नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमन्त्रिसमुद्देशः ५७ महापुरुष का स्वभाव— नाविज्ञाय परेषामर्थमनर्थं वा स्वहृदयं प्रकाशयन्ति महानुभावाः ॥ दूसरों का सदाशय और दुराशय जाने बिना महापुरुष अपने मन की बात नहीं प्रकट करते। महान् व्यक्ति से सम्भाषण का लाभ— क्षीरवृक्षवत् फलसम्पादनमेव महतामालापः ॥ १३० ॥ महापुरुषों का सम्भाषण दूधवाले वृक्ष की तरह फल सम्पादन करता है। विशेषार्थ—जिस प्रकार पत्ता या छाल निकालने पर जिनमें दूध निकल आता है ऐसे वृक्ष मीठा फल देते हैं उसी प्रकार महापुरुषों की बातचीत से भी अच्छा परिणाम निकलता है। नीच को वश में लाने का उपाय— दुरारोहपादप इव दण्डाभियोगेन फलप्रदो भवति नीचप्रकृतिः ॥ कांटे या ऊँचाई के कारण न चढ़े जा सकने योग्य वृक्षों का फल जैसे दण्ड से पीटने पर ही गिरता है उसी प्रकार नीच प्रकृति के पुरुष भी दण्डदान से ही फलीभूत या वशीभूत होते हैं। महान् पुरुष का लक्षण— स महान् यो विपत्सु धैर्यमवलम्बते ॥ १३२ ॥ महान् वही है जो विपत्ति में धैर्य धारण करे। आकुलता दोष है— उत्तापकत्वं हि सर्वकार्येषु सिद्धीनां प्रथमोऽन्तरायः ॥ १३३ ॥ आकुल हो उठना समस्त कार्यों की सिद्धि के निमित्त प्राथमिक या प्रार- म्भिक विघ्न है। कुलीन का लक्षण— शरद्घना इव न खलु वृथालापं गलगर्जितं वा कुर्वन्ति सत्कुल- जाताः ॥ १३४ ॥ उत्तम कुल में उत्पन्न व्यक्ति शरत्कालीन मेघ की गर्जना के समान व्यर्थ आलाप नहीं करते। सुन्दर-असुन्दर का भेद— न स्वभावेन किमपि वस्तु सुन्दरमसुन्दरं वा, किन्तु यदेव यस्य प्रकृतितो भाति तदेव तस्य सुन्दरम् ॥ १३५ ॥ स्वभाव से ही कोई वस्तु सुन्दर या असुन्दर नहीं होती किन्तु जिसकी प्रकृति से जिसका मेल बैठता है अथवा जिस किसी को स्वभाव से ही जो वस्तु अच्छी लगती है वही उसके लिये सुन्दर होती है।