भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 220 में से

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५६ नीतिवाक्यामृतम् जो महामूर्ख होते हैं वे ही बहुत क्लेश साध्य किन्तु स्वल्प फल वाले कार्य आरम्भ करते हैं । कापुरुष का लक्षण— दोषभयान्न कार्यारम्भः कापुरुषाणाम् ॥ १२१ ॥ दोष के भय से कार्य न करना कापुरुष का लक्षण है । दृष्टान्त— मृगाः सन्तीति किं कृषिर्न क्रियते ॥ १२२ ॥ अजीर्णभयात् किं भोजनं परित्यज्यते ॥ १२३ ॥ मृग हैं इसलिए क्या कोई खेती नहीं करता । और अजीर्ण के भय से क्या कोई भोजन छोड़ देता है ? विघ्नों की अनिवार्यता— स खलु कोऽपीहाभूदस्ति भविष्यति वा यस्य कार्यारम्भेषु प्रत्यवाया न भवन्ति ॥ १२४ ॥ इस संसार में क्या कोई ऐसा भी है या होगा जिसके कार्य में विघ्न न होते हों । दुष्टात्मा की कार्य पद्धति— आत्मसंशयेन कार्यारम्भो व्यालहृदयानाम् ॥ १२५ ॥ अपने प्राणों को संशय में डालकर कार्य प्रारम्भ करना दुष्टात्माओं का कार्य है । महापुरुष की पहिचान— दूरभीरुत्वमासन्नशूरत्वं ( रिपुं प्रति ) महापुरुषाणाम् ॥ १२६ ॥ महापुरुष लोग शत्रु जब तक दूर रहता है तब तक तो उससे डरते हैं किन्तु जब वह आक्रमण कर समीप आ जाता है तब अपनी शूरता का प्रदर्शन करते हैं । मृदुता के गुण— जलवन्मार्दवोपेतः पृथूनपि भूभृतो भिनत्ति ॥ १२७ ॥ जिस प्रकार कोमल जल प्रवाह बड़े-बड़े पर्वतों को भी फोड़ कर गिरा देता है उसी प्रकार मृदुतायुक्त राजा भी बड़े-बड़े राजाओं का विनाश कर देता है । प्रियवादिता के लाभ— प्रियम्बदः शिखीव सदर्पानपि द्विषत्सर्पानुत्सादयति ॥ १२८ ॥ प्रिय वाणी वाला मयूर जिस प्रकार दर्प युक्त सर्पों को नष्ट कर देता है उसी प्रकार प्रियवक्ता राजा भी सदर्प शत्रुओं का विनाश कर देता है ।

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