं। विनय से ये चीजें अनायास प्राप्त होती हैं। परम्परागत ज्ञान की आवश्यकता— अभ्यासः कर्मसु कौशलमुत्पादयत्येव यद्यस्ति तज्ज्ञेभ्यः सम्प्र- दायः ॥ ८ ॥ कोई भी काम यदि उसके जानने वालों से परम्परागत प्राप्त होता है और

२. समुद्देश ११-२०: मन्त्रि, पुरोहित, सेनापति, दूत, चार (गुप्तचर), प्रमाद व व्यसन-दोष

पुरोहितसमुद्देशः ६५ उसका अभ्यास किया जाता है तो उस कर्म में कुशलता अवश्य प्राप्त होती है । गुरु की आज्ञा का पालन— गुरुवचनमनुल्लङ्घनीयमन्यत्राधर्मानुचिताचारात्मप्रत्यवायेभ्यः ॥ ९ ॥ जो धर्मानुकूल हों, उचित आचरण के प्रतिकूल न हों तथा जिनसे आत्म- कल्याण होता हो ऐसे गुरुवचनों का उल्लङ्घन नहीं करना चाहिए ! गुरु की विशेषता— युक्तमयुक्तं वा गुरुरेव जानाति यदि न शिष्यः प्रत्यर्थवादी ॥ १० ॥ यदि शिष्य गुरु के प्रतिकूल बोलने वाला नहीं है तो उसके लिये उचित और अनुचित कर्त्तव्यों को गुरु ही जानता है । क्रोधित गुरुजनों के प्रति कर्त्तव्य— गुरुजनरोपेऽनुत्तरदानमभ्युपपत्तिश्चौषधम् ॥ ११ ॥ गुरु लोग जब कुपित हों तब उत्तर न देना और सेवा करना ही उस क्रोध की शान्ति के लिये औषध है । गुरु के प्रति कर्त्तव्यों का निर्देश— शत्रूणामभिमुखः पुरुषः श्लाघ्यो न पुनर्गुरूणाम् ॥ १२ ॥ पुरुष वह प्रशंसनीय है जो शत्रुओं से मोर्चा ले न कि गुरुओं से । आराध्यं न प्रकोपयेद् यद्यसावाश्रितेषु कल्याणशंसी ॥ १३ ॥ यदि आराध्य गुरु अपने आश्रितों के सदा कल्याणकामी हों तो उनको कुपित नहीं करना चाहिए । गुरुभिरुक्तं नातिक्रमितव्यं यदि नेहिकामुत्रिकफलविलोपः ॥ १४ ॥ यदि इहलोक और परलोक की फलप्राप्ति में बाधा न पड़ती हो तो गुरुओं के वचन का उल्लङ्घन नहीं करना चाहिए । सन्दिहानो गुरुम् अकोपयन्नापृच्छेत् ॥ १५ ॥ पढ़ते समय किसी बात में संशय होने पर गुरुजी क्रोधित न हों इस बात का ध्यान रखते हुए सन्दिग्ध विषय को पुनः पूछ ले । गुरूणां पुरतो न यथेष्टमासितव्यम् ॥ १६ ॥ गुरुओं के आगे मनमाने ढंग से न बैठे । नानभिवाद्योपाध्यायाद् विद्यामाददीत ॥ १७ ॥ अभिवादन किये बिना गुरु से विद्या न ग्रहण करे । अध्ययनावस्था का आचार— अध्ययनकाले व्यासङ्गं पारिप्लवमन्यमनस्कतां च न ब्रजेत् ॥ १८ ॥ अध्ययन के समय विरोधी विचार, चञ्चलता और अन्यमनस्कता न करे। ५ नी०

