भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

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मन्त्रिसमुद्देशः ५६ स्वतन्त्र व्यक्ति, प्रसङ्गानुसार, मन्त्रियों से परामर्श न लेकर एकाएक कार्य करने वाला राजा अपना सर्वनाश कर बैठता है । आलसी की अयोग्यता— अलसः सर्वकर्मणामनधिकारी ॥ १४३ ॥ आलसी व्यक्ति समस्त प्रकार के कार्यों के अयोग्य होता है । प्रमाद का दोष— प्रमादवान् भवत्यवश्यं विर्द्विषां वशः ॥ १४४ ॥ प्रमादी अर्थात् असावधान रहने वाला निश्चय ही शत्रु के वश में आ जाता है । अनुकूल को प्रतिकूल न करने का उपदेश— कमप्यात्मनोऽनुकूलं प्रतिकूलं न कुर्यात् ॥ १४५ ॥ जो व्यक्ति अपने अनुकूल रहता हो या हो ऐसे किसी एक भी व्यक्ति को प्रतिकूल न होने दे । गुप्त भेद की रक्षा की आवश्यकता— प्राणादपि प्रत्यवायो रक्षितव्यः ॥ १४६ ॥ प्राण से भी अधिक गुप्त भेद की रक्षा करनी चाहिये । गुप्त बात का फूटना तरह-तरह के विघ्न उत्पन्न करता है अतः यहां विघ्न- वाचक प्रत्यवाय शब्द का 'गुप्त रहस्य' अर्थ करना उचित है । अपनी शक्ति समझने की आवश्यकता— आत्मशक्तिमजानतो विग्रहः क्षयकाले कीटिकानां पक्षोत्थान- मिव ॥ १४७ ॥ अपनी शक्ति का अनुमान न करके बैर ठान लेना मरते समय चींटियों और फतिङ्गों को पर निकलने के समान है । शत्रु से सद्व्यवहार की अवधि— कालमलभमानोऽपकर्त्तरि साधु वर्त्तेत ॥ १४८ ॥ अपने अनुकूल समय न पाकर मनुष्य को अपने अपकारी अथवा शत्रु के प्रति सद्व्यवहार करते रहना चाहिए । दृष्टान्त— किन्नु खलु लोको न वहति मूर्ध्ना दग्धुमिन्धनम् ॥ १४६ ॥ जलाने वाली लकड़ी को क्या लोग शिर पर नहीं ढोते ? दृष्टान्त— नदीरयस्तरूणामङ्घ्रीन् क्षालयन्नप्युन्मूलयति ॥ १५० ॥