भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

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५८ नीतिवाक्यामृतम् दृष्टान्त-- न तथा कर्पूररेणुना प्रीतिः केतकीनां यथाऽमेध्येन ॥ १२६ ॥ केतकी के वृक्ष को कपूंर की रज से वह प्रसन्नता नही होती जितनी अमेध्य वस्तु गोबर आदि की खाद से । केतकी का वृक्ष कपूर का चूरा डालने से नहीं किन्तु खाद डालने से बढ़ता हैं । अधिक क्रोध से प्रभुता की हानि— अतिक्रोधनस्य प्रभुत्त्वमग्नौ पतितं लवणमिव शतधा विशीर्यते ॥ जो पुरुष अत्यन्त क्रोधी होता है उसकी प्रभुता अग्नि में पतित लवण खण्ड अर्थात् नमक के टुकड़े की भांति सौ-सौ टुकड़े हो जाती है । अर्थात् खण्डित होकर नष्ट हो जाती है । गुणों के नष्ट होने का कारण— सर्वान् गुणान् निहन्त्यनुचितज्ञः ॥ १३८ ॥ उचित अनुचित का ज्ञान न रखनेवाला व्यक्ति अपने समस्त गुणों को नष्ट कर देता है । जिसे भले बुरे का ज्ञान न रहा वह गुणशाली होते हुए भी निर्गुण है । गुप्त रहस्य दूसरों से न कहना चाहिए— परस्य मर्मकथनम् आत्मविक्रय एव ॥ १३६ ॥ दूसरे को अपना गुप्त भेद बता देना उसके हाथ अपने को बेच देना ही है । क्योंकि तब उस व्यक्ति से यह डर सदा बना रहेगा कि कहीं यह व्यक्ति मेरा भेद न खोल दे और मैं विपत्ति में पड़ जाऊं इस प्रकार उसकी सदा अनुनय-विनय ही करनी पड़ेगी । शत्रु पर विश्वास घातक है— तदजाकृपाणीयं यः परेषु विश्वासः ॥ १४० ॥ शत्रु पर विश्वास करना 'अजाकृपाणीय' है बकरी बकरे का मांस खाने वालों का खड्ग कब बकरी या बकरे पर गिरेगा जैसे यह निश्चय नहीं उसी प्रकार विश्वस्त शत्रु कब वध कर देगा यह निश्चय नहीं कहा जा सकता । अतः शत्रु पर विश्वास उचित नहीं । चञ्चलता से हानि— क्षणिकचित्तः किंचिदपि न साधयति ॥ १४१ ॥ चञ्चल चित्त वाला व्यक्ति कोई भी काम पूरा नहीं करता । राजा की स्वेच्छाचारिता का दोष— स्वतन्त्रः सहसाकारित्वात् सर्वं विनाशयति ॥ १४२ ॥