६६ नीतिवाक्यामृतम् सहाध्यायी के प्रति कर्त्तव्य— सहाध्यायिषु बुद्धयतिशयेन नाभिभूयेत ॥ १९ ॥ अपनी बुद्धि यदि अन्य छात्रों की अपेक्षा अधिक तीक्ष्ण हो तो उससे सह- पाठियों का पराभव-तिरस्कार न करे । गुरु के साथ व्यवहार— प्रज्ञायातिशायानो न गुरुमवज्ञायेत ॥ २० ॥ अपनी बुद्धि यदि गुरु से अधिक श्रेष्ठ हो तो उससे गुरु का अनादर न करे । सकिमभिजातो मातरि यः पुरुषः शूरो वा पितरि ॥ २१ ॥ क्या वह पुत्र कुलीन कहा जा सकता है जो कि माता अथवा पिता के प्रति शूरता प्रदर्शित करता है । अननुज्ञातो न क्वचिद् व्रजेत् ॥ २२ ॥ गुरु से बिना आज्ञा लिये हुए कहीं न जाय । मार्गमचलं जलाशयं च नैकोऽवगाहयेत् ॥ २३ ॥ लम्बे मार्ग पर, पहाड़ पर और जलाशय पर अकेले नहीं जाना चाहिए। पितरमिव गुरुमुपचरेत् ॥ २४ ॥ पिता के समान ही गुरु की सेवा करे । गुरुपत्नीं जननीमिव पश्येत् ॥ २५ ॥ गुरुपत्नी को माता के समान देखे । गुरुमिव गुरुपुत्रं पश्येत् ॥ २६ ॥ गुरु के समान ही गुरु पुत्र को भी समझे । सब्रह्मचारिणि बान्धव इव स्निह्येत् ॥ २७ ॥ साथी ब्रह्मचारियों और सहपाठियों के साथ बान्धवों के समान स्नेह करे । ब्रह्मचर्यमाषोडशाद्वर्षात्ततो गोदानपूर्वकं दारकर्म चास्य ॥ २८ ॥ सोलह वर्ष तक ब्रह्मचर्य से रहे अनन्तर गोदान करके विवाह करे । पढ़ने का क्रम— समविद्यैः सहाधीतं सर्वदाभ्यस्येत ॥ २९ ॥ पढ़े हुए विषय का अपने सहपाठियों के साथ सदा अभ्यास करे । अपनी दुर्दशा का गुप्त रखना — गृहदौःस्थित्यमागन्तुकानां पुरतो न प्रकाशयेत् ॥ ३० ॥ अपने घर की दुरवस्था आगन्तुकों के आगे न प्रकाशित करे ।

पुरोहितसमुद्देशः ६७ कुछ स्वाभाविक मनः स्थितियां— परगृहे सर्वोऽपि विक्रमादित्यायते ॥ ३१ ॥ पराये घर में सभी विक्रमादित्य के समान पराक्रम प्रदर्शित करने को उद्यत होते हैं। स खलु महान् स्वकार्येष्विव परकार्येषूत्सहते ॥ ३२ ॥ महान् वह है जो अपने काम के समान पराये काम में भी उत्साह प्रद- र्शित करे। परकार्येषु को नाम न शीतलः ॥ ३३ ॥ दूसरे के कार्य के लिये कौन नहीं मन्दोत्साह होता। स्वभावतः लोग पराये काम के लिये उत्साही नहीं होते। राजासन्नः को नाम न साधुः ॥ ३४ ॥ राजा के समीप कौन नहीं साधु बन जाता अर्थात् राजा के समीपवर्त्ती होने पर राजदण्ड के भय से सभी लोग सद्व्यवहार करते हैं। अर्थपरेष्वनुनयः केवलं दैन्याय ॥ ३५ ॥ लोभी से अनुनय-विनय करना केवल अपनी दीनता प्रदर्शित करना है। को नामार्थार्थी प्रणामेन तुष्यति ॥ ३६ ॥ कौन धनार्थी प्रणाम से सन्तुष्ट होता है अर्थात् धन मांगने वाला धन पाने से ही प्रसन्न हो सकता है प्रणाम मात्र से नहीं। समस्त आश्रितों के प्रति समान व्यवहार का उपदेश— आश्रितेषु कार्यतो विशेषकारणेऽपि प्रियदर्शनालापाभ्यां सर्वत्र सम- वृत्तिस्तन्त्रं वर्धयत्यनुरंजयति च ॥ ३७ ॥ आश्रितों में प्रयोजन-वश किसी विशेष व्यक्ति से अधिक कार्य निकलने पर भी राजा को चाहिये कि वह समस्त आश्रितों के प्रति समान प्रेम संभा- षण और दर्शन व्यवहार रक्खे। सर्वत्र सम व्यवहार करने से राज्य की वृद्धि होती है और प्रजा का अनुरञ्जन होता है अर्थात् प्रजा अनुरक्त बनी रहती है। तनुधनादर्थग्रहणं मृतमारणमिव ॥ ३८ ॥ स्वल्प धनवाले अर्थात् दरिद्र से धन लेना मरे हुए को मारने के समान है। अप्रतिविधातरि कार्यनिवेदनमरण्यरुदितमिव ॥ ३९ ॥ जो व्यक्ति कार्य की सिद्धि में असमर्थ हो उससे अपने कार्य के लिये निवेदन करना जंगल में रोने के समान व्यर्थ है। दुराग्रहस्य हितोपदेशो बधिरस्याग्रतो गानमिव ॥ ४० ॥

