भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 220 में से

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५२ नीतिवाक्यामृतम् दृष्टान्त द्वारा समर्थन— किं नामान्धः पश्येत् ॥ ६० ॥ अन्धा क्या देखेगा ? । द्वितीय दृष्टान्त— किमन्धेनाकृष्यमाणोऽन्धः समं पन्थानं प्रतिपद्यते ॥ ६१ ॥ क्या अन्धे के सहारे चलता हुआ अन्धा सम-मार्ग को पा सकता है ? समर्थन— तदन्धवर्त्तकीयं काकतालीयं वा यन्मूर्खमन्त्रात् कार्यसिद्धिः ॥ ६२ ॥ मूर्ख पुरुष की मन्त्रणा से कभी-कभी कार्य का सिद्ध हो जाना संयोग वश अन्धे के हाथ बटेर आ जाने के तथा स्वयं गिरते हुए ताड़ के फल पर अक- स्मात् कौवे के बैठ जाने के समान है । समर्थन-- स घुणाक्षरन्यायो यन्मूर्खेषु मन्त्रपरिज्ञानम् ॥ ६३ ॥ मूर्ख को मन्त्रणा का ज्ञान घुणाक्षरन्याय के समान है। लकड़ी का कीड़ा 'घुन' स्वेच्छा से लकड़ी खाता है उसमें कभी संयोग-वश किसी अक्षर की आकृति बन जाना जैसे सार्वकालिक या घुन की स्वाभाविक कला नहीं होती उसी प्रकार संयोग वश कभी ही मूर्ख अच्छी सलाह दे सकता है । मन्त्रणा के लिये शास्त्र ज्ञान की आवश्यकता— अनालोकं लोचनमिवाशास्त्रं मनः कियत् पश्येत् ॥ ६४ ॥ बिना ज्योति के नेत्र के समान शास्त्र ज्ञान से शून्य मन कितना विचार कर सकता है । सेवक के लिये स्वामी की प्रसन्नता ही मुख्य है— स्वामिप्रसादः सम्पदं जनयति न पुनराभिजात्यं पाण्डित्यं वा ॥ ६५ ॥ । स्वामी की कृपा से सम्पत्ति प्राप्त होती है कुलीनता और पाण्डित्य से नहीं । यथार्थ का गौरव अक्षुण्ण रहता है— । हरकण्ठलग्नोऽपि कालकूटः काल एव ॥ ६६ ॥ शङ्कर जी के गले में भी लगा हुआ कालकूट विष सर्वसाधारण के लिये मारक विष ही है । मूर्ख व्यक्ति पर राज्य-भार की निन्दा— स्ववधाय कृत्योत्थापनमिव मूर्खेषु राज्यभारारोपणम् ॥ ६७ ॥ मूर्ख पुरुष को राज्य भार सौंपना अपने ही वध के लिए 'कृत्या' उत्पन्न करने के समान है ।

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