६८ नीतिवाक्यामृतम् हठी को हित उपदेश देना बहिरे के आगे गाने के समान निष्फल है । अकार्यज्ञस्य शिक्षणमन्धस्य पुरतो नर्त्तनमिव ॥ ४१ ॥ कर्त्तव्य ज्ञान से शून्य पुरुष को शिक्षा देना अन्धे के आगे नाचने के समान व्यर्थ है । अविचारकस्य युक्तिकथनं तुषकण्डनमिव ॥ ४२ ॥ विचारशून्य व्यक्ति से युक्तियुक्त बात कहना भूसे को कूटने के समान निरर्थक है । नीचेषूपकृतमुदके विशीर्णं लवणमिव ॥ ४३ ॥ नीच व्यक्तियों के साथ उपकार करना पानी में विखेरे गये नमक के समान है । अविशेषज्ञे प्रयासः शुष्कनदीतरणमिव ॥ ४४ ॥ विशेष बुद्धि न रखने वाले अर्थात् मूर्ख को समझाने का प्रयास सूखी नदी में तैरने के समान है । परोक्षे किलोपकृतं सुप्तसंवाहनमिव ॥ ४५ ॥ परोक्ष में किया गया उपकार सोये हुए व्यक्ति के पैर दबाने के समान है । अकाले विज्ञप्तमूपरे कृष्टमिव ॥ ४६ ॥ अनवसर में कही गई बात ऊसर जमीन जोतने के समान है ।, उपकृत्योद्घाटनं वैरकरणमिव ॥ ४७ ॥ उपकार करके उसे प्रकाशित करना शत्रुता करने के समान है । अफलवतः प्रसादः काशकुसुमस्येव ॥ ४८ ॥ परिणाम में कुछ न कर सकने वाले व्यक्ति का प्रसन्न होना काश के फूल के समान है । 'काश' में केवल फूल होते हैं फल नहीं लगते उसी प्रकार जो व्यक्ति अथवा नृपति न कुछ भलाई कर सके न कुछ द्रव्य आदि दे सके उसे प्रसन्न करना या उसकी कृपा व्यर्थ है । गुणदोषाननिश्चित्यानुग्रहनिग्रहविधानं ग्रहाभिनिवेश इव ॥ ४९ ॥ गुण और दोष का निश्चय किये बिना अनुग्रह अथवा निग्रह-दण्ड देना- राहु, केतु आदि ग्रहों के अभिनिवेश के समान है अर्थात् अपना ही बाधक होता है । उपकारापकारासमर्थस्य तोषरोपकरणमात्मविडम्बनमिव ॥ ५० ॥ उपकार अथवा अपकार करने में असमर्थ व्यक्ति को संतुष्ट करना अपनी ही परिहास कराना है । शूद्रस्त्रीविद्रावणकारी गलगर्जितं ग्रामशूराणाम् ॥ ५१ ॥

सेनापतिसमुद्देशः ६६ केवल गांव भर के लिये शूर आदमी का गरजना चिल्लाना शूद्रों और स्त्रियों को ही भयभीत करने वाला होता है अर्थात् जो वस्तुतः शूर नहीं होता उससे चतुर पुरुष भयभीत नहीं होते । स विभवो मनुष्याणां यः परोपभोग्यः ॥ ५२ ॥ मनुष्य का वही धन धन है जो दूसरों के उपभोग में आवे । स ननु व्याधिर्यः स्वस्यैवोपभोग्यः ॥ ५३ ॥ वह धन निश्चय एक व्याधि के समान है जो केवल अपने भोग के योग्य हो । स किं गुरुः पिता सुहृद्वा योऽभ्यसूयागर्भं बहुषु दोषं प्रकाशयन् शिक्षते ॥ ५४ ॥ जो अपने शिष्य, पुत्र अथवा मित्र के दोषों की निन्दा करते हुए बहुतों के प्रकाश में लावे और तब शिष्यादि को शिक्षा देना चाहे वह गुरु, पिता और मित्र निन्दनीय है । स किं प्रभुर्यश्चिरसेवकस्यैकमप्यपराधं न सहते ॥ ५५ ॥ वह स्वामी निन्दनीय है जो अपने बहुत दिनों के सेवक का एक भी अपराध न क्षमाकर सके । [ इति पुरोहित समुद्देशः ] १२. सेनापति समुद्देश सेनापति के गुणों का वर्णन— अभिजनाचारप्रज्ञानुरागसत्यशौचशौर्यसम्पन्नः, प्रभाववान् बहुबा- न्धवपरिवारो निखिलनयोपायप्रयोगनिपुणः समभ्यस्तसमस्तवाहना- युधयुद्धलिपिभाषात्मपरस्थितिः सकलतन्त्रसामन्ताभिमतः साङ्ग्रामि- कामिरामिकाकारशरीरो भर्तुरभ्युदयदेशहितवृत्तिषु निर्विकल्पः स्वामि- नात्मवन्मानार्थप्रतिपत्तिराजचिह्नैः संभावितः सर्वक्लेशायाससहः स्वैः परैश्चाप्रधृष्यप्रकृतिरिति सेनापतिगुणाः ॥ १ ॥ सेनापति के निम्नलिखित गुण हैं। कुलीन, सदाचारी, बुद्धिमान्, अनु- रागी, सत्यवादी, शुचिता और शूरता से सम्पन्न, प्रभावशाली, बहुत से बन्धु- बान्धवों वाला, समस्त नीतियों और युक्तियों के प्रयोग में निपुण, समस्त प्रकार की सवारी, अस्त्र, युद्ध, लिपि और भाषा का ज्ञानी, आत्मज्ञानी, समस्त प्रजा और सामन्तों को प्रिय लगने वाला, सङ्ग्राम के योग्य और

७० नीतिवाक्यामृतम् मनोहर आकृति तथा शरीरवाला, स्वामी के अभ्युदय और देश के कल्याण के विषय में स्थिर बुद्धि रखनेवाला स्वामी के द्वारा आत्मतुल्य समझा जाकर सम्मानित और धन से पुरस्कृत, राजचिह्नों से विभूषित समस्त प्रकार के क्लेश और परिश्रम को सहन करनेवाला और आत्मीयों तथा शत्रुओं से अजेय स्वभाव वाला। सेनापति के दोष— स्त्रीजितत्वमौद्धत्यं व्यसनिता, क्षयव्ययप्रवासोपहतत्वं तन्त्राप्रती- कारः, सर्वैः सह वैरविरोधो, परपरिवादः, परुषभाषित्त्वमनुचितज्ञता संविभागित्वं स्वातन्त्र्यात्मसंभावनोपहतत्वं स्वामिकार्यव्यसनोपेक्षा सहकारिकृतकार्यविनाशो राजहितवृत्तिषु चेर्ष्या लुब्धत्वमिति सेनापति- दोषाः ॥ २॥ स्त्री के वशीभूत होना, उद्दण्डता, द्यूतमद्यपान आदि व्यसनों में लिप्त होना, क्षयरोग, व्ययाधिक्य और चिरप्रवास से आक्रान्त होना, शत्रु के द्वारा प्रयुक्त प्रयोगों को दूर करने में असमर्थ, सबके साथ लड़ाई झगड़ा, दूसरों की निन्दा करना, कठोर वचन बोलना, अनुचित बातों को ही जानने वाला, रुपया पैसा आदि दूसरों को बिना बांटे भोगने वाला, स्वतन्त्रता और आत्म सम्मान की भावना से आक्रान्त अर्थात् गुरुजन आदि किसी का भी थोड़ा अंकुश न चाहनेवाला और अपने लिये बहुत सम्मान चाहने वाला, स्वामी के कार्य और दुःखों की उपेक्षा करनेवाला, सहकारियों के कार्यों को बिगाड़ने वाला, राजा के हितकारी कार्यों में ईर्ष्यालु होना और लोभ करना, ये सब सेनापति के दोष हैं। प्रजा का अनुरञ्जन राज्य का मुख्य कर्तव्य— स चिरंजीवी राजपुरुषो यो नगरनापित इवानुवृत्तिपरः सर्वासु प्रकृतिषु ॥ ३ ॥ नगर भर के लोगों का कार्य करने वाला नाई जिस प्रकार लोकप्रिय होकर सुखी जीवन व्यतीत करता है उसी प्रकार जो राजपुरुष-राजकर्मचारी समस्त प्रजा के अनुरञ्जन में तत्पर रहता है वह चिरकाल तक राजसेवा में रहता हुआ सुख का उपभोग करता है। [ इति सेनापति समुद्देशः ]